সেতার, বেড়াল ও জেসপা

First posted on May 13, 2014 by sitardivine

তখন আমরা ২০ বিধান পল্লীর বাসাবাড়ীতে থাকি. ওখানে রেলগাড়ীর ডিব্বার মত সারি দেওয়া তিনটে ঘর ছিল, তারপর রান্নাঘর আর এছাড়া একটা ঘর একটু আলাদা, সেখানে আমি রেয়াজ করতাম| সেদিন পাপা বাড়িতে, আমিও সেতার নিয়ে মাঝের বড় ঘরে চলে এসেছি| পাপা খাটে শুয়ে আছেন আর আমি মেঝেতে বসে বাজাচ্ছি| সে সময় বেশ বেড়ালের উৎপাত ছিল, আর মনে হয় বেড়ালের পপুলেশনও বেশ বেশি ছিল| কারণ খুব স্পষ্ট| এখান আর অত ঘন ঘন বেড়াল চোখে পড়েনা| যদিও বেড়াল পরিসংখ্যান কোথাও তেমন করে দেখিনি, তবে এ কথা নিজের অভিজ্ঞতা থেকে হলফ করে বলতে পারি| অন্য একটা সম্ভাব্য কারণ অবশ্য, বেড়াল সম্প্রদায়ের বুদ্ধি ক্রমশঃ কমে যাচ্ছে| এ সম্পর্কে বেড়ালবিদ পন্ডিতেরা আরও ভাল বলতে পারবেন| আমি যে কথা বলতে চাইছিলাম তা হচ্ছে মাছ, দুধ ইত্যাদি বেড়ালের জিভে না পৌঁছে যাতে আমাদের জিভ স্পর্শ করে তারই জন্য আমাদের জানালার শিক্গুলোতে লোহার তার লাগান হয়েছিল| খুব যে ঘন তা নয়, তবে সাধারণ বেড়ালের সাইজ থেকে বেশ ছোট|

আমার কোনদিন সেতারি হয়ে ওঠার ব্যাপারে পাপার প্রবল সন্দেহ ছিল| বলতেন, “এত নরম হাতে সেতার কি বাজবে, ডা-রাই বাজাতে পারিসনা|” এছাড়াও গান-বাজনার লাইনে এপাশ-ওপাশ থেকে গুঁতো খেয়ে গান-বাজনা পেশাদারী সম্পর্কে ওঁর অনেক বিপরীত বক্তব্য ছিল| তবে শেখাতে কার্পন্য করেননি| একটু এপাশ ওপাশ হলেই ভুল ধরিয়ে দিতেন|

সেদিন রেয়াজ করছি, বেশ মন দিয়েই বাজাচ্ছিলাম|সেতারে জোরে ঠোক মেরে রা-রা বাজাতে বেশ ভাল লাগত| মনের খুশিতে হঠাৎ মেরে দিলাম জোরসে ঠোক, তারপরেই ঘটে গেল সে ভীষণ ব্যাপার| দেখি, কিছু একটা সাদা লম্বাকার জিনিস পিঠে ধাক্কা দিয়ে, সেতারে ধাক্কা মেরে তীব্র গতিতে জানালার ফোকর দিয়ে ছিটকে বেরিয়ে গেল| তাকিয়ে দেখি তারের একটা ফোকড় বেশ কিছুটা বড় হয়ে গেছে আর তার চারদিকে সাদা লোম| পাপাও হঠাৎআওয়াজে ধড়মড়িয়ে উঠে বসলেন| সব কান্ড বুঝে চিৎকার করে উঠলেন, “দেখছিস তোর বাজনার বহর, বেড়াল কিভাবে ভয় পেয়ে পালাচ্ছে? বেড়ালের যদি এই হয় তাহলে মানুষের কি হবে ভাবতে পারছিস?” আমি কিছুটা মুষড়ে পড়লেও বাজনা থামালামনা|

এরপর বেশ কয়েক বছর কেটে গিয়েছে| আমি তখন লম্বা সময় ধরে রেয়াজ করি| নানা জায়গায় বাজাতেও শুরু করেছি| সে সময় কালীবাড়ী লেন-এ ওস্তাদজীর বাড়ির পরের গলিতেই একটা টিউশনি পেয়ে গেলাম| ছাত্রের নাম ‘দোলন’| সে আমার থেকে বয়সে অনেকটা বড় হলেও তা কখনও বুঝতে দেয়নি| ছাত্র-শিক্ষক সম্বন্ধের যথেষ্ঠ সম্মান করত| ওকে আমি বলতাম ‘ছাত্র বাবু’| সেই ছাত্র বাবুর একটা পেল্লাই সাইজের ডোবারমেন কুকুর ছিল| নাম ছিল ‘জেসপা’| দারুন স্মার্ট| একদিন শেখাতে  পৌঁচেছি, দেখি জেসপার মেজাজ খুব গরম| খুব জোরে চেঁচিয়ে চলেছে| অনেক চেষ্টা করেও তাকে শান্ত করা যাচ্ছেনা| ছাত্র বাবু, তার স্ত্রী, সবাই অনেক চষ্টা করে হাল ছেড়ে দিলেন| আমি ভাবলাম একটা পরীক্ষা করে দেখা যাক্| গুরুর নাম নিয়ে আমি সেতার হাতে তুলে হাল্কা করে আলাপ বাজাতে শুরু করলাম| অবাক কান্ড! কিছুক্ষনের মধ্যেই জেসপা-র চিৎকার কমে গেল, তারপর চুপ করে শুয়ে পড়ল| এ ত ম্যাজিক!! গুরুদের মুখরক্ষা হ’ল, অল্প হলেও আমার গুরুদের সেখান বিদ্যে কাজে লেগে গেল|

Hindi Translation

सितार, बिल्ली और जैस्पा
(पहली बार पोस्ट किया गया – 13 मई, 2014, sitardivine द्वारा)

उस समय हम 20 विधान पल्ली के मकान में रहते थे। वहाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह लाइन में तीन कमरे थे, फिर रसोई, और एक अलग कमरा जहाँ मैं रियाज़ करता था। उस दिन पापा घर पर थे, और मैं सितार लेकर बीच वाले बड़े कमरे में आ गया। पापा खाट पर लेटे हुए थे, और मैं फर्श पर बैठकर सितार बजा रहा था।

उन दिनों बिल्लियों का खासा आतंक था — लगता है बिल्ली जनसंख्या भी काफी अधिक थी। कारण बहुत स्पष्ट है, अब वैसी बिल्ली की भरमार नहीं दिखती। हालांकि बिल्ली जनगणना कहीं नहीं देखी, लेकिन अपने अनुभव से पूरी शपथ लेकर कह सकता हूँ। एक और संभावना भी है: शायद बिल्ली जाति की बुद्धि धीरे-धीरे घटती जा रही है — इस पर ‘बिल्लीतत्व’ के विशेषज्ञ पंडित ज़्यादा प्रकाश डाल सकते हैं।

मैं जो बात कहना चाहता था वह ये कि मछली, दूध वगैरह बिल्लियों की जीभ तक न पहुँच जाए और हमारे ही हिस्से में आए — इस उद्देश्य से हमने खिड़कियों पर लोहे की तार लगवाई थी। तारें बहुत घनी नहीं थीं, पर एक औसत बिल्ली के लिए अंदर घुसना मुश्किल था।

मेरे सितारी बनने को लेकर पापा को हमेशा संदेह था। कहते, “इतने नरम हाथों से सितार क्या बजेगा? डा-रा भी ढंग से नहीं बजा पाता।”
गायन-वादन को पेशेवर रूप से अपनाने को लेकर उनके विचार काफ़ी विरोधी थे — शायद उन्होंने इधर-उधर से ठोकरें खाई थीं। फिर भी उन्होंने सिखाने में कोई कंजूसी नहीं की। ज़रा सी भी चूक होती तो तुरन्त पकड़ लेते।

उस दिन मैं रियाज़ में डूबा हुआ था। सितार पर ज़ोर से ठोक कर ‘रा-रा’ बजाने में बड़ा आनंद आ रहा था। मन के उत्साह में मैंने एक ज़ोर की ठोक दी… और तभी हुआ एक अजीब हादसा!
देखता हूँ — एक लंबी सफेद आकृति मेरी पीठ से टकराकर, सितार पर धक्का मारकर खिड़की की सलाखों के बीच से बिजली की गति से निकल गई! देखा, खिड़की की तार का एक हिस्सा अब काफ़ी बड़ा हो चुका था और वहाँ सफेद बालों का गुच्छा चिपका था।

पापा भी उस तेज़ आवाज़ से चौंककर उठ बैठे। जब पूरी घटना समझ में आई तो झल्लाकर बोले,
“देख रहा है तेरी बजाने की धाक? बिल्ली डर के मारे भाग गई! अगर बिल्लियों की ये हालत है तो सोच इंसानों का क्या होगा?”
मैं थोड़ा मायूस ज़रूर हुआ, पर बजाना बंद नहीं किया।

इसके कई साल बाद की बात है। अब मैं घंटों रियाज़ करता, और अलग-अलग जगहों पर बजाने भी लगा था।
इसी दौरान मुझे कालिबाड़ी लेन में उस्ताद जी के घर के पास एक ट्यूशन मिल गई। छात्र का नाम था दोलन। उम्र में मुझसे काफ़ी बड़ा था, लेकिन व्यवहार में उसने कभी इसका अहसास नहीं होने दिया। छात्र-गुरु के रिश्ते का पूरा सम्मान करता था। मैं उसे ‘छात्र बाबू’ कहता था।

उस छात्र बाबू का एक बहुत बड़ा डॉबरमैन कुत्ता था — नाम था जेस्पा। बड़ा स्मार्ट जानवर था।
एक दिन मैं सिखाने पहुँचा तो देखा जेस्पा का मूड बहुत गर्म है। ज़ोर-ज़ोर से भौंक रहा है।
छात्र बाबू, उनकी पत्नी — सबने बहुत कोशिश की, लेकिन वो शांत नहीं हो रहा था।
मैंने सोचा, एक प्रयोग करते हैं।

गुरु का नाम लेकर मैंने सितार उठाया और हल्के सुरों में आलाप बजाना शुरू किया।
हैरत की बात! कुछ ही पलों में जेस्पा की आवाज़ धीमी पड़ने लगी — फिर एकदम शांत होकर ज़मीन पर लेट गया।

ये तो जादू था!
गुरुजनों की लाज रह गई — और थोड़ा-बहुत सही, उनकी दी हुई विद्या ने अपना काम कर ही दिया!

