খরগোশ আর দন-দনা-দন

“আমরা খরগোশ দলে দলে

বাস করি ওই গাছের তলে

করাইশুটি আর কপি ক্ষেতে

লুটোপুটি যাই সবাই মিলে।“  

ছড়াটা শুনেছেন? শুনলে ভালো, না শুনলে আরও ভালো; ওই ছড়াটাই এক বিকেলে আমার জীবনে অনেক দুঃখ এনে দিয়েছিল। গল্পটা বলি শুনুন।

তখন আমি বেড়ে-টেড়ে সাত বছরের ধেরে হয়ে গেছি। হীরেন রায় আমাকে একটা ছোট্ট সেতার বানিয়ে দিলেন। আমার তো খুশি আর ধরে না। পাপা, সা রে গা মা, সারেগা, রেগামা এসব শেখাতে শুরু করলেন। শুরু শুরু তে তো বেশ লাগল, নতুন চকচকে সেতার, সেটা আবার আমি বাজাচ্ছি! এতদিন পাপাকেই বাজাতে দেখেছি, কিন্তু এখন আমার হাতেও সেতার। সমস্যা দু-এক দিন পরের থেকে শুরু হল, আঙ্গুলে এত ব্যথা লাগে, এ তো বড় মুশকিল। অতএব বাজানো কমে গেল। পাপা দেখলেন ছেলে তো বাজাচ্ছেনা। তখন উনি একটা উপায় কষলেন। উনি ভাবলেন, ছেলেকে যদি কোনও মজার গান বাজানো শেখানো যায় তাহলে ইন্টারেস্ট বাড়বে। বিপত্তির শুরু এখানেই। খরগোশ ভালো, খরগোশের ছড়া ভাল, খরগোশের গান ভালো, খরগোশের গান সেতারে ভালো, কিন্তু তাতে যদি ছাল-চামড়া উঠে যায় তাহলে খুব মুশকিল।

সেতার পেয়ে পাড়ার বন্ধুদের মাঝে একটু ফাঁট দেখানোর সুযোগ পেয়ে গেলাম। সুযোগ পেলে কে না ছাড়ে, বলুন? বন্ধুদের বললাম, আমি তো সেতার বাজাই, ওরা তো খুব আগ্রহী হয়ে পড়ল, “তাহলে, শোনা একদিন”। আমি তো বিপদেই পড়ে গেলাম। শোনাবো কি, ওই শুধু সারেগামা? বন্ধুদের বললাম, “শোনাব, শোনাব।“ এর কিছুদিন পরই ওই “খরগোশ”। আমার যা বাজানোর এলেম তাতে ওই খরগোশেই আমি মোটামুটি কুপোকাত। যাই হোক, কিছুদিন পর খরগোশ-করাইশুটি নিয়ে আমার অল্প-স্বল্প লুটোপুটি শুরু হল। মা’কে চুপি-চুপি বললাম বন্ধুরা বাজনা শুনতে চাইছে। সময় কেটে যাচ্ছে কিন্তু বাজনা শোনান আর হচ্ছেনা। আমি জানি ফট করে বন্ধুদের  বাজনা শোনাতে ডাকলে পাপা রেগে বোম হয়ে যেতে পারেন। আর পাপা রেগে গেলে কপালে কি আছে বলা মুশকিল।

একদিন সাহস করে বন্ধুদের ডেকেই ফেললাম, বললাম অমুকদিন চলে আয়। মা’কেও বললাম বন্ধুদের ডেকেছি। সেদিন ঘরের মেঝেতে তোশক তার ওপর পরিষ্কার সাদা চাদর বিছানো হল, মা আমাকে সাদা পাজামা – সাদা পাঞ্জাবী পরিয়ে তৈরি করে দিলেন। আমি তো রেডি, শুধু ঘড়ি দেখছি বন্ধুরা কখন আসবে।  

বন্ধুরা আসার পর সেতার নিয়ে বসে পড়লাম, সে যে কি ফিলিং; মনটা কখনও ফড়িং হয়ে নাচানাচি করছে কখনও বা উচ্চিংরে। তার পর শুরু হল “আমার খরগোশ”। খরগোশ তো গাছের তলায় বাস করে     আর  কপি ক্ষেতে লুটোপুটি খেয়ে টায়ার্ড হয়ে  গেল, তার পর? বন্ধুরা  বলল, “বেশ বেশ; আরও বাজা  আরও শুনব।” আমার তো স্টক শেষ, এখন কি করি? তারপর “সারেগামা”।  এই সারেগামা বাঁচিয়ে দিল, সবাই  বোর হয়ে চলে গেল, আমি স্বস্তির নিঃশ্বাস ফেললাম। তখনও জানিনা যে সুনামি আমার জন্যে অপেক্ষা করছে।

