খরগোশ আর দন-দনা-দন

“আমরা খরগোশ দলে দলে

বাস করি ওই গাছের তলে

করাইশুটি আর কপি ক্ষেতে

লুটোপুটি যাই সবাই মিলে।“  

ছড়াটা শুনেছেন? শুনলে ভালো, না শুনলে আরও ভালো; ওই ছড়াটাই এক বিকেলে আমার জীবনে অনেক দুঃখ এনে দিয়েছিল। গল্পটা বলি শুনুন।

তখন আমি বেড়ে-টেড়ে সাত বছরের ধেরে হয়ে গেছি। হীরেন রায় আমাকে একটা ছোট্ট সেতার বানিয়ে দিলেন। আমার তো খুশি আর ধরে না। পাপা, সা রে গা মা, সারেগা, রেগামা এসব শেখাতে শুরু করলেন। শুরু শুরু তে তো বেশ লাগল, নতুন চকচকে সেতার, সেটা আবার আমি বাজাচ্ছি! এতদিন পাপাকেই বাজাতে দেখেছি, কিন্তু এখন আমার হাতেও সেতার। সমস্যা দু-এক দিন পরের থেকে শুরু হল, আঙ্গুলে এত ব্যথা লাগে, এ তো বড় মুশকিল। অতএব বাজানো কমে গেল। পাপা দেখলেন ছেলে তো বাজাচ্ছেনা। তখন উনি একটা উপায় কষলেন। উনি ভাবলেন, ছেলেকে যদি কোনও মজার গান বাজানো শেখানো যায় তাহলে ইন্টারেস্ট বাড়বে। বিপত্তির শুরু এখানেই। খরগোশ ভালো, খরগোশের ছড়া ভাল, খরগোশের গান ভালো, খরগোশের গান সেতারে ভালো, কিন্তু তাতে যদি ছাল-চামড়া উঠে যায় তাহলে খুব মুশকিল।

সেতার পেয়ে পাড়ার বন্ধুদের মাঝে একটু ফাঁট দেখানোর সুযোগ পেয়ে গেলাম। সুযোগ পেলে কে না ছাড়ে, বলুন? বন্ধুদের বললাম, আমি তো সেতার বাজাই, ওরা তো খুব আগ্রহী হয়ে পড়ল, “তাহলে, শোনা একদিন”। আমি তো বিপদেই পড়ে গেলাম। শোনাবো কি, ওই শুধু সারেগামা? বন্ধুদের বললাম, “শোনাব, শোনাব।“ এর কিছুদিন পরই ওই “খরগোশ”। আমার যা বাজানোর এলেম তাতে ওই খরগোশেই আমি মোটামুটি কুপোকাত। যাই হোক, কিছুদিন পর খরগোশ-করাইশুটি নিয়ে আমার অল্প-স্বল্প লুটোপুটি শুরু হল। মা’কে চুপি-চুপি বললাম বন্ধুরা বাজনা শুনতে চাইছে। সময় কেটে যাচ্ছে কিন্তু বাজনা শোনান আর হচ্ছেনা। আমি জানি ফট করে বন্ধুদের  বাজনা শোনাতে ডাকলে পাপা রেগে বোম হয়ে যেতে পারেন। আর পাপা রেগে গেলে কপালে কি আছে বলা মুশকিল।

একদিন সাহস করে বন্ধুদের ডেকেই ফেললাম, বললাম অমুকদিন চলে আয়। মা’কেও বললাম বন্ধুদের ডেকেছি। সেদিন ঘরের মেঝেতে তোশক তার ওপর পরিষ্কার সাদা চাদর বিছানো হল, মা আমাকে সাদা পাজামা – সাদা পাঞ্জাবী পরিয়ে তৈরি করে দিলেন। আমি তো রেডি, শুধু ঘড়ি দেখছি বন্ধুরা কখন আসবে।  