শোনা শুরু

First posted on May 13, 2014 by sitardivine

তখন আমি বেশ ছোট| অল্পদিনের মধ্যেই সব জামা-কাপড় কেমন যেন আঁটোসাঁটো হয়ে উঠত, জুতোর তো কথাই নেই| কাজেই, জুতো, পাতলুন, কামিজ সবই কেনা হোত দু-সাইজ বড় | দুর্গাপূজো এলেই এ-দোকান সে-দোকান, নানা রঙের জামা কাপড়ের ভীড়, আর তার মধ্যেই কয়েকটা পেয়ে যাওয়া, বেশ খুশী হতাম| পড়াশুনোর রোজকার চাপাচাপি থেকেও কিছুদিন রেহাই পেতাম| খুব ভালো লাগত প্যান্ডেলে-প্যান্ডেলে বাজতে থাকা মাইকের গান| তখন গ্রামোফোন এ গোল-গোল কালো চাকতি চালিয়ে গান বাজান হোত| ‘খোয়া খোয়া চাঁদ’, প্যার কিয়া তো ডরনা কেয়া, আই আই ইয়া করুঁ ম্যায় কেয়া সুকু সুকু’, আরও কত কি! বাড়ীতে এসব সুন্দর মিষ্টি গান শোনার ওপর কড়া সেন্সর ছিল|এসব নাকি খেলো গান, শুনলেই ছেলে বয়ে যাবে! জ্যাঠার বাড়িতে একটা ঢাউস রেডিওগ্রাম ছিল| সেখানে আটটা চাকতি চাপিয়ে দিলে একটার পর একটা বাজতে থাকত| সেখানে ফৈয়াঁজ খাঁন, আব্দুল করিম খাঁন, কেসরবাঈ, বড়ে গুলাম, ভীস্মদেব, তারাপদ বাবু, গওহরজান, জ্ঞান গোঁসাই, সুধীরলাল চলত|আমার কিন্তু ওই ‘খোয়া খোয়া চাঁদ’-ই বেশী ভাল লাগত|

আমরা তখন থাকি ৩৬বি বেচারাম চ্যাটার্জ্জী রোডের ভাড়াবাড়িতে তে| পারে সে বাড়ির নম্বর বদলে ২৮ হয়েছিল| বাড়ীতে একটা মাঝারি সাইজের মারফি রেডিও এল| কি যে আনন্দ হয়েছিল বলে বোঝান মুস্কিল| ভাবলাম এ বেশ ভাল হোল, মজা করে গান শোনা যাবে| কিন্তু পারে বুঝলাম ‘সে গুড়ে বালি’| সে কথাই বলছি শুনুন|

তখন সবে পূজো-প্যান্ডেলের ম্যারাপ বাঁধা শুরু হয়েছে|নতুন শরৎ এর রোদ্দুরে শুধু খুশী আর খুশী, ইস্কুল বন্ধ হবে হবে ভাব| সেদিন রবিবার, গেলাম পাশের বাড়ীর অমলদার কাছে| সেখানে গিয়ে দেখি সে মহানন্দে হিন্দি গান শুনছে, মানে ওই হিন্দী সিনেমার গান| আমি ত’ অবাক! অমলদাকে তো কেউ বকছেনা! আরও অবাক হলাম, রেডিওতে সেই মাইকের গানগুলোই বাজছে| আমার জানা স্টেশন থেকে এসব গান শোনা যেতনা| আমি তো শুধু সকালে আর রাতে ওই না-ভালো-লাগা গানবাজনা আর খবর শুনতে পেতাম| অমলদাকে সটান প্রশ্ন করলাম, “অমলদা, তুমি ওই মাইকের গানগুলো রেডিওতে কি করে শুনছ?” সোজা উত্তর এল, “আরে নতুন একটা স্টেশন হয়েছে ‘বিবিধ ভারতী’, সেখানেই শোনা যায়|” এটা বোধহয় ষাটের দশকের শুরুর দিকের কথা| দেখে আসলাম স্টেশন কি করে ধরা যায়| অমলদা বুঝিয়ে দিল, স্টেশন ধরার কাঁটা-টা এক্কেবাব্রে ডানদিকে নিয়ে গিয়ে অল্প-স্বল্প নাড়ালেই ‘বিবিধ ভারতী’|আমাকে আর পায় কে! আমি তো নাচতে নাচতে বাড়ি ফিরলাম|

সেসময় ‘বিবিধ ভারতী’ এখনকার মত সারাদিন ধরে চলতনা, তাই কিছুক্ষণ অপেক্ষা করতে হোল| দুপুর একটা নাগাদ রেডিও অন করে কিছুক্ষণ খোঁজাখুজি করতেই আমার সাধের স্টেশন এর নাগাল পেয়ে গেলাম| সে কি আনন্দ! গানের পার গান চলতে লাগল| সে-সময় পিসি আমাদের সাথেই থাকত| হঠাৎ পিসির গলা কানে এল, “এসব কি লারেলাপ্পা শোনা হইতাসে?” রেডিওর আওয়াজ কিছুটা কমিয়ে দিয়ে কথাটা শুনিনি শুনিনি করে রইলাম| কিছুক্ষণ পার পিসির ধৈর্যের বাঁধ ভেঙে গেল, “পোলাডা এক্কেরে অপগন্ড হইসে| বাপে রবিশঙ্করের ছাত্র আর পোলায় শোনে লারেলাপ্পা| দেইখ্যা আয়, তর সোট ভাই কিটু, হেয়ায় ক্যামন মাথা নাড়াইয়া নাড়াইয়া আব্দুল করিম শোনে …|” এরপর আর রেডিও শোনা চলেনা, অতএব বন্ধ করতেই হোল|

তখন আমার সাইজ পাড়ার হুলো বেড়ালটার থেকে খুব একটা বড় ছিলনা| রেডিও রাখার পরেও টেবিল-এ যা জায়গা থাকত তাতে আমি বেশ আরাম করে আসন-কেটে বসে যেতে পারতাম| পিসির ওই বকাটা মন থেকে কিছুতেই যাচ্ছিলনা| ওই গান কিটু শোনে!! তাহলে আমাকেও চেচ্টা করে দেখতে হবে| দুপুর একটা থেকে দেড়টা রেডিওতে খেয়াল ইত্যাদি বাজান হোত| আমিও ওইসময় রেডিও তারস্বরে চালিয়ে টেবিলে বসে মাথা নাড়াতে শুরু করতাম| পিসি কাছাকাছি থাকলে মাথা নাড়ানর গতি তীব্রতর হোত| খুব চাইতাম যে পিসি দেখুক, কিন্তু দেখত বলে মানে হতনা| আমার বেশ কিছুদিন মাথা নাড়িয়ে চেষ্টা চালিয়ে যাবার পর একদিন দুপুরে পিসি খেতে খেতে বলল, “ইবার ইটারে বাড়ির পোলা মনো হয়| কি যে ছাই-ছাতা শোনন শুরু করসিলি…”

শুরুতে ভালো না লাগলেও শেষমেষ রাগ-তালের নেশাটা লেগেই গেল|

Hindi translation

सुनना शुरू
(प्रथम प्रकाशन – 13 मई, 2014, लेखक: sitardivine)

तब मैं काफ़ी छोटा था। कुछ ही दिनों में मेरी सारी कमीज़-पतलून तंग लगने लगतीं, जूतों का तो कहना ही क्या! इसलिए हर चीज़ — जूते, पतलून, कमीज़ — दो साइज़ बड़ी ख़रीदी जाती। दुर्गा पूजा आते ही हम इस दुकान से उस दुकान भागते रहते — रंग-बिरंगे कपड़ों की भीड़ में से कुछ पसंद के कपड़े मिल ही जाते और मैं बहुत खुश हो जाता। पढ़ाई के रोज़ाना के तनाव से भी कुछ दिनों की राहत मिल जाती।

पंडाल दर पंडाल बजने वाले माइक के गानों का जो मज़ा था, वो क्या कहें! तब ग्रामोफोन पर गोल-गोल काले रिकॉर्ड चला करते थे। “खोया खोया चाँद”, “प्यार किया तो डरना क्या”, “आई आई या करूं मैं क्या, सुकू सुकू”… और भी न जाने कितने!

लेकिन घर में इन मीठे, मधुर गानों पर सख़्त सेंसर था — इन गानों को “हल्का-फुल्का” कहा जाता, और माना जाता कि इन्हें सुनते ही बच्चे बिगड़ जाते हैं!