বসার ঘরের পর্দাগুলো ফেলা ছিল তাই অন্য ঘরে কি হচ্ছে তার কোনও আইডিয়া ছিলনা। পর্দা সরিয়ে পাশের ঘরে পা দিয়েই দেখি যমরাজ, মনে পাপা। উনি অফিস থেকে তাড়াতাড়ি চলে এসেছেন, আর আমার হাইলি আর্টিস্টিক কাণ্ড-কারখানার আন্দাজ পেয়ে কোনরকম ডিসটার্ব না করে সোজা অন্য ঘরে ঢুকে গেছেন আর বোঝার চেষ্টা করছেন অন্য ঘরে কি হচ্ছে। আমি ঘরে ঢোকার পরই জিজ্ঞেস করলেন, “এত সাজ-গোজা, কি ব্যাপার?” বললাম বন্ধুর এসছিল, সেতার বাজালাম। তার পরই শুরু দন-দনা-দন, “তিনদিন সেতার শিখে আর্টিস্ট হয়ে গ্যাছো?” আবার দন-দনা-দন, “বাজনা শুরুই হলোনা আর বন্ধু ডেকে বাজনা শোনান হচ্ছে?” দন-দনা-দন। একটা বাক্য তারপরই দন-দনা-দন, দ্বিতীয় বাক্য আবার দন-দনা-দন, এরকম কিছুক্ষণ চলল। তারপর বোধহয় হাতে  ব্যথা পেয়ে গেলেন আর সুনামি থামল।

চুপিচুপি একটা কথা আপনাদের বলে দিই কাউকে প্লিজ বলবেন না; মার খেতে খেতে আমি কিছু ডিফেন্স টেকনিক আবিষ্কার করেছিলাম, তাতে আমার ব্যথা কম লাগতো আর যে মারছে সে কখনও কখনও ব্যথা পেয়ে যেত।

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ১৬ জুলাই ২০২৫        

खरगोश और दन-दना-दन

“हम खरगोश, टोली बना
बैठें उस पेड़ की छाया तले।
मटर-गोभी के खेतों में
लोटपोट हो खेलें मिलजुल के।”

ये कविता सुनी है? अच्छा किया! और न सुनी हो, तो और भी अच्छा – क्योंकि यही कविता एक दिन मेरे जीवन में भारी दुख लेकर आई थी।
अब सुनिए पूरी कहानी।

तब मैं पूरे सात साल का हो चुका था। हिरेन राय ने मुझे एक छोटा-सा सितार बना दिया। खुशी से मेरा दिल बाग-बाग! पापा ने मुझे सिखाना शुरू किया – सा रे गा मा, सारेगामा, रेगामा…
शुरुआत में सब बहुत मजेदार लग रहा था – चमचमाता सितार, और वो भी मैं बजा रहा था! अब तक तो पापा को ही बजाते देखा था, और अब खुद के हाथ में सितार!

मगर कुछ ही दिन में गड़बड़ शुरू हो गई – उंगलियों में ऐसी दर्द होने लगी जैसे कोई कांटे चुभो रहा हो। सितार छूने का मन ही नहीं करता था। पापा ने देखा कि बेटा तो ढीला पड़ गया। उन्होंने एक उपाय निकाला – सोचा कि अगर किसी मजेदार गाने के ज़रिए सिखाऊं तो बच्चे का मन लगेगा। बस, यहीं से शुरू हुई मुसीबत! खरगोश ठीक, खरगोश की कविता ठीक, खरगोश का गाना ठीक, सितार पर ठीक, लेकिन अगर उसी से खाल छिल जाए, तो?

अब सितार मिला है तो मोहल्ले के दोस्तों के बीच थोड़ा रौब जमाने का मौका तो बनता है ना?
मैंने ऐलान कर दिया – “मैं सितार बजाता हूँ!” दोस्तों ने भी फौरन कहा – “तो कभी सुनाओ ना।” अब मैं फंस गया! सुनाऊं क्या? वो ही सा-रे-गा-मा? मैंने टालमटोल करते हुए कहा, “सुनाऊंगा, सुनाऊंगा।”

कुछ दिनों बाद आया वो “खरगोश”! जो थोड़ी-बहुत बजाने की कला थी, उसी खरगोश में सब गड़बड़ हो गई।
खैर, किसी तरह “खरगोश – मटर – गोभी” में थोड़ी बहुत लोटपोट कर ही ली।

मैंने माँ को धीरे से बताया कि दोस्त लोग मेरी बजाई सुनना चाहते हैं। समय बीत रहा था, पर कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ रहा था। अब मुझे मालूम था कि अगर बिना बताए दोस्तों को बुला लूं और पापा को खबर हो जाए, तो समझिए भूकंप आ जाएगा। और जब पापा नाराज़ होते हैं, तो परिणाम अज्ञात और डरावना होता है।

फिर एक दिन हिम्मत जुटाकर दोस्तों को बुला ही लिया – “फलां दिन आ जाना!” माँ को भी बता दिया – “माँ, दोस्तों को बुलाया है।” उस दिन घर में उत्सव जैसा माहौल बन गया – बैठक में तोशक बिछा, उस पर सफेद चादर,
माँ ने मुझे सफेद पायजामा और कुरता पहना दिया – एकदम कलाकार बना दिया।

अब मैं तैयार बैठा – बस घड़ी देख रहा हूँ कि दोस्त कब आएंगे। दोस्त आए, और मैं सितार लेकर बैठ गया।
उस वक्त की फीलिंग! मन जैसे फुदकता टिड्डा, कभी उछलता, कभी डरता। फिर मैंने शुरू किया – “हम खरगोश टोली बना…” खरगोश गाना खत्म हुआ – मटर-गोभी खा-खा के थक गए खरगोश।
दोस्तों ने कहा – “बहुत अच्छा! और सुनाओ!”