বন্ধুরা আসার পর সেতার নিয়ে বসে পড়লাম, সে যে কি ফিলিং; মনটা কখনও ফড়িং হয়ে নাচানাচি করছে কখনও বা উচ্চিংরে। তার পর শুরু হল “আমার খরগোশ”। খরগোশ তো গাছের তলায় বাস করে     আর  কপি ক্ষেতে লুটোপুটি খেয়ে টায়ার্ড হয়ে  গেল, তার পর? বন্ধুরা  বলল, “বেশ বেশ; আরও বাজা  আরও শুনব।” আমার তো স্টক শেষ, এখন কি করি? তারপর “সারেগামা”।  এই সারেগামা বাঁচিয়ে দিল, সবাই  বোর হয়ে চলে গেল, আমি স্বস্তির নিঃশ্বাস ফেললাম। তখনও জানিনা যে সুনামি আমার জন্যে অপেক্ষা করছে।

বসার ঘরের পর্দাগুলো ফেলা ছিল তাই অন্য ঘরে কি হচ্ছে তার কোনও আইডিয়া ছিলনা। পর্দা সরিয়ে পাশের ঘরে পা দিয়েই দেখি যমরাজ, মনে পাপা। উনি অফিস থেকে তাড়াতাড়ি চলে এসেছেন, আর আমার হাইলি আর্টিস্টিক কাণ্ড-কারখানার আন্দাজ পেয়ে কোনরকম ডিসটার্ব না করে সোজা অন্য ঘরে ঢুকে গেছেন আর বোঝার চেষ্টা করছেন অন্য ঘরে কি হচ্ছে। আমি ঘরে ঢোকার পরই জিজ্ঞেস করলেন, “এত সাজ-গোজা, কি ব্যাপার?” বললাম বন্ধুর এসছিল, সেতার বাজালাম। তার পরই শুরু দন-দনা-দন, “তিনদিন সেতার শিখে আর্টিস্ট হয়ে গ্যাছো?” আবার দন-দনা-দন, “বাজনা শুরুই হলোনা আর বন্ধু ডেকে বাজনা শোনান হচ্ছে?” দন-দনা-দন। একটা বাক্য তারপরই দন-দনা-দন, দ্বিতীয় বাক্য আবার দন-দনা-দন, এরকম কিছুক্ষণ চলল। তারপর বোধহয় হাতে  ব্যথা পেয়ে গেলেন আর সুনামি থামল।

চুপিচুপি একটা কথা আপনাদের বলে দিই কাউকে প্লিজ বলবেন না; মার খেতে খেতে আমি কিছু ডিফেন্স টেকনিক আবিষ্কার করেছিলাম, তাতে আমার ব্যথা কম লাগতো আর যে মারছে সে কখনও কখনও ব্যথা পেয়ে যেত।

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ১৬ জুলাই ২০২৫        

खरगोश और दन-दना-दन

“हम खरगोश, टोली बना
बैठें उस पेड़ की छाया तले।
मटर-गोभी के खेतों में
लोटपोट हो खेलें मिलजुल के।”

ये कविता सुनी है? अच्छा किया! और न सुनी हो, तो और भी अच्छा – क्योंकि यही कविता एक दिन मेरे जीवन में भारी दुख लेकर आई थी।
अब सुनिए पूरी कहानी।

तब मैं पूरे सात साल का हो चुका था। हिरेन राय ने मुझे एक छोटा-सा सितार बना दिया। खुशी से मेरा दिल बाग-बाग! पापा ने मुझे सिखाना शुरू किया – सा रे गा मा, सारेगामा, रेगामा…
शुरुआत में सब बहुत मजेदार लग रहा था – चमचमाता सितार, और वो भी मैं बजा रहा था! अब तक तो पापा को ही बजाते देखा था, और अब खुद के हाथ में सितार!

मगर कुछ ही दिन में गड़बड़ शुरू हो गई – उंगलियों में ऐसी दर्द होने लगी जैसे कोई कांटे चुभो रहा हो। सितार छूने का मन ही नहीं करता था। पापा ने देखा कि बेटा तो ढीला पड़ गया। उन्होंने एक उपाय निकाला – सोचा कि अगर किसी मजेदार गाने के ज़रिए सिखाऊं तो बच्चे का मन लगेगा। बस, यहीं से शुरू हुई मुसीबत! खरगोश ठीक, खरगोश की कविता ठीक, खरगोश का गाना ठीक, सितार पर ठीक, लेकिन अगर उसी से खाल छिल जाए, तो?