मेरे चाचा के घर एक बहुत बड़ा रेडियोग्राम था। उसमें एक बार में आठ रिकॉर्ड लगाए जा सकते थे, और वे एक के बाद एक बजते रहते। वहां फ़ैयाज़ ख़ाँ, अब्दुल करीम ख़ाँ, केसरबाई, बड़े ग़ुलाम अली, भीष्मदेव, तारापद बाबू, गौहरजान, ज्ञान गोस्वामी, सुधीरलाल जैसे कलाकारों की आवाज़ें गूंजती रहतीं।

मगर मुझे तो “खोया खोया चाँद” ही ज़्यादा भाता था।

तब हम ३६बी बेचाराम चटर्जी रोड के एक किराए के मकान में रहते थे। बाद में उस घर का नंबर बदलकर २८ हो गया था। एक दिन घर में एक मिड-साइज़ मर्फी रेडियो आया — मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था! लगा अब मस्ती से गाने सुना करूंगा।

मगर बहुत जल्दी समझ में आ गया — उस गुड़ में तो रेत मिली थी!”
अब सुनिए आगे की बात…

तब पूजा के पंडाल की बाँस-बल्ली लगनी शुरू ही हुई थी। नई-नई शरद की धूप में हर तरफ खुशी ही खुशी — और स्कूल बंद होने के संकेत भी!

उस रविवार को मैं पड़ोस के अमल दा के घर गया। वहां जाकर देखा — वह मस्त होकर हिंदी फिल्मी गाने सुन रहा है! मैं चौंक गया — किसी ने उसे डांटा भी नहीं! और आश्चर्य की बात — वो वही माइक वाले गाने थे!

मैं तो समझ नहीं पाया — क्योंकि हमारे रेडियो पर तो ऐसे गाने कभी नहीं चलते थे। हमें तो बस सुबह-शाम वही उबाऊ रागदारी और खबरें मिलती थीं।

मैंने झट से अमल दा से पूछा —
अमल दा, तुम रेडियो पर माइक वाले गाने कैसे सुन रहे हो?”
उसने सीधे जवाब दिया —
अरे, अब एक नया स्टेशन शुरू हुआ है — विविध भारती, वहीं से सुनते हैं!”

शायद ये बात 60 के दशक की शुरुआत की है।
मैंने वहीं से देख लिया कि स्टेशन कैसे पकड़ते हैं। अमल दा ने सिखा दिया —
स्टेशन पकड़ने वाली सुई को बिल्कुल दाहिनी तरफ ले जाकर थोड़ा हिलाओ, विविध भारती मिल जाएगा।”

बस फिर क्या — मैं तो नाचते-गाते घर वापस आया!

उस समय विविध भारती आज की तरह पूरे दिन नहीं चलता था। थोड़ा इंतज़ार करना पड़ता था। दोपहर करीब एक बजे रेडियो ऑन किया, और थोड़ी खोजबीन के बाद मेरा पसंदीदा स्टेशन मिल ही गया।

क्या ख़ुशी हुई — एक के बाद एक गाने बजते रहे!

उसी समय मेरी पिसी (बड़ी बुआ) हमारे साथ ही रहती थीं। तभी अचानक उनकी आवाज़ आई —
ये क्या बकवास गाने सुने जा रहे हैं?”

मैंने रेडियो की आवाज़ थोड़ी धीमी कर दी और ऐसे जताया जैसे कुछ सुना ही नहीं।

कुछ देर बाद पिसी का धैर्य टूट गया —
ये लड़का तो बिगड़ ही गया है। बाप रविशंकर का शागिर्द और बेटा सुन रहा है लफंगे गाने! देख तो, तेरा छोटा भाई कितू कैसे सिर हिला-हिलाकर अब्दुल करीम ख़ाँ सुनता है…”

बस — उसके बाद रेडियो बंद करना ही पड़ा।

तब मेरा साइज़ मोहल्ले की बिल्ली से ज़्यादा नहीं था। रेडियो रखने के बाद टेबल पर जो थोड़ी जगह बचती, वहां मैं मजे से बैठ सकता था।

पिसी की वो डांट मुझे बिल्कुल नहीं भूली।
कितू सुनता है वो संगीत!”
मतलब अब मुझे भी कोशिश करनी चाहिए!

दोपहर 1 से 1:30 बजे तक रेडियो पर ख़याल आदि बजते थे। मैं भी उस समय रेडियो को तेज़ करके टेबल पर बैठकर सिर हिलाने लगता।

अगर पिसी पास होतीं, तो सिर हिलाने की स्पीड और भी बढ़ा देता — मन में यही इच्छा कि पिसी देखे!

हालाँकि जब वो देखतीं तो जाहिर नहीं करतीं।

कई दिनों तक सिर हिलाने की इस मेहनत के बाद एक दिन दोपहर के खाने के वक्त पिसी बोलीं —
अब लगता है लड़का अपने घर का ही है! जाने क्या-क्या बकवास सुना करता था…”

शुरू में मन नहीं भी लगा, तो क्या —
अंत में राग-ताल की लत लग ही गई!

ফিরে দেখা

First posted on May 5, 2014 by sitardivine

জমাটি লেখা পড়তে ভালোবাসি, কিন্তু হঠাৎ করে লিখতে বসে যাব কখনো ভাবিনি|আসল কথাটা বলি শুনুন, সে সব বলতে গেলে অনেক কথা এসে ভীড় করে| বেশ ক’বছর হোল আমাদের পাড়ার অনুষ্ঠানের স্মারিকায় আমার একটা লেখা ছেপেছিল| বিপদের শুরু সেখান থেকেই| সত্যিটা হচ্ছে, লেখাটা আমি লিখিইনি! অবাক হলেন? সে কথা না হয় পরে কখন খোলসা করে বুঝিয়ে বলব| কিন্তু ঘটনা যেটা ঘটল তা হোল সেটি পড়ে অনেকেই, বাংলায় যাকে বলে, ইম্প্রেসড হয়ে গেলেন| তখন থেকে অনেকেই বলছেন কিছু লেখা বাংলায় লিখে ফেলতে| আমি লিখতে চাইনা, হাতের লেখা দেখলে কাকেরাও লজ্জা পায়| আমি টাইপ করি| এতদিনে বাংলায় লেখার, থুড়ি, টাইপ করার একটা যুতসই ব্যবস্থা করা গেল| অতএব লেখা শুরু|
সময় ব্যাপারটা গোলমেলে, মনে হয় অনেকটাই ভাবনার সাথে জড়ান| বেশ কয়েক বছরের পুরানো ঘটনা কখনো মনে হয় ‘এই তো সেদিন’ আবার কখনও কতদিন আগের|কিছু থাকে ঝকঝকে আর কিছু কেমন যেন ধুলো পড়ে ধুলোটে| আমি গান-বাজনাতে বেঁচেছি, এতেই জেগেছি, স্বপ্নে মজা করে শুনেছি| সেতারকে ভালবাসার অনেক ‘ট্যাক্সো’ আছে; দিয়েছি| এনাকে বোঝা আর বাগে আনার মধ্যে বিস্তর দুরত্ব| যদি বা কোনক্রমে কথা শুনতে শুরু করেন তারপর তাকে দিয়ে গল্প বলানো বা ছবি আঁকান, সে’ত যেনতেন কাজ নয়| আমি ভাবছিলাম সে-সব কথাই কিছুটা আপনাদের সাথে ভাগাভাগি করব|
একটা ছোট্ট কথা বলে নিই| আমার চরিত্র চিরকালই কিছুটা বেয়াড়া ধরনের| ভক্তি-শ্রদ্ধা নিয়ে চিরকালই অভাব অনটন| সোজাসুজি মেনে নেওয়ার ক্ষমতাই ছিলনা, বোধহয় এটা কোন ম্যানুফ্যাকচারিং ডিফেক্ট| নিজের মত করে বুঝে নেবার একটা তীব্র প্রচেষ্টা, যাতে স্বাভাবিক কারণেই বয়স্কদের অসভ্য না ভাবার কোনো কারণ ছিলনা| কিন্তু কিচ্ছু অজানা কারণে এতসব অবগুণ থাকা সত্যেও সবাই সহ্য করতেন| একটা কারণ বোধহয় আমাকে বোঝাতে শেখাতে বড়দের তেমন কোন বেগ পেতে হতনা| ওস্তাদজী বলতেন, “ছোঁড়ার আর যাই থাক, না বোঝার ব্যামোটা নেই|”

ছায়াচিত্র : রাখী ব্যানার্জী০৭  মে ২০১৪

पीछे मुड़कर देखना

मैं बढ़िया लेख पढ़ना बहुत पसंद करता हूँ, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि अचानक खुद लिखने बैठ जाऊँगा। अब सच्ची बात सुनिए—अगर वह कहने बैठूं तो कई बातें आकर उमड़ पड़ती हैं। कुछ साल पहले हमारे मुहल्ले की एक स्मारिका में मेरा एक लेख छपा था। बस, यहीं से मुसीबत शुरू हुई!

असल बात तो यह है—वह लेख मैंने लिखा ही नहीं था! चौंक गए ना? खैर, वह किस्सा बाद में खुलकर बताऊँगा। लेकिन जो हुआ वह यह कि उस लेख को पढ़कर कई लोग—जैसा बंगाल में कहते हैं—”इम्प्रेस्ड” हो गए। तभी से कई लोग कहने लगे कि मुझे बांग्ला में कुछ लिखना चाहिए।

मैं लिखना नहीं चाहता। मेरी लिखावट देखकर कौवे भी शरमा जाएँ! इसलिए मैं टाइप करता हूँ। अब जाकर बांग्ला में टाइप करने की एक सही व्यवस्था हो पाई है। तो फिर लिखना शुरू किया जाए!