अब मेरी तो पूरी तैयारी बस इतने पर थी। तो फिर मैंने सहारा लिया – “सा-रे-गा-मा”। बस वही मुझे बचा ले गया – दोस्त बोर होकर चले गए और मैं चैन की सांस ले पाया। तब तक मुझे अंदाजा नहीं था कि एक सूनामी मेरा इंतजार कर रही है।

बैठक के परदे गिरे हुए थे – इसलिए पता ही नहीं चला कि बगल के कमरे में क्या चल रहा था। जब परदा हटा और मैं उस कमरे में घुसा… सामने यमराज खड़े थे – यानी पापा। वो दफ्तर से जल्दी लौट आए थे, और मेरे महान कलात्मक करतब की भनक लगाकर बिना कोई हलचल किए, चुपचाप दूसरे कमरे में जा बैठे थे – सब सुन रहे थे।

मैं जैसे ही कमरे में घुसा, पापा बोले, “इतनी सज-धज क्यों? क्या बात है?” मैंने कहा – “दोस्त आए थे, सितार बजाया।” बस, फिर क्या था – शुरू हुआ दन-दना-दन! “तीन दिन सीखा और कलाकार बन गया?” – दन-दना-दन! “अभी ठीक से सुर पकड़ना नहीं आया, और दोस्तों को बजाकर सुना भी दिया?” – दन-दना-दन! हर वाक्य के बाद दन-दना-दन। दूसरा वाक्य – फिर दन-दना-दन। ये सिलसिला थोड़ी देर तक चला…
फिर शायद उनके हाथ दुखने लगे और तूफान रुका।

अब एक बात चुपचाप आपसे कहता हूँ – कृपया किसी को मत बताइएगा। मार खाते-खाते मैंने कुछ डिफेंस टेक्निक खोज लिए थे – जिनसे मुझे कम दर्द होता था, और मारने वाले को कभी-कभी ज्यादा हो जाता था! 

ভুল করে ঠিক

সন বোধ করি ১৯৫৬, আমার বয়েস বেড়ে বছর দুয়েক হল। আমরা তখন রসা রোডের ভাড়া-বাড়িতে থাকি। মা’য়ের চাপাচাপিতে বাবা ইংরেজ হয়ে পাপা হয়ে গেল, মানে আমি পাপা ডাকতে শুরু করলাম। মা দুটো অপশন দিয়েছিল, পাপা অথবা পাপাই। ওই ছোট্ট মাথায় পাপা ডাকটাই কম ঝামেলার মনে হল, বাবা-র  সাথে পাপা অনেকটা মিলেও যায়। 

পাপা আমাকে তার মনের মত তৈরী করার জন্যে একটা স্তর অবধি চেষ্টা করতেন, আর আমি তার প্রায় কোনটাই হতে দিতাম না; তার মধ্যে সবচেয়ে যেটা খারাপ ছিল সেটা হচ্ছে পড়াশুনো; ছি ছি, এটা কি কোন সুস্থ বাচ্চার কাজ? আমাদের ইস্কুলের জবরদস্তি পড়াশুনো যদি কোনও বাচ্চার ভালো লাগে তাহলে তার সুস্থতা নিয়েই কেমন যেন সন্দেহ জাগে। সে যা হোক, পড়াশুনোরই জয় সর্বত্র। কিন্তু এ ব্যাপারটা কেমন যেন কখনোই মানতে পারতাম না।

পড়াশুনো করার একেবারেই যে চেষ্টা করিনি তা নয়। কিন্তু বই-এর লেখাগুলোর সাথে আমার সাধারণ বুদ্ধিতে বোঝা জানার কেমন যেন জুঁতসই কোনও মিল পেতাম না। যেমন ধরুন এক ধরনের অঙ্ক  কষতে হোত, তার নাম ছিল “সরল”। “সরল” যে কেন সরল, তার সরলতাই ঠাহর করে উঠতে  পারতাম না, এই সরল যে কোন কাজের তাও মনে হত বোঝা জানার বাইরে।

