ভুল করে ঠিক

সন বোধ করি ১৯৫৬, আমার বয়েস বেড়ে বছর দুয়েক হল। আমরা তখন রসা রোডের ভাড়া-বাড়িতে থাকি। মা’য়ের চাপাচাপিতে বাবা ইংরেজ হয়ে পাপা হয়ে গেল, মানে আমি পাপা ডাকতে শুরু করলাম। মা দুটো অপশন দিয়েছিল, পাপা অথবা পাপাই। ওই ছোট্ট মাথায় পাপা ডাকটাই কম ঝামেলার মনে হল, বাবা-র  সাথে পাপা অনেকটা মিলেও যায়। 

পাপা আমাকে তার মনের মত তৈরী করার জন্যে একটা স্তর অবধি চেষ্টা করতেন, আর আমি তার প্রায় কোনটাই হতে দিতাম না; তার মধ্যে সবচেয়ে যেটা খারাপ ছিল সেটা হচ্ছে পড়াশুনো; ছি ছি, এটা কি কোন সুস্থ বাচ্চার কাজ? আমাদের ইস্কুলের জবরদস্তি পড়াশুনো যদি কোনও বাচ্চার ভালো লাগে তাহলে তার সুস্থতা নিয়েই কেমন যেন সন্দেহ জাগে। সে যা হোক, পড়াশুনোরই জয় সর্বত্র। কিন্তু এ ব্যাপারটা কেমন যেন কখনোই মানতে পারতাম না।

পড়াশুনো করার একেবারেই যে চেষ্টা করিনি তা নয়। কিন্তু বই-এর লেখাগুলোর সাথে আমার সাধারণ বুদ্ধিতে বোঝা জানার কেমন যেন জুঁতসই কোনও মিল পেতাম না। যেমন ধরুন এক ধরনের অঙ্ক  কষতে হোত, তার নাম ছিল “সরল”। “সরল” যে কেন সরল, তার সরলতাই ঠাহর করে উঠতে  পারতাম না, এই সরল যে কোন কাজের তাও মনে হত বোঝা জানার বাইরে।

আমার তখন অনেকটাই বয়েস, বুড়াই বলতে পারেন। একটি উচ্চশিক্ষণ-সংস্থা আমাকে বায়ুযানের ভাড়া-পত্তর দিয়ে কথা-বার্তা বলতে ডেকেছিল। সেখানেও বহু পণ্ডিতের মাঝেও প্রশ্নটা রেখেছিলাম। বলেছিলাম যে ছোটবেলায় সরল করার চেষ্টা করতাম যেখানে যোগ, বিয়োগ, গুণ, ভাগ, এর, প্রথম, দ্বিতীয়, তৃতীয় ব্রাকেট ইত্যাদি নানা রকম অশান্তি থাকত, আর তারপর তার উত্তর বেরুত “১”। আমি এখন ও বুঝে উঠতে পারলাম না ওটা কি করে ছবি এঁকে বোঝানো যাবে, আর কোন মাষ্টারমশাই ওটা বাচ্চাদের সেভাবে বুঝিয়ে থাকেন। যদি এটা না বোঝানোই যায় তাহলে অত  কঠিন করে ১ উত্তর জেনে কি লাভ? তখন এক অঙ্কের পণ্ডিত বললেন, আমরা যদিও ও ভাবে অঙ্ক শেখাই না, কিন্তু আপনি ফিনল্যান্ডের অঙ্ক শেখানোর পদ্ধতি দেখুন। মশাই; থাকি ভারতে, ফিনল্যান্ড দিয়ে আমি কি করব?   