समय बड़ा अजीब चीज़ है—शायद यह हमारे सोचने के तरीके से जुड़ा होता है। कई साल पुरानी घटनाएँ कभी-कभी लगती हैं जैसे “अभी तो कल की बात है”, और कभी लगता है बहुत पहले की बात है। कुछ यादें चमकती रहती हैं, कुछ पर जैसे धूल जम गई हो।

मैं संगीत में जिया हूँ, उसी में जागा हूँ, और सपनों में भी संगीत सुना है। सितार से प्यार करने में बहुत “टैक्स” चुकाने पड़ते हैं—और मैंने चुकाए हैं। इस वाद्य को समझना और वश में करना दो अलग बातें हैं। अगर किसी तरह वह आपकी बात सुनने लगे, तो उससे कहानी कहलवाना या चित्र बनवाना कोई मामूली काम नहीं है।

मैं सोच रहा हूँ कि ऐसे ही कुछ अनुभव आपसे बाँटूँ।

एक छोटी-सी बात बता दूँ। मेरा स्वभाव हमेशा से थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा रहा है। भक्ति-श्रद्धा की मुझमें हमेशा कमी रही है। सीधे-सीधे बात मान लेने की क्षमता शायद मेरे “मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट” में शामिल थी! अपनी समझ से चीजों को जानने की ज़िद, जो बड़ों को ज़्यादातर समय बदतमीज़ी सी लगती थी।

फिर भी पता नहीं क्यों, इतने सारे दोषों के बावजूद सब लोग मुझे सहन कर लेते थे। शायद इसका एक कारण यह था कि मुझे समझाने में बड़ों को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। मेरे उस्तादजी कहा करते थे, “छोरे में और जो कुछ हो, लेकिन समझ में कमी नहीं है।”


Looking Back

I love reading solid, engaging writing—but I never thought I’d suddenly sit down to write something myself! Let me get to the truth—once I start talking about it, too many stories rush in. A few years ago, one of my pieces was published in our neighborhood souvenir. And that, unfortunately, was where the trouble began.

Because, truth be told—I didn’t even write that piece! Surprised? I’ll explain that mystery some other time. But the point is, after reading it, many people—well, to use the Bengali phrase—were “impressed.” Since then, I’ve been urged to write something in Bengali.

I really don’t enjoy writing by hand—my handwriting is so terrible, even crows would feel embarrassed. So I type. It’s only recently that I’ve managed to set up a decent way to type in Bengali. So here I am, starting to write.

Time is a strange thing—it seems tangled with how we think. Events from several years ago sometimes feel like “just the other day,” and other times like they happened in another life. Some memories are crisp and sparkling, while others are dusty and faded.

I have lived through music, woken up through music, and even enjoyed listening to it in my dreams. Loving the sitar comes with many “taxes”—and I’ve paid them. Understanding this instrument and mastering it are far from the same. If, by some miracle, it begins to respond to you, coaxing it to narrate a story or paint a picture is no ordinary task.

I thought I would share a bit of those experiences with you.

One little thing—I’ve always had a somewhat unruly personality. I’ve never had much stock in reverence and devotion. I couldn’t accept things as they were—perhaps a manufacturing defect! I had this strong impulse to figure things out in my own way, which naturally made elders view me as a bit uncivil.

But strangely enough, despite all these shortcomings, people around me always put up with me. Maybe because it didn’t take too much effort to explain things to me. As my Ustadji used to say, “The boy may lack many things, but not understanding!”

প্রণবদা ও পুলিশ

First posted on May 13, 2014 by sitardivine

আমদের গুরুভাই প্রনবদা সরকারী চাকরি করতেন, আমার সাথে খুব ভাব ছিল| উনি সরোদ বাজান| তখন উনি আফিস করতেন রাইটার্স বিল্ডিং এর পাঁচতলায়| আমি প্রায়ই কলেজ পালিয়ে ওঁর কাছে পৌঁছে যেতাম| তখন আমি বিদ্যাসাগর কলেজে ফিজিক্স নিয়ে যুদ্ধ করি|প্রণবদা আমার গান-বাজনার দুঃখ-কষ্টের ফিরিস্তি শুনতে শুনতে কখনই হাঁপিয়ে উঠতেননা| কত গৎ, কত রাগের আলোচনা যে রাইটার্সবিল্ডিং এ হয়েছে তার সাক্ষী প্রণবদার সেই টেবিল আর তার বাঁদিকের চেয়ারটি| ওস্তাদজীর কাছে তালীম, অন্য গাইয়ে বাজিয়েদের গান-বাজনা, এসব নিয়েই নানা প্রশ্ন আর তা নিয়ে, যাকে বলে, ফ্রিস্টাইল বাদানুবাদ| নিজেদের মধ্যেই প্রশ্ন তৈরী আর তা নিয়ে ঘন্টার পর ঘন্টা তর্ক-বিতর্ক| আমাদের ওস্তাদজীর ছাত্র হওয়ার একটা স্পষ্ট অহঙ্কার ছিল| আমরা জানতাম যে আমরা যেমনটি খাস-তালীম পাচ্ছি তেমনটি দুর্লভ| আমরা জানি যে বাহার রাগের মন্দ্রতে কোমল ‘ণ’ লাগবে শুদ্ধ নয়| এ ধরনের খবর অন্য কোন বিশিষ্ট বাজিয়ের না জানা থাকার প্রমাণ পেলে বেশ খুশী হতাম| নানা সময়ে ওস্তাদজীর সাথে অন্য নামী শিল্পীর কথাবার্তার সময়ে কখনও কখনও কার্যকারণে উপস্থিত থেকেছি| মানে পড়ে একবার উনি ‘সৌরভ’ আফিসের দরজা থেকে বেরিয়ে চেঁচিয়ে বলছেন, “সুনিয়ে, বহার কে মন্দ্র মেঁ কমল নিষাদ হী লগত হ্যাঁয়|” অন্য ওস্তাদটি বললেন, “জী, রাধুদা|” আমার চব্বিশ ইঞ্চি বুক ফুলে আঠাশ হয়ে গেল| বা কখনও, “আপনি কি রবিশংকর ঝেড়ে গান শেখান নাকি? যোগ কবে থেকে শুধু কমল নি-র রাগ হয়ে গেল?” সামনের বিশিষ্ট মানুষটি নিরুত্তর!

এবার আসল কথায় ফিরে আসি|কলকাতা রেডিও-র রেকর্ডিং সেরে সেতার নিয়ে যখন রাস্তায় বেরুলাম তখন দুপুর একটা| রাইটার্স এর দিকে নিজের থেকেই পা-টা চলতে শুরু করলো, বলাই বাহুল্য, প্রণবদার টানে| রাইটার্সের সিকিউরিটি নিয়ে কড়াকড়ি সেসময়ও ছিল, কিন্তু ফাঁকি দেবার রাস্তাও বেশ আয়ত্তে এসে গিয়েছিল| আমি ডালহৌসির ধবধবে সাদা চার্চের উল্টোদিকের লোহার গেট দিয়ে বেশিরভাগ দিন সিকিউরিটির চোখ এড়িয়ে ফুরুৎ করে গলে যেতাম| কখনও যে ধরা পড়িনি তা নয়| কপালদোষে ধরা পড়ে গেলে কাছেই অন্য একটা গেট দিয়ে ঢুকে একটা বড় টেবিল এর সামনে পৌঁছে যেতে হোত| সেখানে বেশ কয়েকজন পুলিশ অফিসার থাকতেন| সেখানেই গেটপাস যোগাড় করা হোত| সেদিন ওই গেটে পাহাড়া হালকা ছিল|অতএব সেতার নিয়ে বিনা বাঁধায় ঢুকে গেলাম| কিছুটা এগিয়েই রাইটার্সের সাবেকি লিফট, লাইনে দাড়ালাম| লিফট ধীরে ধীরে নিচে নেমে এল, এরপর লিফটে ওঠার পালা| প্রায় চড়তেই যাব, হঠাৎ কোথা থেকে কে জানে এক রিভলবারধারী পুলিশ অফিসার আবির্ভূত হলেন| তিনি ত আমাকে দেখেই আটকে দিলেন, “আপনার গেটপাস?” আমি আর কি বলব, আমি ত গেটপাস বানাইনি| উনি বললেন, “আপনি আমার সাথে আসুন|” বুঝলাম গ্রেফতার হয়ে গেলাম| প্রণবদা তখনই কোন কারণে নিচে নেমেছিলেন, আমরা ওঁর চোখে পড়ে গেলাম| প্রণবদা প্রায় চিৎকার করতে করতে দৌড়ে এলেন, “What happened, what happened?” আমায় পুলিশে ধরেছে দেখে বোধকরি টেনসনে ওঁর মুখ দিয়ে ইংরেজী বেরিয়ে এল| উনি নিজের আই-কার্ড দেখিয়ে অনেক বোঝানর চেষ্টা করলেন যে আমি ওনার কাছেই যাচ্ছিলাম; কিন্তু ভবি ভোলবার নয়| পুলিশ অফিসারটি প্রণবদার কথায় কানই দিলেননা| প্রণবদা বুঝলেন যে, “বাত বিগড় গয়ী|” শেষমেষ কোন উপায় না দেখে উনি বললেন, “তাহলে আমিও আপনাদের সাথে আসতে চাই|” অফিসারটি আপত্তি করলেননা| আমি প্রথমে কেমন যেন ভয়ে ঠান্ডা হয়ে গিয়েছিলাম, প্রণবদা সঙ্গে থাকায় বুকে কিছুটা বল পেলাম| লিফটটা ক্যাচর ক্যাচর আওয়াজ করতে করতে ধীরে ধীরে সবথেকে অপরের তলায় পৌঁছে গেল| আমরা সবাই চুপচাপ, কোন কথা নেই|