আমার তখন অনেকটাই বয়েস, বুড়াই বলতে পারেন। একটি উচ্চশিক্ষণ-সংস্থা আমাকে বায়ুযানের ভাড়া-পত্তর দিয়ে কথা-বার্তা বলতে ডেকেছিল। সেখানেও বহু পণ্ডিতের মাঝেও প্রশ্নটা রেখেছিলাম। বলেছিলাম যে ছোটবেলায় সরল করার চেষ্টা করতাম যেখানে যোগ, বিয়োগ, গুণ, ভাগ, এর, প্রথম, দ্বিতীয়, তৃতীয় ব্রাকেট ইত্যাদি নানা রকম অশান্তি থাকত, আর তারপর তার উত্তর বেরুত “১”। আমি এখন ও বুঝে উঠতে পারলাম না ওটা কি করে ছবি এঁকে বোঝানো যাবে, আর কোন মাষ্টারমশাই ওটা বাচ্চাদের সেভাবে বুঝিয়ে থাকেন। যদি এটা না বোঝানোই যায় তাহলে অত  কঠিন করে ১ উত্তর জেনে কি লাভ? তখন এক অঙ্কের পণ্ডিত বললেন, আমরা যদিও ও ভাবে অঙ্ক শেখাই না, কিন্তু আপনি ফিনল্যান্ডের অঙ্ক শেখানোর পদ্ধতি দেখুন। মশাই; থাকি ভারতে, ফিনল্যান্ড দিয়ে আমি কি করব?   

সে যা হোক, কোনও কিছু মাথা-মুন্ডু বুঝতে না পেরে, পড়াশুনো ডকে উঠল। আমি মন দিয়ে গান-বাজনা করি পাপা এর ঘোরতর বিরোধী ছিলেন, উনি চাইতেন আমি ভালো করে পড়াশুনো করে, বিজ্ঞানী হব, বিশ্বিদ্যালয়ে পড়াব। আমি কোন পশ্চাতাপ ছাড়াই ওর সে সব আশায় সফলতার সাথে জল ঢেলে দিয়েছি। যদিও দেশে ও বিদেশে বিশ্ববিদ্যালয়ে পড়িয়েছি, কিছুটা হয়ত গবেষণার সাথেও  জুড়েছি; কিন্তু সেটা কোনভাবেই প্রচলিত লোকমান্য বিজ্ঞান নয়। হ্যাঁ, ঠিকই ধরেছেন, ভারতীয় গান-বাজনা বা তার সাথে জোড়া বিষয় নিয়ে সময় কাটিয়েছি, এই বিশেষ জ্ঞানের সাথে হয়তো বা কখনও  “পলব” বা “প্রচলিত লোকমান্য বিজ্ঞান” জুড়ে গিয়েছে; পড়াশুনো করেছি, কিন্তু সেটা চাপিয়ে দেওয়া নয়, নিজের খুশিতে মহা আনন্দে। যা পড়তে ইচ্ছে হয়েছে পড়েছি, জেনেছি, আর তার প্রয়োগ করেছি। এই বয়েসে এসে মনে হচ্ছে, যা করেছি তা যেন সব ভুল করে ঠিক হয়ে গিয়েছে!    

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ১৫ জুলাই ২০২৫

भूल से बनी बात

सन 1956 की बात है। मेरी उम्र तब दो साल के करीब रही होगी। हम रसा रोड की एक किराए की मकान में रहते थे। मम्मी ने एक दिन ऐलान किया—“अब से ‘बाबा’ नहीं, तुम्हें ‘पापा’ कहना है।” विकल्प भी दिया: ‘पापा’ या ‘पापाइ’। मेरी नन्हीं सी बुद्धि ने तुरन्त ‘पापा’ चुन लिया—कम बोझ, ज़्यादा मेल।

अब पापा की तमन्ना थी कि मुझे अपने जैसा बना दें। उन्होंने पूरी योजना बना रखी थी — मैं खूब पढ़ूँ, साइंटिस्ट बनूँ, और अंत में विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनकर देश की सेवा करूँ। मगर मैं था कि हर मोड़ पर उनकी योजना में पेंच लगा देता।

सबसे बड़ी लड़ाई पढ़ाई को लेकर हुई। मुझे किताबों से अजीब सी चिढ़ थी। स्कूल की ज़बरदस्ती वाली पढ़ाई तो जैसे किसी मानसिक अत्याचार से कम नहीं लगती थी। और फिर वो ‘सरल’ गणित! नाम था ‘सरल’, पर उसमें जोड़, घटाव, गुणा, भाग और न जाने कौन-कौन से ब्रैकेट! और नतीजा? “1”! अब भला बताइए, इतनी जहमत उठाकर अगर अंत में ‘1’ ही पाना है, तो वो झंझट क्यों? मुझे तो बचपन से यही लगता था कि ‘सरल’ के नाम पर बहुत बड़ा धोखा है।

