নিখুঁত আমি, আর সবেতে গণ্ডগোল!

লেখক – কেমনামি বোকানি*  

ভাবছিলাম আমি একজন দারুণ লেখক। আর মানুষ হিসেবে? এক্কেবারে, যাকে বলে নিখুঁত।  আরে আরে রেগে যাচ্ছেন কেন? ভাবতে কি অসুবিধে বলুন তো মশাই? এবার সত্যি কথাটা শুনুন, যখন লিখতে শুরু করলাম তখন আমার সব বিদ্যে-বুদ্ধি অসভ্যের মতন দাঁত বের করে  সামনে এসে দাঁড়িয়ে পড়ল। আমি তো লজ্জায় কুপোকাত! এতটা হরিদাস পাল নিজেকে কখনোই ভাবতে পারিনা।   

এবার ভণিতা ছেড়ে অন্য কথায় আসি। সেতো সাড়ে ছয় দশক পেরিয়ে প্রায় সাত দশক হতে চলল, আমার মতন দশাসই অকাজের মানুষের ওজন বয়ে চলতে ধরতী-মায়ের মুখে কোন রা নেই, অন্য দেবতারাও তেমন করে কোন আওয়াজ ওঠাচ্ছেন না। কিন্তু, সময় নিয়ে কিছুটা সমস্যা বোধ হচ্ছে। সময়টাকে সুন্দর করে তোলাটা যে যেমন-তেমন কাজ নয় সেটা সহজেই বুঝতে পারি। সময়টা সুযোগ পেলেই ব্রহ্মদত্যির মতন হুড়মুড় করে ঘাড়ে চেপে বসে ঘাড় মটকে দিতে  চায়, কিন্তু ওকে দিয়ে আদর করিয়ে নিতে গেলে বা সুন্দর গল্পে মন ভুলিয়ে নিতে গেলেই মহা-চাপ। 

কথাপ্রসঙ্গে বলি, এই ‘চাপ’  কথাটা আজকাল বেশ জমিয়ে চলছে। আজকের বাঙ্গালীদের জন্য ‘চাপ’ নিয়ে থিওরি কষার দরকার পড়েনা। কাকারা চাপে ও তাপে বেশ আছেন। কারুরই খুব একটা নিজেকে নিয়ে ভাববার সময় নেই, অনেক মানুষই প্রায় নিঃস্বার্থভাবে অন্যের কি করা উচিত তা নিয়ে চিন্তিত হয়ে পড়েন। এতে, যারা ভাবছেন তাদের চাপ বাড়ে,বহু ক্ষেত্রে রক্তচাপও হয়ত বাড়ে। অনেকেই নিশ্চয় দুঃখিত হয়ে পড়েন যে তাদের এত ভাবা সত্যেও,  যাকে বা যাদের নিয়ে তারা চিন্তিত তাদের খুব একটা হেলদুল দেখতে পান না। বাংলায় এই ধরনের ঘটনাকেই বোধহয় বলে; “কবি এখানেই কেঁদেছেন”, এটি একটি বিশেষ বাগধারা বা লব্জ যাকে সোজা বাংলায় “বেঙ্গলী ইডিয়ম” বলা চলে।

কথা হচ্ছে, কবি না কাঁদলেও রাগ তো হতেই পারে। যারা সমাজসেবী তাদের কথা আলাদা, তাঁদের  জীবনই তো অন্যদের জন্যে উৎসর্গিত, আর এই ভাবনা তাঁদের সেবার অঙ্গ। যারা দেশ চালান বা দেশ চালানর কাজে যুক্ত হতে চান বা যে কোন অর্থে মানুষের সেবায় নিয়োজিত তাদের নিয়ে লিখছিনা, আমার লেখা এঁদের অতিরিক্ত মানুষজন নিয়ে। এই ধরনের মানুষজন অনেক বড় বড় ব্যপারের সাথে নিজেদের যুক্ত রাখেন, যেমন, কিউবার রাজনীতি বা দক্ষিণ আফ্রিকার অর্থনীতি। তখনই ছোটখাটো বিষয়ে চিন্তা করেন যখন নিজে কোন কারণে আটকে পড়েন। এই অসুবিধেটা অন্য কারুর বা ত্রুটিপূর্ণ ব্যাবস্থার দোষে হয়েছে, এ বিষয়ে তাদের খুব একটা সন্দেহ থাকেনা। ওই মানুষটা যদি এমনটি  করতেন তাহলেই তো কাজটা হয়ে যেত অথবা বর্তমান দোষপূর্ণ ব্যবস্থাই সব গণ্ডগোলের জড়। আমি ব্যাপারটাকে সাপোর্ট করি। তাই তো বলি; নিখুঁত আমি, আর সবেতে গণ্ডগোল!  