লিফট থেকে নেমে একটা বড় সবুজ দরজার সামনে আমাদের দাঁড় কারণ হ’ল| দেখলাম দরজায় একটা পেল্লাই সাইজের তালা ঝুলছে| অফিসারের পকেট থেকে চাবির গুচ্ছা বেরোল, ভাবলাম এই বুঝি জেলের দরজা| উনি তালা খুলে বললেন, “চলে আসুন|” ভেতরে ঢুকে লম্বা বারান্দা আর বাঁদিকে সুবিশাল সুসজ্জিত দেয়াল থেকে দেয়াল দামী কার্পেট এ মোড়া বসার ঘর| আরে, এ কোথায় এলাম! উনি জিজ্ঞেস করলেন, “আপনি সত্যি সত্যি সেতার বাজাতে পারেন?” আমি বললাম, “আলবৎ পারি| বাজিয়ে শোনাব?” তারপর ওই পার্শিয়ান কার্পেটের ওপর সেতার খুলে বসে গেলাম| দেখি অফিসার সাহেব-ও দেরাজ খুলে কি যেন বের করার চেষ্টা করছেন| দেখলাম সেখান থেকে তামার বাঁয়া আর তবলা বেরুল আর তা কার্পেটের ওপর   স্থাপিত হ’ল| অফিসার সাহেব তবলা নিয়ে বসলেন, ওই ভীতিকর আগ্নেয়াস্ত্রটি কোমরবন্ধ থেকে আলাদা হয়ে কার্পেটে অবস্থিত হোল| আরে, ইনি তবলা বাজান! আমি তো অবাক, প্রণবদাও তথৈবচ| বাজনা শুরু হোল| দারুন সঙ্গত করলেন দীপকবাবু, যাকে বলে খুব ভালো| এটা একেবারে ভাবাই যাচ্ছিলনা| আমরা প্রায় ঘন্টাখানেক গান-বাজনা করলাম| দীপক রায় কেরামত খাঁ সাহেবের গান্ডাবন্ধ শাগীর্দ| ওনাদের বাড়িতে মসিদ খাঁ সাহেবের ও যাতায়াত ছিল| দীপকবাবু আমার বাজনা শুনে খুব খুশী হলেন, রাইটার্স থেকে বেরিয়ে আমাকে ট্যাক্সিও ধরিয়ে দিলেন| দীপকবাবুর রিভালবারের দিকে তাকিয়ে ট্যাক্সিওয়ালা আর ‘যাব না’ বলতে পারলনা|

प्रणदा और पुलिस
(अनुवाद: मूल बांग्ला लेख প্রণবদা ও পুলিশ” का हिंदी रूपांतर)

हमारे गुरुभाई प्रणबदा सरकारी नौकरी में थे और मेरे बहुत अच्छे मित्र भी। वे सरोद बजाते थे। उन दिनों वे राइटर्स बिल्डिंग की पाँचवीं मंज़िल पर ऑफिस करते थे। मैं अक्सर कॉलेज से चुपचाप निकलकर उनके पास चला जाता था। उस समय मैं विद्यासागर कॉलेज में भौतिकी (फिजिक्स) से संघर्ष कर रहा था।

प्रणबदा कभी भी मेरे संगीत-साधना की पीड़ा सुनकर ऊबते नहीं थे। कितनी ही गतें, कितने ही रागों की चर्चा राइटर्स बिल्डिंग में उनके टेबल और उसके बाईं ओर की कुर्सी ने सुनी है। उस्तादजी की तालीम, दूसरे गायकों और वादकों की प्रस्तुतियाँ—इन्हीं सब बातों को लेकर हम दोनों घंटों तक चर्चा करते रहते। खुद ही सवाल उठाते और खुद ही उसका उत्तर ढूँढ़ते। ये बहसें न सिर्फ़ फ्री-स्टाइल होतीं, बल्कि दिल से होतीं।

हमें अपने उस्तादजी का शागिर्द होने का एक साफ़-साफ़ गर्व था। हम जानते थे कि जैसी खास तालीम हमें मिल रही थी, वह दुर्लभ है। जैसे, राग बहार के मंद्र सप्तक में कोमल ण लगता है, शुद्ध नहीं—ऐसी बारीकी अगर कोई प्रसिद्ध वादक नहीं जानता, तो हमें थोड़ी आत्मतुष्टि मिलती थी। कई बार जब उस्तादजी अन्य प्रतिष्ठित कलाकारों से बात करते थे, हम संयोगवश वहाँ मौजूद रहते।

मुझे आज भी याद है—एक दिन सौरभ के ऑफिस के दरवाज़े से बाहर निकलते हुए उस्तादजी चिल्ला उठे, “सुनिए, बहार के मंद्र में कोमल निषाद ही लगता है!” और सामने वाले उस्ताद ने सिर झुकाकर कहा, “जी, राधुदा।” उस क्षण मेरा सीना 24 इंच से फूलकर 28 इंच हो गया!

या फिर एक बार उन्होंने पूछा, “आप क्या रविशंकर झाड़ कर गाना सिखाते हैं? अब कमल-नि वाला राग कब से बन गया?” सामने वाला नामचीन व्यक्ति एकदम चुप्प!

खैर, अब असली कहानी पर लौटते हैं।

कोलकाता रेडियो में रिकॉर्डिंग के बाद, जब मैं दोपहर करीब एक बजे अपने सितार के साथ बाहर निकला, तो मेरे पाँव खुद-ब-खुद राइटर्स की तरफ़ बढ़ गए—प्रणबदा की मोहक खिंचाव के कारण। उस समय भी राइटर्स की सिक्योरिटी सख़्त थी, लेकिन हम जैसे घुसपैठियों के लिए कुछ रास्ते हमने सीख ही लिए थे।

मैं ज़्यादातर दिन डलहौसी के सामने वाले सफेद चर्च के ठीक उलट लोहे के गेट से सिक्योरिटी की आँख बचाकर फुर्सत से घुस जाया करता था। कभी-कभी पकड़ा भी जाता था। तब नज़दीक के दूसरे गेट से भीतर जाकर एक बड़ी टेबल के सामने जाना पड़ता, जहाँ पुलिस अफ़सर लोग बैठते थे और वहीं से गेटपास बनता था।

उस दिन गेट की निगरानी थोड़ी ढीली थी, इसलिए मैं बिना किसी रोक-टोक के सितार लेकर अंदर दाख़िल हो गया। थोड़ी दूर पर था राइटर्स बिल्डिंग का पुराना-सा लिफ्ट। लाइन में लग गया। लिफ्ट धीरे-धीरे नीचे आई, मैं चढ़ने ही वाला था कि न जाने कहाँ से एक रिवॉल्वरधारी पुलिस अफ़सर अचानक प्रकट हो गए।

उन्होंने मुझे देखते ही रोक लिया—“आपका गेटपास?
मैं क्या कहता? पास तो बनवाया ही नहीं था।
उन्होंने कहा, “आप मेरे साथ चलिए।
मैं समझ गया—गिरफ़्तार हो गया!

संयोग से उसी समय प्रणबदा किसी कारणवश नीचे उतर रहे थे और हमारी नज़रें मिल गईं। मुझे पुलिस के साथ देखकर वे घबरा गए। दौड़ते हुए आए और लगभग चिल्ला ही पड़े, “What happened, what happened?”—टेंशन में अंग्रेज़ी फूट पड़ी!

उन्होंने अपना आइडेंटिटी कार्ड दिखाकर पुलिसवाले को समझाने की बहुत कोशिश की कि मैं उन्हीं के पास जा रहा था। लेकिन पुलिसवाले पर कोई असर नहीं हुआ। प्रणबदा भी समझ गए—बात बिगड़ गई है।”

आख़िर में उन्होंने कहा, “ठीक है, तो मैं भी आपके साथ चलना चाहता हूँ।
इस बार पुलिसवाले ने कोई आपत्ति नहीं की।

शुरू में मैं डर के मारे बर्फ हो गया था, लेकिन प्रणबदा साथ थे, तो थोड़ा हिम्मत बंधा। लिफ्ट चरमराती हुई धीरे-धीरे ऊपर चली और आख़िर में सबसे ऊपर के मंज़िल पर पहुँच गई। हम सब चुप थे।

लिफ्ट से उतरकर हम एक बड़ी हरी दरवाज़े के सामने रुके। देखा कि उस पर एक विशाल ताला लटका है। पुलिसवाले ने जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला, मुझे लगा—बस अब जेल में डाल दिया जाएगा!

लेकिन जैसे ही ताला खुला, उन्होंने कहा—“चलिए अंदर।

अंदर एक लंबा बरामदा था और बाईं ओर एक बड़ा, भव्य बैठकखाना—दीवार से दीवार तक मँहगे कारपेट से सजा हुआ। मैंने सोचा—यह कहाँ आ गए?

अफसर ने पूछा, “आप सचमुच सितार बजा सकते हैं?
मैंने कहा, “अवश्य! सुनाना चाहें तो अभी सुनाऊँ?
और मैं वहीं, उस फ़ारसी कालीन पर सितार निकालकर बैठ गया।

उधर अफसर ने भी अपनी दराज़ खोली और कुछ खोजने लगे। देखा तो वहाँ से एक ताम्बे की बायाँ और तबला निकला, जिसे उन्होंने कालीन पर रख दिया। अफसर साहब खुद तबले पर बैठ गए, और वह डरावना रिवॉल्वर कमर से उतरकर अब कालीन पर रखा था।

अरे! ये साहब तबला बजाते हैं!
मैं चकित, प्रणबदा भी अवाक!

संगीत शुरू हुआ। दीपराय साहब (अफसर का नाम) ने बहुत सुंदर संगत की—एकदम सधी हुई। हम लगभग एक घंटे तक बजाते रहे। बाद में पता चला कि दीपराय जी, उस्ताद केरामत खाँ साहब के गांधाबंध शागिर्द हैं, और उनके घर में उस्ताद मसीद खाँ साहब भी आते-जाते थे।

दीपराय जी मेरे वादन से बेहद खुश हुए। राइटर्स से बाहर आकर उन्होंने मुझे एक टैक्सी पकड़वाई। टैक्सीवाले ने उनकी रिवॉल्वर देखकर “नहीं जाऊँगा” बोलने की भी हिम्मत नहीं की!