सालों बाद, जब बाल सफेद हो गए और वक्त कुछ धीमा चला, मुझे एक नामी संस्थान ने बुलाया—हवाई जहाज का टिकट भेजकर! वहाँ बड़ी-बड़ी हस्तियाँ बैठी थीं, और मैं वही पुराना सवाल उठा लाया: “ये ‘सरल’ वाला हिसाब बच्चों को आखिर क्यों सिखाया जाता है?” एक विद्वान बोले, “आप फिनलैंड की मैथड देखिए।” मैंने सोचा, “मियाँ, फिनलैंड से पहले तो मुझे अपना बचपन ही समझ नहीं आया।”

ख़ैर, पापा को मुझसे जो उम्मीदें थीं, उनमें मैंने पानी ही फेरा। उन्होंने सोचा था, मैं लैब को चमका दूँगा। मैंने सितार को चमका दिया। उन्होंने चाहा मैं विज्ञान में शोध करूँ। मैंने रागों में जीवन खोज निकाला। वे चाहते थे कि मैं क्लासरूम में लेक्चर दूँ, मैंने मंच पर अलाप छेड़ दिए।

आख़िर में क्या हुआ? पढ़ाई की — लेकिन अपनी पसंद से। जो दिल चाहा, वही पढ़ा। और वही अपनाया। बिना पछतावे के। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है—सब कुछ गलतियों से ही सही, पर सही दिशा में चला गया।

कभी-कभी, ज़िंदगी भी ‘सरल गणित’ की तरह होती है—समझ में नहीं आती, लेकिन अंत में उत्तर ‘ठीक’ ही आता है।

জাদু ছিল ওই দরজা পেরিয়ে…

হোয়াটস-অ্যাপের ফ্যামিলি গ্রুপে রাতুর এত সুন্দর লেখা পড়ে আমারও কেমন যেন বেশ লেখা-লেখা পাচ্ছে। এটা অনেকটা সেই খোঁড়ার অলিম্পিক দৌড়নোর ইচ্ছের মত। খোঁড়া বলে কি কিছুই করব না? অলিম্পিক না দৌড়োই, আট-দশ পা হাঁটার চেষ্টা করতে আপত্তি কোথায়?

এই তো সেদিনের কথা। তখন আমি কিছুটা ছোট সাইজের ছিলাম, আরে না না, পাড়ার হুলো বেড়ালটার থেকে বেশ কিছুটা বড়ই ছিলাম। সে কি, এতে হাসার কী আছে? মানুষকে এরকম টাক-মাথারই থাকতে হবে এরকম কোন মাথার দিব্যি আছে নাকি? বিশ্বাস কর বা না কর তখন আমার মাথা ভর্তি চুল ছিল আর ভুঁড়ি একেবারেই ছিলনা।

যাদবপুরে আমার এক স্বপ্নপুরী ছিল। হ্যাঁ, ওই সেই সাদা গোল বাড়িটা, আর তার ব্রাউন রঙের দরজা, একটা গোল হাতল যেটা ঘোরালেই দরজা খুলে যেত, আর সেই দরজার ওপরে পিতলের ফলকে লেখা 37/5 জ্বল-জ্বল করত। বাড়ীর সামনে এক-ফালি জমি, তাতে কিছুটা বাগান, জমি পেরিয়ে লাল সিমেন্টে সবুজ বর্ডার দেওয়া বারান্দা। জাদু ছিল ওই দরজা পেরিয়ে।

দরজা পেরিয়ে ছোট্ট একটা ঘর, এ ঘরের চেহারা মাঝে মাঝেই বদলাত। কখন তাতে পড়ার টেবিল, কখন বসার জায়গা, কখনো খালি, কখন মোটর-সাইকেল, কখন কোন সকালে টেবিলের ওপর চেয়ার চড়িয়ে তার ওপর ছোট্ট দাদার গ্যাঁট হয়ে বসে মহারাজ হয়ে যাওয়া, বা দেখিয়ে দেখিয়ে মজা করে অল্প অল্প নুন খেতে খেতে ছোড়দির গুন-গুন করে গান গাওয়া। জিজ্ঞেস করলাম, “কি খাচ্ছিস রে?” উত্তর এলো “খাবি?” বললাম, “হ্যাঁ”। “তাহলে চোখ বন্ধ করে হা কর।“ তার পর মুখে এক মুঠো নুন ঠুসে দেওয়া — হা হা হা হা হা।      

ছবিতে যাদের দেখা যাচ্ছে সে সম্বন্ধে ছোড়দি [সমাপিকা] জানাল যে বাঁ-দিক থেকে ডান দিকে, (১-২) দাদা [মহীরূহ]  ছোড়দিকে [সমাপিকা] ধরে দাড়িয়ে, (৩) দিদি [স্বাগতা] , (৪) সেজদি [সীমন্তিকা],  আর (৫) মেজদি [সুশান্তা । [৩০ ডিসেম্বর, ২০২৪]

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ২৮শে ফেব্রুয়ারী ২০২৪      

আরেকটু : লেখা প্রকাশের প্রায় ১১ মাস পর ছবিটা জুড়ে দিলাম। ছবি পরিচিতি আরও দিন দুয়েক পরে।

