First posted on May 13, 2014 by sitardivine
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তখন আমরা ২০ বিধান পল্লীর বাসাবাড়ীতে থাকি. ওখানে রেলগাড়ীর ডিব্বার মত সারি দেওয়া তিনটে ঘর ছিল, তারপর রান্নাঘর আর এছাড়া একটা ঘর একটু আলাদা, সেখানে আমি রেয়াজ করতাম| সেদিন পাপা বাড়িতে, আমিও সেতার নিয়ে মাঝের বড় ঘরে চলে এসেছি| পাপা খাটে শুয়ে আছেন আর আমি মেঝেতে বসে বাজাচ্ছি| সে সময় বেশ বেড়ালের উৎপাত ছিল, আর মনে হয় বেড়ালের পপুলেশনও বেশ বেশি ছিল| কারণ খুব স্পষ্ট| এখান আর অত ঘন ঘন বেড়াল চোখে পড়েনা| যদিও বেড়াল পরিসংখ্যান কোথাও তেমন করে দেখিনি, তবে এ কথা নিজের অভিজ্ঞতা থেকে হলফ করে বলতে পারি| অন্য একটা সম্ভাব্য কারণ অবশ্য, বেড়াল সম্প্রদায়ের বুদ্ধি ক্রমশঃ কমে যাচ্ছে| এ সম্পর্কে বেড়ালবিদ পন্ডিতেরা আরও ভাল বলতে পারবেন| আমি যে কথা বলতে চাইছিলাম তা হচ্ছে মাছ, দুধ ইত্যাদি বেড়ালের জিভে না পৌঁছে যাতে আমাদের জিভ স্পর্শ করে তারই জন্য আমাদের জানালার শিক্গুলোতে লোহার তার লাগান হয়েছিল| খুব যে ঘন তা নয়, তবে সাধারণ বেড়ালের সাইজ থেকে বেশ ছোট|
আমার কোনদিন সেতারি হয়ে ওঠার ব্যাপারে পাপার প্রবল সন্দেহ ছিল| বলতেন, “এত নরম হাতে সেতার কি বাজবে, ডা-রাই বাজাতে পারিসনা|” এছাড়াও গান-বাজনার লাইনে এপাশ-ওপাশ থেকে গুঁতো খেয়ে গান-বাজনা পেশাদারী সম্পর্কে ওঁর অনেক বিপরীত বক্তব্য ছিল| তবে শেখাতে কার্পন্য করেননি| একটু এপাশ ওপাশ হলেই ভুল ধরিয়ে দিতেন|
সেদিন রেয়াজ করছি, বেশ মন দিয়েই বাজাচ্ছিলাম|সেতারে জোরে ঠোক মেরে রা-রা বাজাতে বেশ ভাল লাগত| মনের খুশিতে হঠাৎ মেরে দিলাম জোরসে ঠোক, তারপরেই ঘটে গেল সে ভীষণ ব্যাপার| দেখি, কিছু একটা সাদা লম্বাকার জিনিস পিঠে ধাক্কা দিয়ে, সেতারে ধাক্কা মেরে তীব্র গতিতে জানালার ফোকর দিয়ে ছিটকে বেরিয়ে গেল| তাকিয়ে দেখি তারের একটা ফোকড় বেশ কিছুটা বড় হয়ে গেছে আর তার চারদিকে সাদা লোম| পাপাও হঠাৎআওয়াজে ধড়মড়িয়ে উঠে বসলেন| সব কান্ড বুঝে চিৎকার করে উঠলেন, “দেখছিস তোর বাজনার বহর, বেড়াল কিভাবে ভয় পেয়ে পালাচ্ছে? বেড়ালের যদি এই হয় তাহলে মানুষের কি হবে ভাবতে পারছিস?” আমি কিছুটা মুষড়ে পড়লেও বাজনা থামালামনা|
এরপর বেশ কয়েক বছর কেটে গিয়েছে| আমি তখন লম্বা সময় ধরে রেয়াজ করি| নানা জায়গায় বাজাতেও শুরু করেছি| সে সময় কালীবাড়ী লেন-এ ওস্তাদজীর বাড়ির পরের গলিতেই একটা টিউশনি পেয়ে গেলাম| ছাত্রের নাম ‘দোলন’| সে আমার থেকে বয়সে অনেকটা বড় হলেও তা কখনও বুঝতে দেয়নি| ছাত্র-শিক্ষক সম্বন্ধের যথেষ্ঠ সম্মান করত| ওকে আমি বলতাম ‘ছাত্র বাবু’| সেই ছাত্র বাবুর একটা পেল্লাই সাইজের ডোবারমেন কুকুর ছিল| নাম ছিল ‘জেসপা’| দারুন স্মার্ট| একদিন শেখাতে পৌঁচেছি, দেখি জেসপার মেজাজ খুব গরম| খুব জোরে চেঁচিয়ে চলেছে| অনেক চেষ্টা করেও তাকে শান্ত করা যাচ্ছেনা| ছাত্র বাবু, তার স্ত্রী, সবাই অনেক চষ্টা করে হাল ছেড়ে দিলেন| আমি ভাবলাম একটা পরীক্ষা করে দেখা যাক্| গুরুর নাম নিয়ে আমি সেতার হাতে তুলে হাল্কা করে আলাপ বাজাতে শুরু করলাম| অবাক কান্ড! কিছুক্ষনের মধ্যেই জেসপা-র চিৎকার কমে গেল, তারপর চুপ করে শুয়ে পড়ল| এ ত ম্যাজিক!! গুরুদের মুখরক্ষা হ’ল, অল্প হলেও আমার গুরুদের সেখান বিদ্যে কাজে লেগে গেল|
Hindi Translation
सितार, बिल्ली और जैस्पा
(पहली बार पोस्ट किया गया – 13 मई, 2014, sitardivine द्वारा)