और मैं, जो पाँच मिनट पहले खुद को गिरफ्तारी के सपने में देख रहा था, अब एक तबला-वादक पुलिस अफ़सर के साथ राग बजाकर खुशी-खुशी घर लौट रहा था… सितार थामे, आत्मा मुस्कुराती हुई।

ঔরঙ্গাবাদের ছাতে

First Posted on May 16, 2014 by sitardivine

তখন বোধ হয় ১৯৮৩ বা ৮৪ সন| অল ইন্ডিয়া রেডিও সেসময় সারা দেশ জুড়ে অনেক ‘চেইন প্রোগ্রাম’ করত| এই চেইন প্রোগ্রাম-এ সাধারনতঃ দুজন শিল্পী বেশ কয়েকটা রেডিও স্টেশনে যেতেন আর সেখানে নিমন্ত্রিত শ্রোতাদের সামনে অনুষ্ঠান ও ষ্টুডিও রেকর্ডিং করতেন| তবলা, সারেঙ্গী, তানপুরা ইত্যাদি বাজানোর জন্য আলাদা করে শিল্পীর ব্যবস্থা হোত| এসময়টা বোধ করি ৮০-র দশকের মাঝামাঝি হবে| এটা আমার দ্বিতীয় ‘রেডিও চেইন’, বেশ উত্তেজিত, চারটি রেডিও স্টেশনে পৌঁছে বাজাতে হবে; নাগপুর, জলগাঁও, ঔরঙ্গাবাদ ও পুণে| নাগপুর আর জলগাঁওতে চুটিয়ে বাজনা ও রেকর্ডিং হয়ে গেছে, এখন বাসে করে ঔরঙ্গাবাদ যাচ্ছি| আমার সাথে পণ্ডিত যশরাজজীর ছাত্র আহমেদাবাদের কৃষ্ণকান্ত পারিখও একসাথে সফর করছেন| উনি আগে সুখেন্দুবাবুর[1] কাছে গান শিখেছেন| এই চেইনে নিমন্ত্রিত শিল্পী হিসেবে ওঁর গান আমার বাজনা হচ্ছিল|

ঔরঙ্গাবাদে আমার কোন পরিচিত মানুষ ছিলনা| জলগাঁও থেকে বসে যেতে যেতে কৃষ্ণকান্তজী বললেন ওই শহরে ওঁর এক বিশেষ পরিচিত আছেন, ডাঃ ভবান মহাজন| খুব নাম করা সার্জন আর যশরাজজীর বিশেষ অন্তরঙ্গ বন্ধু| ওই ডাক্তারবাবুর কাছেই উনি প্রথম যেতে চান| আমি ভাবলাম, এ বেশ হ’ল| ঔরঙ্গাবাদ পৌঁছে সোজা ডাক্তারবাবুর বিশালাকায় বাড়ীতে আমরা সবাই গিয়ে হাজির হলাম| ওঁর সাথে পরিচয় হওয়ার পার বুঝলাম এতো একেবারে গানপাগল মানুষ| স্বাভাবিকভাবেই যশরাজজীর কথা বারবার এসে পড়ছিল| পন্ডিতজী এ বাড়িতে বহু গেয়েছেন, সে সব নানা ঘটনা| ওঠবার সময় ডাক্তারবাবুকে বললাম যে আমরা এখানে একদিন গান-বাজনা করলে কেমন হয়| উনি প্রস্তাবে খুশি হয়ে বললেন, “কিয়ুঁ নহীঁ? বিলকুল হো সকতা হ্যাঁয়|” কৃষ্ণকান্তজীর অনুরোধে উনি আমাদের জন্য হোটেল বক করে রেখেছিলেন, আমরা এখান থেকে সটান হোটেলে পৌঁছে গেলাম|

নাগপুর থেকে ঔরঙ্গাবাদ, এই কদিনের সফরে এক অদ্ভুত ঘটনা বহুবার ঘটেছে| এর কারণ বুঝে ওঠা বেশ মুস্কিল| কিছুদিন একসাথে কাটানর পর আমরা খেয়াল করলাম যে কৃষ্ণকান্তজী ভাবছেন আমি তা বাজিয়ে ফেলছি| আমি আর উনি অনেকটা সময় ই একসাথে কাটাতাম, যদিও হোটেল এ আলাদা আলাদা ঘরের ব্যবস্থা ছিল| ওঁর সাথে ছেলে নীরজও ছিল| নীরজ তখন তৈরি হচ্ছে, বেশ গায়, সেও যশরাজজীর কাছে তালিম নেয়| ধরুন সকালে বিলাসখানী বাজাচ্ছি, কৃষ্ণকান্তজী বলে উঠলেন, “আরে বিলাসখানী? বঢ়িয়া, ম্যায় সোচ হী রহা থা|” অথবা, “আরে কিতনা অচ্ছা মাধ্যম লগা, ম্যায় সোচ হী রহা থা কী অব মাধ্যম লগ যায়|” হয়তো সাথেই বলে উঠলেন, ” কেয়া অচ্ছা সাজ মিলা হ্যাঁয়| অলগ অলগ স্বর জান করকে মিলানা আপনে কহাঁ সে সিখা? হমারে গুরুজী ভী এইসা হী মিলাতে হ্যাঁয়|” বলাই বাহুল্য, কৃষ্ণকান্তজী সুন্দর সুরে গাইতেন আর সুরে সুরমণ্ডল মেলাতেন| সা, প, ম, বা গ জ্যান করে মেলান বা দুটি অথবা তিনটি স্বর কে সামনে রেখে কোথা থেকে শিখলাম বা কবে শুরু করলাম মনে নেই, তবে যন্ত্র মেলানর ব্যাপারে পাপা খুব খুঁতখুঁতে ছিলেন| পরে আমার গুরু পণ্ডিত বিমলেন্দু মুখার্জীর কাছেও অসাধারণ সব মেলানর রাস্তা শিখেছি|আর দারুন রাস্তা দেখিয়েছিলেন জগদীশজী[2]| সে ই হোক| আমাদের ঔরঙ্গাবাদ রেডিওর ষ্টুডিও রেকর্ডিং ও বিশেষ নিমন্ত্রিত শ্রোতাদের সামনে অনুষ্ঠান ভালোভাবে হয়ে গেল, এবার ডাক্তারবাবুর বাড়ির অনুষ্ঠান| বেশ মজায় দিন কাটছে| মাঝে টুক করে আমরা ইলোরা ঘুরে এসেছি|

সেদিন ডাক্তারবাবুর বাড়ি অনুষ্ঠান| রোদ পড়তেই হোটেল থেকে বেরিয়ে যথাস্থানে পৌঁছে গেলাম| গিয়ে দেখি ছাতে গান-বাজনার ব্যবস্থা হয়েছে| ড‌‍ঃ মহাজন বললেন নীরজ প্রথমে গাইবে, পারে আমি আর শেষে কৃষ্ণকান্তজীর গান হবে|

নীরজ পুরিয়া-কল্যাণ গাইল| অর ঘন্টাখানেক গাওয়ার পর আমার পালা| কি ইয়েন মানে হোল আমি দরবারী ধরলাম| যদিও রাগটা গভীর রাতের, কিন্তু মনের চাওয়ায় সায় দিয়ে মাঝ-সন্ধ্যেতেই দরবারী শুরু করে দিলাম| বেশ জমে উঠল আলাপ-জোড়| হাতের থেকে খুলে সামনে রাখা ঘড়ির দিকে চোখ পড়তেই মালুম হ’ল অনেক্ষণ বাজিয়ে ফেলেছি| ডাক্তারবাবু আর কৃষ্ণকান্তজী সামনেই বসে ছিলেন, বললাম, “জলদি খতম কার দেতা হুঁ|” ডাক্তারবাবু বললেন, “আজ সির্ফ আপকো হী সুনেঙ্গে| আপ আরামসে বজাইয়ে|” কৃষ্ণকান্তজীও বলে উঠলেন, “আপ বহুত অচ্ছা বজা রহেঁ হ্যাঁয়| আজ ম্যাঁয় নহীঁ গাউঙ্গা, আজ সির্ফ আপকো হী সুননা হ্যাঁয়| এরপর আমার বাজনা চলতে লাগল| আলাপ-জোড় বাজিয়ে ঝাঁপতালে গৎ ধরলাম তারপর আড়ানাতে দ্রুত| আড়ানার তান দেওয়া গৎ সবাই খুব হৈ-হৈ করে শুনলেন| ঝালা দিয়ে এই পর্ব শেষ হোল| তবলায় কে ছিলেন মানে নেই, তবে খুব ভালো বাজিয়েছিলেন| উনি ঔরঙ্গাবাদেরই তবলিয়া| আড়ানার পর কিছু একটা হালকা চলে বাজানর পার ভৈরবীর ফরমাইশ এলো| ভৈরবীতে বেশ কিছুটা আওচার করে আমার দাদাগুরু উস্তাদ মহম্মদ আমীর খাঁ সাহেবের একটা বিলম্বিত গত ধরলাম| চারিদিক নিস্তব্ধ, শুধু সেতারের আওয়াজ আর নিচুস্বরে তবলার ঠেকা চলছে| কিরকম একটা লীন হওয়া পরিবেশ| বাজনা শেষ হোল| কিন্তু কোনো হাততালি নেই! শ্রোতারা সব প্রস্তর মূর্তির মত স্থির হয়ে বসে আছেন; বসে আছেন তো বসেই আছেন! নড়াচড়ার লেশমাত্র নেই! আমি আস্তে আস্তে ওখানে বসেই সেতারে কাপড়ের কভার দুটো পরিয়ে নিলাম| কেউ তো দেখছি নড়ছেনই না! উঠে দাড়ালাম| এতে যেন সবাই সম্বিত ফিরে পেলেন, অল্প-অল্প করে নড়াচড়া শুরু হ’ল| অনেকেই কাছে এসে অভিবাদন করলেন আর ইঙ্গিতে বুঝিয়ে দিলেন ভালো লেগেছে কিন্তু তেমন কোনও কথা নয়| সবাই কেমন যেন চুপ করে থাকাটাই পছন্দ করছেন, আওয়াজ করে ভালো লাগার পারশটা যেন ভাঙতে চাইছেননা|প্রায় মৌন থেকেই ধীরে ধীরে সবাই বিদায় নিলেন| এ ঘটনা এখানে শেষ নয়|