বুড়ি ও বুড়ো

রচনা: কেমনামি বোকানি 

একটা ছিল বুড়ো, একটা ছিল বুড়ি। 

থুড়ি,  

একটা ছিল বুড়ি আর একটা ছিল বুড়ো,

একজন গাইত গান আর অন্যটা বাটত মুড়ো। 

দুটোই ছিল পাগল, একটা সেয়ানা আর একটা আস্ত, 

কে যে কোনটা সেটাই ধাঁধাঁ। 

ধাঁধাঁর  উত্তর কেউ বলেনা, 

বললে পরেই পড়বে হানা,

আরে না না না না। 

বুড়ো বুড়ির আড়ি হবে,

ভাববে তারা, 

আমার ঘাড়ে ওরটা কেন পড়ে?

আস্ত হই বা সেয়ানা, কার তাতে কি?

জমিয়ে থাকি এটাই বড়,

নইলেই বিপত্তি।   

কলকাতা | ১৫.০৯.২০২১

ক্ষেত ভরে যাবে শস্যে

আমি জানি,

তোর ক্ষেত ভরে যাবে শস্যে,

সে বর্ষা নামুক বা না নামুক।

আমি জানি,

তোর কাছে আছে সেই চাবিকাঠি,

যাতে জল আছে, আছে প্রাণ।   

তোর জলের স্নেহে আসবে নতুন পাতা,

তরতরিয়ে উঠবে নতুন শাখা,

গুন গুনিয়ে আসবে ভোমরা

আসবে রঙিন প্রজাপতি

গাইবে পাখি, আসবে তারা ঝাঁকে ঝাঁকে। 

তোর বাগান উঠবে মেতে,

সে বর্ষা নামুক বা  না নামুক।

কলকাতা, ০৭ অক্টোবর ২০২১

থাকব সবাই খোশ মেজাজে

লেখক – কেমনামি বোকানি

থাকব সবাই খোশ মেজাজে,  

হেসেই হব খান-খান,

খারাপ টাকে মারব ঘুষি 

বানাবো তাকে আন-বান।

থামব না কো কষ্ট পেয়ে 

রাখবনা ওই শব্দটা,

সময় আমার, বাঁচা আমার,  

রাঙিয়ে দেব আমার রঙে 

সাজবে নতুন আমার আপন জীবনটা। 

মনেই দুঃখ, মনেই সুখ, মনটা আমার। 

যে কেউ সেথায় পড়বে ঢুকে, 

জায়গা তাকে দিতেই হবে,  

সময় তাকে দিতেই হবে, 

এমন নিয়ম কিসের নিয়ম?  

রাজ্য আমার, রাজা আমি, 

আমিই বুঝব কি দাম কার। 

থাকব সবাই খোশ মেজাজে 

হেসেই হব খান-খান,

খারাপ টাকে মারব ঘুষি,  

বানাবো তাকে আন-বান।

কলকাতা | অক্টোবর ০৫, ২০২১ 

Three miles on a bicycle .. Ramnagar in 1960

First Posted on May 1, 2012 by sitardivine

I still remember the three miles on a bicycle, seating on a small seat in front of my father. Now I know it was 24 October in the year 1960. A little calculation tells me that I was then six years old. We went to Ramnagar two days earlier. I did not understand why we were there but liked the rural ambiance… the huge expanse of paddy ground.. the sunflowers… the trees everywhere.. the Magnolia tree in front of the small bungalow.  Huge playground not far from the house.. the smell of cooking of fresh chicken or hunted duck curry in the evening… the tube-well on the other side.. the blackberry and custard apple trees… the litchi tree, the olive and tamarind trees … the flowers.. the breeze.. the fresh air, clear moonlit sky far from the madding Calcutta crowd.

Papa told me that he would go somewhere a bit far from Ramnagar. I constantly went on requesting that I would like to be with him.

So, he tried to arrange some transport to accommodate me and finally managed to find a bicycle that has a small seat in the front. I was happy and took the ride with him on that little red baby seat. I remember there were quite a few others who were in the group and all on bicycles. It was a bumpy village road and too long for me on that uncomfortable seat. Still, I enjoyed the ride.. the only bicycle ride I ever had with my father!

I don’t clearly remember how Bado-Jatha [my uncle] joined us. Now I know that his presence was very important, he had to sign the gift deed on behalf of Dadu [grandfather]. He transferred the land to Papa’s name.  I remember I saw Jatha [jathA]  at Chandpara. He was there at the Sub-Registrar’s office. Jatha possibly reached there directly by train from Calcutta on the same day. I remember Arekta-Jatha [another uncle] came to the office with us. He was among us in the Ramnagar bicycle group.