সে যা হোক, কোনও কিছু মাথা-মুন্ডু বুঝতে না পেরে, পড়াশুনো ডকে উঠল। আমি মন দিয়ে গান-বাজনা করি পাপা এর ঘোরতর বিরোধী ছিলেন, উনি চাইতেন আমি ভালো করে পড়াশুনো করে, বিজ্ঞানী হব, বিশ্বিদ্যালয়ে পড়াব। আমি কোন পশ্চাতাপ ছাড়াই ওর সে সব আশায় সফলতার সাথে জল ঢেলে দিয়েছি। যদিও দেশে ও বিদেশে বিশ্ববিদ্যালয়ে পড়িয়েছি, কিছুটা হয়ত গবেষণার সাথেও  জুড়েছি; কিন্তু সেটা কোনভাবেই প্রচলিত লোকমান্য বিজ্ঞান নয়। হ্যাঁ, ঠিকই ধরেছেন, ভারতীয় গান-বাজনা বা তার সাথে জোড়া বিষয় নিয়ে সময় কাটিয়েছি, এই বিশেষ জ্ঞানের সাথে হয়তো বা কখনও  “পলব” বা “প্রচলিত লোকমান্য বিজ্ঞান” জুড়ে গিয়েছে; পড়াশুনো করেছি, কিন্তু সেটা চাপিয়ে দেওয়া নয়, নিজের খুশিতে মহা আনন্দে। যা পড়তে ইচ্ছে হয়েছে পড়েছি, জেনেছি, আর তার প্রয়োগ করেছি। এই বয়েসে এসে মনে হচ্ছে, যা করেছি তা যেন সব ভুল করে ঠিক হয়ে গিয়েছে!    

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ১৫ জুলাই ২০২৫

भूल से बनी बात

सन 1956 की बात है। मेरी उम्र तब दो साल के करीब रही होगी। हम रसा रोड की एक किराए की मकान में रहते थे। मम्मी ने एक दिन ऐलान किया—“अब से ‘बाबा’ नहीं, तुम्हें ‘पापा’ कहना है।” विकल्प भी दिया: ‘पापा’ या ‘पापाइ’। मेरी नन्हीं सी बुद्धि ने तुरन्त ‘पापा’ चुन लिया—कम बोझ, ज़्यादा मेल।

अब पापा की तमन्ना थी कि मुझे अपने जैसा बना दें। उन्होंने पूरी योजना बना रखी थी — मैं खूब पढ़ूँ, साइंटिस्ट बनूँ, और अंत में विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनकर देश की सेवा करूँ। मगर मैं था कि हर मोड़ पर उनकी योजना में पेंच लगा देता।

सबसे बड़ी लड़ाई पढ़ाई को लेकर हुई। मुझे किताबों से अजीब सी चिढ़ थी। स्कूल की ज़बरदस्ती वाली पढ़ाई तो जैसे किसी मानसिक अत्याचार से कम नहीं लगती थी। और फिर वो ‘सरल’ गणित! नाम था ‘सरल’, पर उसमें जोड़, घटाव, गुणा, भाग और न जाने कौन-कौन से ब्रैकेट! और नतीजा? “1”! अब भला बताइए, इतनी जहमत उठाकर अगर अंत में ‘1’ ही पाना है, तो वो झंझट क्यों? मुझे तो बचपन से यही लगता था कि ‘सरल’ के नाम पर बहुत बड़ा धोखा है।

सालों बाद, जब बाल सफेद हो गए और वक्त कुछ धीमा चला, मुझे एक नामी संस्थान ने बुलाया—हवाई जहाज का टिकट भेजकर! वहाँ बड़ी-बड़ी हस्तियाँ बैठी थीं, और मैं वही पुराना सवाल उठा लाया: “ये ‘सरल’ वाला हिसाब बच्चों को आखिर क्यों सिखाया जाता है?” एक विद्वान बोले, “आप फिनलैंड की मैथड देखिए।” मैंने सोचा, “मियाँ, फिनलैंड से पहले तो मुझे अपना बचपन ही समझ नहीं आया।”

ख़ैर, पापा को मुझसे जो उम्मीदें थीं, उनमें मैंने पानी ही फेरा। उन्होंने सोचा था, मैं लैब को चमका दूँगा। मैंने सितार को चमका दिया। उन्होंने चाहा मैं विज्ञान में शोध करूँ। मैंने रागों में जीवन खोज निकाला। वे चाहते थे कि मैं क्लासरूम में लेक्चर दूँ, मैंने मंच पर अलाप छेड़ दिए।

आख़िर में क्या हुआ? पढ़ाई की — लेकिन अपनी पसंद से। जो दिल चाहा, वही पढ़ा। और वही अपनाया। बिना पछतावे के। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है—सब कुछ गलतियों से ही सही, पर सही दिशा में चला गया।

कभी-कभी, ज़िंदगी भी ‘सरल गणित’ की तरह होती है—समझ में नहीं आती, लेकिन अंत में उत्तर ‘ठीक’ ही आता है।