ডাক্তারবাবু ওঁর শালাবাবুর সাথে পরিচয় করিয়ে দিয়ে বললেন, “ইনহোনে আপলোগোঁকো হোটেল পঁহুচা দেঙ্গে|” শালাবাবুর গাড়িতে যন্ত্রপাতি তোলা হোল, আমরা রওনা হলাম| পেছনের সাইট আমি আর কৃষ্ণকান্তজী, সামনে নীরজ আর গাড়ি চালাচ্ছেন শালাবাবু| আমরা অনুষ্ঠানের কথা আলোচনা করতে করতে চলতে লাগলাম| কিছুক্ষনের মধ্যেই হোটেল এসে গেল| আমরা বাজনাগুলো নামিয়ে শালাবাবুকে ধন্যবাদ দিয়ে হোটেলের গেটের দিকে পা বাড়ালাম| কৃষ্ণকান্তজী চোখে দেখতে পেতেননা, ওঁর সাথে ধীরে ধীরে হাঁটতে হোত| হোটেলের দরজায় পৌঁছুতে বেশ কিছুক্ষণ লাগল| ঢোকার সময় রাস্তার দিকে তাকিয়ে দেখি শালাবাবুর গাড়িতে তখন দাঁড়িয়ে| আরে, গাড়িটা খারাপ হয়ে গেল নাকি? নীরজকে বললাম, “আপ থোড়া পিতাজী কো লেকর চলিয়েঁ, ম্যায় দেখ কর আতা হুঁ, ক্যা হো গিয়া|গাড়ি তো খরাব নহীঁ হো গয়ী!” গাড়ির কাছে পৌঁছে জানালা দিয়ে মুখ বাড়িয়ে দেখি শালাবাবু চুপচাপ স্টিয়ারিং ধরে বসে আছেন| জিজ্ঞেস করলাম,” গাড়ী মেঁ কুছ হো গিয়া ক্যায়া? সব ঠিক তো হ্যাঁয় না?” উনি আরও কিছুক্স্গান চুপ থেকে বললেন, “আপকা সিতার ইতনা অচ্ছা লগা, বতা নহীঁ সকতা| উসকা গুঁঞ্জ পুরা ভরা হুয়া হ্যাঁয়, একদমসে পিছা কর রহাঁ হ্যাঁয়| ভগবাণ আপকো সদা মদত করে, আপ খুব খুব অচ্ছা বজাতে চলে|” এর পর গাড়িটা হুস্ করে বেরিয়ে গেল|

[1] পণ্ডিত সুখেন্দু গোস্বামী

[2] প্রখ্যাত গাইয়ে পণ্ডিত জগদীশ প্রাসাদ

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“औरंगाबाद की छत पर”

तब शायद साल 1983 या 84 रहा होगा। ऑल इंडिया रेडियो उन दिनों देशभर में कई “चेन प्रोग्राम” किया करता था। इन चेन प्रोग्राम्स में आम तौर पर दो कलाकार एक साथ कुछ रेडियो स्टेशनों पर जाते और वहाँ आमंत्रित श्रोताओं के सामने कार्यक्रम और स्टूडियो रिकॉर्डिंग करते। तबला, सारंगी, तानपूरा इत्यादि के लिए अलग से कलाकारों का इंतज़ाम होता। यह मेरी दूसरी ‘रेडियो चेन’ थी, और मैं काफ़ी उत्साहित था। चार स्टेशनों पर बजाना था – नागपुर, जलगाँव, औरंगाबाद और पुणे। नागपुर और जलगाँव में बढ़िया कार्यक्रम और रिकॉर्डिंग हो चुके थे, अब हम बस से औरंगाबाद जा रहे थे। मेरे साथ अहमदाबाद के पं. यशराज जी के शिष्य कृष्णकांत पारीख यात्रा कर रहे थे। वे पहले पं. सुखेंदु गोस्वामी जी से भी सीखे थे। इस चेन में उन्हीं के गाने पर मेरा सितार साथ दे रहा था।

औरंगाबाद में मेरा कोई परिचित नहीं था। जलगाँव से चलते हुए कृष्णकांत जी ने बताया कि वहाँ उनके एक खास जान-पहचान वाले हैं – डॉ. भवान महाजन, जो एक प्रसिद्ध सर्जन और यशराज जी के करीबी मित्र हैं। वे पहले उन्हीं के पास जाना चाहते थे। औरंगाबाद पहुँचते ही हम सीधा डॉ. महाजन के विशाल बंगले पर पहुँचे। उनसे मिलकर लगा कि वे गानों के जबरदस्त शौकीन हैं। यशराज जी के कई किस्से बार-बार सुनाई दे रहे थे – उन्होंने इस घर में कई बार गाया था। विदा लेते समय मैंने कहा, “यहाँ एक दिन संगीत का आयोजन करें तो कैसा हो?” डॉ. साहब तुरंत खुश होकर बोले, “क्यों नहीं? बिल्कुल हो सकता है।” कृष्णकांत जी के अनुरोध पर उन्होंने हमारे लिए होटल की बुकिंग भी कर दी थी। हम सीधे वहीं पहुँच गए।

नागपुर से औरंगाबाद तक की इस यात्रा में एक अजीब घटना बार-बार घट रही थी। इसका कारण समझना मुश्किल था। कुछ दिन साथ बिताने के बाद लगा कि कृष्णकांत जी सोचते हैं मैं उनकी मन की बात बजा देता हूँ। हम साथ में काफी समय बिताते थे, हालाँकि होटल में हमारे अलग-अलग कमरे थे। उनके साथ उनका बेटा नीरज भी था – अच्छा गाता है और यशराज जी से ही सीखता है। अगर मैं सुबह विलासखानी बजाता, तो कृष्णकांत जी कहते – “अरे विलासखानी? मैं यही सोच रहा था!” या फिर, “अरे, कितना अच्छा माध्यम लगाया, मैं सोच ही रहा था कि अब माध्यम लग जाना चाहिए।” और फिर बोलते – “क्या अच्छा साज मिला है! अलग-अलग स्वर पहचान कर मिलाना आपने कहाँ से सीखा? हमारे गुरुजी भी ऐसे ही मिलाते हैं।”

बेशक कृष्णकांत जी सुंदर गाते थे और सुर-मंडल को सजाते थे। ‘सा, प, म’ को जानकर मिलाना या दो-तीन स्वरों को आधार बनाना – मुझे याद नहीं कि यह मैंने कब या कहाँ से सीखा, लेकिन पापा इस बारे में बहुत बारीक थे। बाद में मेरे गुरु पं. विमलेन्दु मुखर्जी जी से भी मैंने शानदार मेल मिलाने की शैली सीखी। और जगदीश जी ने भी कई शानदार रास्ते दिखाए थे।

बहरहाल, औरंगाबाद रेडियो में हमारी रिकॉर्डिंग और आमंत्रित श्रोताओं के सामने का कार्यक्रम अच्छे से हो गया। फिर डॉ. साहब के घर का कार्यक्रम हुआ। उस बीच हम एलोरा घूम भी आए थे।

कार्यक्रम वाले दिन हम शाम को होटल से निकल कर डॉ. महाजन के घर पहुँचे। कार्यक्रम छत पर था। डॉ. साहब बोले, पहले नीरज गाएगा, फिर मैं बजाऊँगा और अंत में कृष्णकांत जी गायेंगे।

नीरज ने पुरिया-कल्याण गाया। फिर मेरी बारी आई। मैंने दरबारी शुरू किया – हालांकि यह राग गहराती रात का है, लेकिन मन की इच्छा थी तो शाम में ही शुरू कर दिया। आलाप-जोड़ में मजा आ गया। जब घड़ी की ओर देखा तो पता चला कि मैं काफी देर से बजा रहा हूँ। डॉक्टर साहब और कृष्णकांत जी सामने बैठे थे। मैंने कहा, “जल्दी खत्म कर देता हूँ।” डॉ. साहब बोले, “आज सिर्फ आपको ही सुनेंगे, आप आराम से बजाइए।” कृष्णकांत जी बोले, “आप बहुत अच्छा बजा रहे हैं। आज मैं नहीं गाऊँगा, आज सिर्फ आपको ही सुनना है।”

फिर मैं बजाते गया – आलाप, जोड़, फिर झाला, और झपताल में गत, फिर आड़ाना में तेजी। आड़ाना की गत पर खूब वाहवाही हुई। तबलावादक का नाम याद नहीं, पर वे औरंगाबाद के ही थे और बहुत अच्छा बजा रहे थे। फिर कुछ हल्का बजा, और उसके बाद किसी ने भैरवी की फरमाइश की।

भैरवी में मैंने कुछ आलाप किया और अपने दादागुरु उस्ताद अमीर खाँ साहब की एक विलंबित गत बजाई। चारों ओर सन्नाटा – सिर्फ सितार की आवाज और धीमे तबले की संगति। एक अनूठा डूबा हुआ माहौल था।

जब बजाना खत्म हुआ, तो कोई तालियाँ नहीं! सारे श्रोता मूर्तिवत बैठे रहे – बिल्कुल स्थिर! मैंने धीरे से वहीं बैठकर सितार को ढक दिया। सब वैसे ही बैठे रहे। मैं खड़ा हुआ, तब जाकर लोग हिले-डुले। धीरे-धीरे लोग पास आए, अभिवादन किया, संकेतों में बताया कि अच्छा लगा – पर कुछ बोले नहीं। सब जैसे मौन ही पसंद कर रहे थे, प्रशंसा भी बिना बोले करना चाहते थे।