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Oh yes! I forgot to tell you what Ramnagar was.  This was a name of a place that my Dadu owned. This was not far from the then Pakistan border at Bangaon. This was about three miles from Chandpara and two and a half-mile from Thakurnagar, the two close-by railway stations. This is now under the post office Ramchandrapur.  Dadu [grandfather] purchased a piece of land during early 1940s or late 1930s. I hear that it was a stretch of 4000 bighas  [1322.4 Acres  or 532.2 hectare]. After Indian independence the government introduced land ceiling and he lost a large part of the land [He never received any compensation on that though!]. However, at one point the land area came to as little as around 6.5 acres and at that point Dadu decided to gift the land to my father.  Now I can imagine, that too was not too small an area..

Back to the story and making the long story short, the land got transferred to Papa after the legal formalities and we all came back to Ramnagar.

I discovered that Gift-deed today lying in an old worn-out packet… Today is the 2012 May Day (01 May]. I thought digitization of the document is a good idea. So, I scanned the document and here it is for you.. It feels good to lay my hands over these old pieces of paper that no more possess the symbol of ownership. The land is still there but not with us… but the memory is still fresh and alive.. Enjoying the old memories!

Some updates:

My Dada [Mahiruha Shekhar Banerjee] called me after looking at the draft post and pointed out that Dadu actually purchased 1600 bighas [526.96 acre or 214.08 hectare] of land in the year 1935.

সাইকেলে তিন মাইল… ১৯৬০ সালের রামনগর

প্রথম প্রকাশ: ১ মে, ২০১২ | sitardivine

আমি এখনও স্পষ্ট মনে করতে পারি – বাবার সাইকেলের সামনে ছোট্ট একটা সিটে বসে তিন মাইল রাস্তা। এখন জানি, সেটা ছিল ২৪ অক্টোবর, ১৯৬০ সাল। একটু হিসেব করলেই বোঝা যায়, তখন আমার বয়স ছিল ছয়। আমরা রামনগরে গিয়েছিলাম তার দু’দিন আগে। ঠিক কেন গেছি, সেটা তখন বুঝিনি, কিন্তু গ্রামবাংলার পরিবেশ দারুণ লেগেছিল—ধানের মাঠের বিশাল বিস্তার, সূর্যমুখী ফুল, চারদিকে গাছগাছালি, ছোট্ট বাংলো বাড়িটার সামনে ম্যাগনোলিয়ার গাছ। একটু দূরে বিশাল খেলার মাঠ, সন্ধেবেলায় রান্না করা টাটকা মুরগি বা শিকার করা হাঁসের ঝোলের গন্ধ, এক পাশে টিউবওয়েল, জামরুল আর আতা গাছ, লিচু, জলপাই ও তেঁতুল গাছ… ফুল, হাওয়া, নির্মল বাতাস, আর স্পষ্ট জ্যোৎস্না – সব মিলিয়ে এক অন্য জগৎ, কলকাতার কোলাহল থেকে অনেক দূরে।

বাবা বললেন, উনি একটু দূরে কোথাও যাবেন। আমি বারবার আবদার করতে লাগলাম—আমিও যাব, আমিও যাব। শেষমেশ, আমার জন্য একটা ব্যবস্থা করে ফেললেন। সামনে ছোট্ট একটা সিটওয়ালা সাইকেল পেলেন, আর তাতেই আমি উঠে বসলাম, একেবারে লাল রঙের বাচ্চাদের সিট। খুব খুশি হয়ে চেপে বসলাম। মনে আছে, আমরা একটা দলের অংশ ছিলাম—সবাই সাইকেলে। কাঁচা গ্রাম্য রাস্তা, আমার মতো খুদে বালকের জন্য বেশ লম্বা আর অস্বস্তিকর ছিল সেই সফর, কিন্তু উপভোগ করেছিলাম—বাবার সঙ্গে আমার জীবনের একমাত্র সাইকেল-ভ্রমণ!

বড় জেঠু ঠিক কীভাবে আমাদের সঙ্গে যোগ দিলেন, স্পষ্ট মনে নেই। তবে এখন জানি, উনি খুব গুরুত্বপূর্ণ ছিলেন—দাদুর পক্ষে গিফট ডিডে সই করার দায়িত্ব ছিল ওনার। সেই জমি বাবার নামে হস্তান্তরিত হয়েছিল। মনে আছে, চাঁদপাড়ায় জেঠুকে দেখেছিলাম—সাব-রেজিস্ট্রার অফিসে। সম্ভবত উনি সেদিনই কলকাতা থেকে ট্রেনে এসে পৌঁছেছিলেন। আরও একজন জেঠু, যাঁকে আমরা “আরেকটা-জেঠু” বলতাম, তিনিও আমাদের সঙ্গে অফিসে গিয়েছিলেন। উনিও ছিলেন রামনগর সাইকেল দলের একজন।