*নামটা দুষ্টুমি করে বদলে দেওয়া। “কেমনামি বোকানি” আসলে ভুল নিয়মের বাংলা বাক্য, যেখানে কেমন+আমি=কেমনামি, আর ‘না’ কে ‘নি’ লেখা হয়েছে, বোকা + নি (না) = বোকানি; কেমনামি বোকানি –> কেমন আমি, বোকা না? আরে আরে, রেগে যাচ্ছেন কেন? পরশুরামের ভাষায়; “হয় হয়, zaনতি পারনা” [দক্ষিণ-চব্বিশ-পরগণা অঞ্চলে নকারাত্মক অর্থে ‘নি’ এর প্রয়োগের বহুলতা দেখে পাওয়া যায়। যেমন, যাবেনি? দেবেনি? ইত্যাদি। যদিও ‘বোকানি’ সেভাবে হয়ত প্রয়োগ হয়না।]       

লেখক সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় বলছেন; “এ লেখাটা যদি ভাল লাগে তাহলে প্রশংসা আমাকেই করবেন। কিন্তু যদি পড়ে কিলোতে ইচ্ছে হয় তবে সে দায়িত্ব আমার নয়। সত্যি বলছি, ছোড়দি আর রাতু ভাল ভাল করেছে, তাই গ্যাস খেয়ে থাকতে না পেরে লেখাটা পাবলিক করে দিলাম। খারাপ লাগলে জানাবেন, ওদের ঠিকানা দিয়ে দেব।”

Hindi translation

निख़ुत मैं, और बाकी सब में गड़बड़!
लेखक केमनामी बोकानी (मस्ती में बदला गया नाम)*

सोच रहा था कि मैं एक ज़बरदस्त लेखक हूँ। और इंसान के तौर पर? बस कहिए—एकदम परफेक्ट। अरे अरे, ग़ुस्सा क्यों हो रहे हैं? सोचने में कोई टैक्स लगता है क्या? अब ज़रा सच्ची बात सुनिए—जब मैंने लिखना शुरू किया, तो मेरी सारी विद्या-बुद्धि ऐसे सामने आकर हँसने लगी जैसे कोई असभ्य आदमी बत्तीसी निकालकर हँसे! मैं तो शर्म के मारे गड़ गया। इतनी फज़ीहत कभी सोची भी नहीं थी।

ख़ैर, अब भूमिका छोड़कर असली बात पर आते हैं। साढ़े छह दशक बीत चुके हैं, लगभग सातवें में कदम रखने ही वाला हूँ। धरती माता पर मैं जैसा काम का न निकला, फिर भी धरती माँ चुपचाप मेरा बोझ ढो रही हैं—न कोई उफ़, न ही किसी देवता की तरफ से कोई आपत्ति। लेकिन, समय को लेकर थोड़ी गड़बड़ जरूर लगती है। समय को सुंदर बनाना मामूली बात नहीं है, ये मैं अच्छी तरह समझ चुका हूँ। समय मौका मिलते ही ब्रह्मदैत्‍य की तरह गर्दन पर चढ़ बैठता है और उसे मरोड़ देने को उतावला रहता है। लेकिन अगर उसे ज़रा प्यार से समझाओ, या अच्छी कहानी से बहलाओ—तो बस फिर भारी ‘चाप’ (दबाव)।