अब सितार मिला है तो मोहल्ले के दोस्तों के बीच थोड़ा रौब जमाने का मौका तो बनता है ना?
मैंने ऐलान कर दिया – “मैं सितार बजाता हूँ!” दोस्तों ने भी फौरन कहा – “तो कभी सुनाओ ना।” अब मैं फंस गया! सुनाऊं क्या? वो ही सा-रे-गा-मा? मैंने टालमटोल करते हुए कहा, “सुनाऊंगा, सुनाऊंगा।”

कुछ दिनों बाद आया वो “खरगोश”! जो थोड़ी-बहुत बजाने की कला थी, उसी खरगोश में सब गड़बड़ हो गई।
खैर, किसी तरह “खरगोश – मटर – गोभी” में थोड़ी बहुत लोटपोट कर ही ली।

मैंने माँ को धीरे से बताया कि दोस्त लोग मेरी बजाई सुनना चाहते हैं। समय बीत रहा था, पर कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ रहा था। अब मुझे मालूम था कि अगर बिना बताए दोस्तों को बुला लूं और पापा को खबर हो जाए, तो समझिए भूकंप आ जाएगा। और जब पापा नाराज़ होते हैं, तो परिणाम अज्ञात और डरावना होता है।

फिर एक दिन हिम्मत जुटाकर दोस्तों को बुला ही लिया – “फलां दिन आ जाना!” माँ को भी बता दिया – “माँ, दोस्तों को बुलाया है।” उस दिन घर में उत्सव जैसा माहौल बन गया – बैठक में तोशक बिछा, उस पर सफेद चादर,
माँ ने मुझे सफेद पायजामा और कुरता पहना दिया – एकदम कलाकार बना दिया।

अब मैं तैयार बैठा – बस घड़ी देख रहा हूँ कि दोस्त कब आएंगे। दोस्त आए, और मैं सितार लेकर बैठ गया।
उस वक्त की फीलिंग! मन जैसे फुदकता टिड्डा, कभी उछलता, कभी डरता। फिर मैंने शुरू किया – “हम खरगोश टोली बना…” खरगोश गाना खत्म हुआ – मटर-गोभी खा-खा के थक गए खरगोश।
दोस्तों ने कहा – “बहुत अच्छा! और सुनाओ!”

अब मेरी तो पूरी तैयारी बस इतने पर थी। तो फिर मैंने सहारा लिया – “सा-रे-गा-मा”। बस वही मुझे बचा ले गया – दोस्त बोर होकर चले गए और मैं चैन की सांस ले पाया। तब तक मुझे अंदाजा नहीं था कि एक सूनामी मेरा इंतजार कर रही है।

बैठक के परदे गिरे हुए थे – इसलिए पता ही नहीं चला कि बगल के कमरे में क्या चल रहा था। जब परदा हटा और मैं उस कमरे में घुसा… सामने यमराज खड़े थे – यानी पापा। वो दफ्तर से जल्दी लौट आए थे, और मेरे महान कलात्मक करतब की भनक लगाकर बिना कोई हलचल किए, चुपचाप दूसरे कमरे में जा बैठे थे – सब सुन रहे थे।

मैं जैसे ही कमरे में घुसा, पापा बोले, “इतनी सज-धज क्यों? क्या बात है?” मैंने कहा – “दोस्त आए थे, सितार बजाया।” बस, फिर क्या था – शुरू हुआ दन-दना-दन! “तीन दिन सीखा और कलाकार बन गया?” – दन-दना-दन! “अभी ठीक से सुर पकड़ना नहीं आया, और दोस्तों को बजाकर सुना भी दिया?” – दन-दना-दन! हर वाक्य के बाद दन-दना-दन। दूसरा वाक्य – फिर दन-दना-दन। ये सिलसिला थोड़ी देर तक चला…
फिर शायद उनके हाथ दुखने लगे और तूफान रुका।

अब एक बात चुपचाप आपसे कहता हूँ – कृपया किसी को मत बताइएगा। मार खाते-खाते मैंने कुछ डिफेंस टेक्निक खोज लिए थे – जिनसे मुझे कम दर्द होता था, और मारने वाले को कभी-कभी ज्यादा हो जाता था!