डॉ. साहब ने अपने साले से परिचय कराते हुए कहा, “ये आपको होटल पहुँचा देंगे।” हम उनके गाड़ी में बैठे – पीछे मैं और कृष्णकांत जी, आगे नीरज और उनके मामा गाड़ी चला रहे थे। हम कार्यक्रम पर चर्चा करते हुए होटल पहुँच गए। गाड़ी से साज उतारा, उन्हें धन्यवाद दिया और होटल की ओर बढ़े। कृष्णकांत जी को दिखता नहीं था, उन्हें साथ लेकर धीरे-धीरे चले।

होटल के दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने देखा कि उनकी गाड़ी अब भी वहीं खड़ी है। क्या गाड़ी खराब हो गई? नीरज से कहा, “तुम पिताजी को ले चलो, मैं देख के आता हूँ।” मैं गाड़ी के पास गया, खिड़की से झाँका – वे स्टेयरिंग पकड़कर चुपचाप बैठे थे। मैंने पूछा, “गाड़ी में कुछ हो गया क्या? सब ठीक तो है?” कुछ देर चुप रहकर बोले,
“आपका सितार इतना अच्छा लगा, बता नहीं सकता। उसकी गूंज अब भी भीतर भर रही है, पीछे पीछा कर रही है। भगवान हमेशा आपकी मदद करे, आप बहुत बहुत अच्छा बजाते हैं।”
फिर गाड़ी एक झटके में निकल गई।

On the Roof in Aurangabad

First posted on May 16, 2014 by sitardivine

It must have been around 1983 or ’84. In those days, All India Radio often organised “chain programmes”—a kind of musical circuit across multiple stations. Two artists would travel city to city, performing both for studio recordings and invited audiences. Each station arranged its own accompanists, but the core artists remained the same throughout the tour.

This was only my second chain programme, and I was excited. Four stations lay ahead of me: Nagpur, Jalgaon, Aurangabad, and Pune.

My co-traveller was Krishnakant Parikh, a vocalist and disciple of Pandit Jasraj Ji, who had earlier trained under Pandit Sukhendu Goswami. Though we performed separately—each with our own repertoire—we were touring together as the two featured artists. His son Neeraj, a serious student of vocal music, accompanied us, often humming bandishes softly during our journeys.

Nagpur and Jalgaon were behind us—performances done, recordings complete. We boarded a bus to Aurangabad.

Somewhere on that road, Krishnakant Ji mentioned,
“There’s a dear friend of Guruji in Aurangabad—Dr. Bhavan Mahajan, a renowned surgeon. We must visit him.”
I agreed, unaware of the evening destiny was gently preparing.

Upon arriving in Aurangabad, we went straight to Dr. Mahajan’s sprawling home. The moment I stepped in, I sensed it—this house breathed music. Pandit Jasraj Ji had sung there many times, and each room seemed to carry an echo of those evenings.

As we prepared to leave, I casually suggested,
“Why don’t we have a small baithak here?”
The doctor’s eyes lit up instantly.
“Why not! Music is always welcome in this house.”

A hotel had already been arranged for us. In those hotel evenings, I noticed something curious between us. If I played Bilaskhani Todi in the morning, Krishnakant Ji would exclaim,
“Bilaskhani? I was just thinking of that!”
If I lingered on madhyam, he would say,
“Ah! Exactly there—Guruji would land just like that!”
It was as if my strings were responding to his inner sur. Perhaps shared discipline creates unseen bridges.

My father had instilled a fierce discipline in tuning. My Guru, Pandit Bimlendu Mukherjee, shaped my melodic instincts. Later, Pandit Jagdish Prasad opened new melodic pathways. Training, temperament—call it what you will.

The AIR performance at Aurangabad went well. Between rehearsals, we briefly visited Ellora. And then came the evening at Dr. Mahajan’s rooftop—an open sky awaiting music.

The sequence was simple: Neeraj would sing first, I would play, and Krishnakant Ji would conclude.

Neeraj sang Puriya Kalyan with devotion. Then I began. Without plan, I opened Darbari—though it was early evening. The alap unfolded slowly, time dissolved. Only when I glanced at the watch lying before me did I whisper,
“I should close now.”

Dr. Mahajan gently said,
“Aaj bas aap bajaiye. Tonight, we listen only to you.”
Krishnakant Ji added,
“I won’t sing tonight. We want to remain in your sound.”

And so the music continued—alap, jor, a jhaptal gat, then an electric Adana. The tabla player, an AIR accompanist from Aurangabad, played brilliantly. Someone requested Bhairavi. I offered a slow aochar in the spirit of my grandsire in music, Ustad Muhammad Amir Khan Saheb.

Then—silence.

When I finished, no one moved. No applause. No whisper. The entire gathering sat transfixed, as if marble had replaced flesh. I wrapped my sitar gently. Still silence. Only when I stood up did the spell finally release. People approached, eyes moist, hands folded… but words remained locked, as if speech might shatter something sacred.

We prepared to return. Dr. Mahajan’s brother-in-law offered to drive us. In the car, a few soft remarks floated, but mostly there was a shared hush.

At the hotel, Krishnakant Ji and Neeraj stepped out. I turned back—the car had not moved.

“Strange… engine trouble?” I wondered.

I walked back. He sat motionless, hands fixed on the steering wheel.

“All okay? Did the car stop?” I asked.

He remained silent… then said softly, without turning:

“Your sitar… I cannot describe it. Its sound is still inside me. It’s going with me… like a shadow.”
A pause…
“May God keep this blessing with you always.”

He pressed the accelerator gently—and disappeared into the night.

That night, I learned something:
Some concerts end. But some… simply continue—inside someone else.

৬০ পেরিয়ে

৬০ পার করাটা অনেক চেষ্টা করেও শেষ পর্যন্ত আটকানো গেলনা| কুষ্ঠিতে ছিলনা তাও পৌঁছেই গেলাম|এগার বছর বয়সেই সটকে যাবার কথা ছিল, তার জায়গায় ষাট! অতএব এ পর্যন্ত ৪৯ বছর ফাউ| ফাউ সবারই ভালো লাগে, সত্যি বলতে কি আমারও অল্প অল্প লাগে| জন্মদিনের দুদিন আগে জানতে পারলাম আমার শ্রীমতীজী কিছু একটা ফাঁদছেন, টের পেলাম উনি ছাত্র-ছাত্রীদের সাথেও কথাবার্তা বলছেন| ১৬ সেপ্টেম্বর সকালে ওঠার পরই তাড়াতাড়ি ইউনিভার্সিটি থেকে ঘরে ফেরার ফরমান জারী হল|

বিকেল সাড়ে-চারটে নাগাদ বাড়ী ফিরে দেখি সাবির সেই বর্ধমান থেকে আমার আগেই হাজির| এরপর আস্তে আস্তে অন্যরাও হাজির হল| ত্রৈলী সেই হাওড়া থেকে সাবির এর পর-পরই চলে এল | একটু পর ঢুকল সুমেধা| এর মাঝে সাবির আর অনির্বান টুক করে গাড়ী নিয়ে বেরিয়ে গিয়ে কিছু বিশালাকায় পাত্রে খাবার নিয়ে চলে এসেছে| নভনীল, বাড়ীতে শোকের পরিবেশ থাকা সত্তেও, অল্প সময়ের জন্য চলে এসেছিল| ওকে পেয়ে আমাদের খুব ভাল লেগেছিল| সন্ধে গড়িয়ে গেলে এল দীপঙ্কর, অনুশ্রী আর তাদের ছোট্ট মিষ্টি মেয়ে| মাঝে বনুদি আর অঞ্জনদা| একটু রাত করেই দিলীপ আর সপরিবার পরিমল ঢুকল| সবশেষে এল সুজু, অরুন আর পুকলাই| ওরা যখন এলো তখন পার্টি বেশ জমজমাট| অনির্বাণ সরোদ নিয়ে বাজনার ঘরে বাজিয়ে চলেছে| মাঝের বড় ঘরে গান, হাসাহাসি, কবিতা| আর মা’র ঘরে অঞ্জনদা, বনুদি আর পরে জুড়ল আমার মেয়ে মিম্মাই| সেখানেও চলছে নানা মজার মজার গল্প-গুজব| আর অন্য ঘরগুলো? সেখানে ঢাই করা জিনিস-পত্র, প্রয়োজনে আমরা সেখানে গিয়ে কাজ করে বেরিয়ে আসছি| সব মিলিয়ে এক অদ্ভুত খুশীর মেজাজ| শব্দ নানা ধরনের হলেও তাতে ঠোকাঠুকি নেই| চলুক না আলাদা স্কেলে সরোদ আর গান| গানের পেছনে মৃদু সরোদের আওয়াজ, কখনও বা রান্নাঘর থেকে বাসনের শব্দ, সব আওয়াজই যেন মিলেমিশে খুশীর ছবি এঁকে চলেছে| ওই ছবিই কিছুটা ধরে রাখার চেষ্টা করেছি এই ছোট্ট ভিডিও তে| পার্টি যখন শেষ হল তখন আমার গিন্নির জন্মদিন ১৭ সেপ্টেম্বর ছুঁয়ে পরের দিন সকাল দু’টো!

আমরা সবাই মিস করলাম সুবীর, কর্নজিত, আয়ুষ, রাজরূপা, সুহাস, বিট্টু আর কুশলকে| কেউ বা ষ্টুডিও-তে আটকা, কেউ বা সেদিনই বিদেশ পারি দিল, কেউ আছে দেশের বাইরে বা কারুর বাড়ীতে পুজো| আর মিস করেছি তরাই, দেবাশিস আর তুলুকে|

 ঐদিন তোলা অল্প কিছু ছবি এই ছোট্ট এলবামে রাখা রইল|