उस समय हम 20 विधान पल्ली के मकान में रहते थे। वहाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह लाइन में तीन कमरे थे, फिर रसोई, और एक अलग कमरा जहाँ मैं रियाज़ करता था। उस दिन पापा घर पर थे, और मैं सितार लेकर बीच वाले बड़े कमरे में आ गया। पापा खाट पर लेटे हुए थे, और मैं फर्श पर बैठकर सितार बजा रहा था।
उन दिनों बिल्लियों का खासा आतंक था — लगता है बिल्ली जनसंख्या भी काफी अधिक थी। कारण बहुत स्पष्ट है, अब वैसी बिल्ली की भरमार नहीं दिखती। हालांकि बिल्ली जनगणना कहीं नहीं देखी, लेकिन अपने अनुभव से पूरी शपथ लेकर कह सकता हूँ। एक और संभावना भी है: शायद बिल्ली जाति की बुद्धि धीरे-धीरे घटती जा रही है — इस पर ‘बिल्लीतत्व’ के विशेषज्ञ पंडित ज़्यादा प्रकाश डाल सकते हैं।
मैं जो बात कहना चाहता था वह ये कि मछली, दूध वगैरह बिल्लियों की जीभ तक न पहुँच जाए और हमारे ही हिस्से में आए — इस उद्देश्य से हमने खिड़कियों पर लोहे की तार लगवाई थी। तारें बहुत घनी नहीं थीं, पर एक औसत बिल्ली के लिए अंदर घुसना मुश्किल था।
मेरे सितारी बनने को लेकर पापा को हमेशा संदेह था। कहते, “इतने नरम हाथों से सितार क्या बजेगा? डा-रा भी ढंग से नहीं बजा पाता।”
गायन-वादन को पेशेवर रूप से अपनाने को लेकर उनके विचार काफ़ी विरोधी थे — शायद उन्होंने इधर-उधर से ठोकरें खाई थीं। फिर भी उन्होंने सिखाने में कोई कंजूसी नहीं की। ज़रा सी भी चूक होती तो तुरन्त पकड़ लेते।
उस दिन मैं रियाज़ में डूबा हुआ था। सितार पर ज़ोर से ठोक कर ‘रा-रा’ बजाने में बड़ा आनंद आ रहा था। मन के उत्साह में मैंने एक ज़ोर की ठोक दी… और तभी हुआ एक अजीब हादसा!
देखता हूँ — एक लंबी सफेद आकृति मेरी पीठ से टकराकर, सितार पर धक्का मारकर खिड़की की सलाखों के बीच से बिजली की गति से निकल गई! देखा, खिड़की की तार का एक हिस्सा अब काफ़ी बड़ा हो चुका था और वहाँ सफेद बालों का गुच्छा चिपका था।
पापा भी उस तेज़ आवाज़ से चौंककर उठ बैठे। जब पूरी घटना समझ में आई तो झल्लाकर बोले,
“देख रहा है तेरी बजाने की धाक? बिल्ली डर के मारे भाग गई! अगर बिल्लियों की ये हालत है तो सोच इंसानों का क्या होगा?”
मैं थोड़ा मायूस ज़रूर हुआ, पर बजाना बंद नहीं किया।
इसके कई साल बाद की बात है। अब मैं घंटों रियाज़ करता, और अलग-अलग जगहों पर बजाने भी लगा था।
इसी दौरान मुझे कालिबाड़ी लेन में उस्ताद जी के घर के पास एक ट्यूशन मिल गई। छात्र का नाम था दोलन। उम्र में मुझसे काफ़ी बड़ा था, लेकिन व्यवहार में उसने कभी इसका अहसास नहीं होने दिया। छात्र-गुरु के रिश्ते का पूरा सम्मान करता था। मैं उसे ‘छात्र बाबू’ कहता था।
उस छात्र बाबू का एक बहुत बड़ा डॉबरमैन कुत्ता था — नाम था जेस्पा। बड़ा स्मार्ट जानवर था।
एक दिन मैं सिखाने पहुँचा तो देखा जेस्पा का मूड बहुत गर्म है। ज़ोर-ज़ोर से भौंक रहा है।
छात्र बाबू, उनकी पत्नी — सबने बहुत कोशिश की, लेकिन वो शांत नहीं हो रहा था।
मैंने सोचा, एक प्रयोग करते हैं।
गुरु का नाम लेकर मैंने सितार उठाया और हल्के सुरों में आलाप बजाना शुरू किया।
हैरत की बात! कुछ ही पलों में जेस्पा की आवाज़ धीमी पड़ने लगी — फिर एकदम शांत होकर ज़मीन पर लेट गया।
ये तो जादू था!
गुरुजनों की लाज रह गई — और थोड़ा-बहुत सही, उनकी दी हुई विद्या ने अपना काम कर ही दिया!
AI supported Hindi translation published on July 16, 2025