अब चूंकि बात निकली है, तो कह दूँ—आजकल ‘चाप’ शब्द बड़ा हिट चल रहा है। आज के बंगालियों को इस पर कोई शोध करने की ज़रूरत नहीं है। सब काका-मामा दबाव और ताप में अच्छे से पके हुए हैं। किसी को भी खुद को लेकर सोचने का फुर्सत नहीं, मगर दूसरों को क्या करना चाहिए—इस पर सब बहुत चिंतित रहते हैं। इस चक्कर में, सोचने वाले का चाप बढ़ता है, और कई बार रक्तचाप (BP) भी! कई लोग दुखी भी हो जाते हैं कि इतनी चिंता करने के बावजूद, जिनके बारे में वो चिंतित हैं, वे ज़रा भी नहीं बदलते। बंगाल में इसको शायद कहते हैं—”कवि यहीं रो पड़ा!” यह एक खास बांग्ला मुहावरा है, यानी एक “Bengali idiom”, जैसा कि आजकल स्टाइलिश लोग कहते हैं।

अब बात ये है कि कवि रोए या न रोए, ग़ुस्सा तो आ ही सकता है! समाजसेवियों की बात अलग है—उनका जीवन तो सेवा के लिए समर्पित होता है। जो देश चला रहे हैं, या देश चलाने का सपना देखते हैं, या किसी भी तरह से सेवा में लगे हैं—मैं यहाँ उनके बारे में नहीं लिख रहा। मेरा लेख बाकी सब लोगों के बारे में है।

ऐसे लोग बहुत बड़े-बड़े मुद्दों से खुद को जोड़कर रखते हैं—जैसे क्यूबा की राजनीति या दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था। लेकिन छोटे-मोटे मुद्दों की बात तब ही करते हैं जब ख़ुद किसी मुसीबत में फँस जाते हैं। और तब, ये पूरा यक़ीन होता है कि गलती उनकी नहीं, बल्कि किसी और की या किसी व्यवस्था की है। “अगर वह आदमी ऐसा करता तो काम हो गया होता!” या फिर, “सिस्टम ही सड़ा हुआ है!” — इन पर इनका दृढ़ विश्वास होता है।

और मैं? मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूँ। तभी तो कहता हूँ—निख़ुत मैं, और बाकी सबमें गड़बड़!”


* *यह नाम मस्ती में बिगाड़ा गया है। “ केमनामी बोकानी ” असल में गड़बड़ बांग्ला व्याकरण से बना है, जहाँ ‘केमन’ (कैसा) + ‘आमी’ (मैं) = ‘केमनामी’, और ‘ना’ को ‘नि’ करके ‘बोका’ (बेवकूफ़) + ‘नि’ = ‘बोकानी’। तो “केमनामी बोकानी” का मतलब निकलता है—”मैं कैसा हूँ, बेवकूफ़ नहीं क्या?”
अरे अरे, फिर से ग़ुस्सा कर रहे हैं? परशुराम की भाषा में कहें तो—”हाय हाय, Zaनती पारोना!” (यह दक्षिण २४-परगना क्षेत्र में नकारात्मक अर्थ में ‘नि’ का लोकप्रिय प्रयोग है—जैसे ‘जाबेनि?’ यानी ‘नहीं जाओगे?’, ‘देबेनि?’ यानी ‘नहीं दोगे?’, आदि। हालाँकि ‘बोकिनी’ इस तरह सामान्यतः नहीं कहा जाता)।

लेखक संजय बंदोपाध्याय कहते हैं:
“अगर यह लेख अच्छा लगे तो तारीफ़ मुझे ही कोरियेगा। लेकिन अगर पढ़कर ठुकाई करने का मन करे, तो उसकी ज़िम्मेदारी मेरी नहीं। सच में कह रहा हूँ—छोड़ीदी और रातू ने हौसला बढ़ाया, जयादा गैस कहा कर लेखको पब्लिक कर दिया। अगर बुरा लगे तो बताइए, उनका पता दे दे दूँ।”

प्रकाशित तिथि: 10 सितम्बर, 2021