ও হ্যাঁ! রামনগর ব্যাপারটা বলা হয়নি। এটা ছিল দাদুর কেনা একটি জায়গা, বনগাঁর কাছে, তৎকালীন পাকিস্তান সীমান্ত থেকে খুব দূরে নয়। চাঁদপাড়া থেকে প্রায় তিন মাইল আর ঠাকুরনগর থেকে আড়াই মাইল দূরে। এখন এই জায়গা পড়ে রামচন্দ্রপুর ডাকঘরের অধীনে। দাদু সম্ভবত ১৯৪০-এর দশকের শুরু বা ১৯৩০-এর দশকের শেষে প্রায় ৪০০০ বিঘা জমি (১৩২২.৪ একর বা ৫৩২.২ হেক্টর) কিনেছিলেন [এটি সঠিক নয়, ঠিক তথ্যের জন্যে নিচে দেখুন] । স্বাধীনতার পরে জমি সংস্কার আইনে অনেকটা জমি চলে যায় (যার বিনিময়ে কোনো ক্ষতিপূরণও পাননি)। এক সময় জমির পরিমাণ কমে এসে দাঁড়ায় ৬.৫ একরে, তখনই দাদু ঠিক করেন এই জমিটা বাবাকে উপহার দেবেন। এখন ভাবলে, সেটাও তো কম কিছু নয়।

আর সেই ঘটনা সংক্ষেপে বললে—আইনি প্রক্রিয়া সম্পন্ন হয়ে জমির মালিকানা বাবার নামে চলে যায়, আর আমরা সবাই আবার রামনগরে ফিরে আসি।

আজ হঠাৎ পুরনো এক প্যাকেট থেকে সেই গিফট-ডিডটা বেরিয়ে পড়ল… আজ ১ মে ২০১২, মে-ডে। ভাবলাম, ডকুমেন্টটা ডিজিটাল করে রাখাই ভালো হবে। স্ক্যান করে এখানে দিলাম তোমাদের জন্য। জমির মালিকানা নেই, কিন্তু সেই কাগজের ছোঁয়া এখনও এক অনুভূতির জন্ম দেয়। জমি আজও আছে, তবে আমাদের নয়—তবে স্মৃতিটা একেবারে টাটকা, জীবন্ত।

নতুন তথ্য:
আমার দাদা (মহীরুহ শেখর ব্যানার্জি) ফোন করে জানালেন, দাদু আসলে ১৯৩৫ সালে ১৬০০ বিঘা (৫২৬.৯৬ একর বা ২১৪.০৮ হেক্টর) জমি কিনেছিলেন।

साइकिल पर तीन मील… 1960 का रामनगर

प्रथम प्रकाशन: 1 मई 2012 | sitardivine

मुझे आज भी याद है—बाबा की साइकिल के सामने लगी छोटी सी सीट पर बैठकर तीन मील का सफर। अब मुझे पता है, वह दिन था 24 अक्टूबर 1960। थोड़ा हिसाब लगाने पर पता चलता है कि मेरी उम्र तब छह साल थी। हम दो दिन पहले रामनगर पहुँचे थे। मुझे यह नहीं समझ में आया कि हम वहाँ क्यों थे, लेकिन गाँव का वातावरण बहुत भाया—चारों ओर फैले धान के खेत, सूरजमुखी के फूल, पेड़ों की भरमार, उस छोटे से बंगले के सामने मैगनोलिया का पेड़। घर से थोड़ी दूर एक बड़ा खेल का मैदान, शाम को ताज़े मुर्गे या शिकार की हुई बतख के झोल की खुशबू, दूसरी तरफ ट्यूबवेल, जामुन और शरीफा के पेड़, लीची, जैतून और इमली के पेड़… फूल, हवा, ताज़गी, और चाँदनी रात—सब कुछ बहुत ही सुकूनदायक था, कोलकाता की भीड़-भाड़ से बहुत दूर।

पापा ने कहा कि उन्हें रामनगर से थोड़ी दूर कहीं जाना है। मैंने ज़िद पकड़ ली कि मैं भी उनके साथ चलूँगा। फिर उन्होंने कोई इंतज़ाम करने की कोशिश की और एक ऐसी साइकिल मिल गई, जिसमें आगे एक छोटा सा सीट था। मैं बहुत खुश हुआ और उस छोटी लाल सीट पर बैठ गया। याद है, और भी कुछ लोग थे हमारे साथ—सब साइकिल पर। वह एक ऊबड़-खाबड़ गाँव की सड़क थी, और मेरे जैसे छोटे बच्चे के लिए काफी लंबा सफर। लेकिन फिर भी मैंने उस सवारी का पूरा मज़ा लिया—बाबा के साथ मेरी पहली और आखिरी साइकिल की सवारी!

मुझे ठीक से याद नहीं कि बड़े-ज्येष्ठा (मेरे चाचा) हमारे साथ कैसे जुड़े, लेकिन अब समझ में आता है कि उनका साथ होना ज़रूरी था—दादाजी की तरफ से गिफ्ट-डीड पर हस्ताक्षर करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी। उसी दिन ज़मीन पापा के नाम ट्रांसफर की गई। मुझे याद है, ज्येष्ठा को मैंने चाँदपाड़ा में देखा था, सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में। शायद वो उसी दिन ट्रेन से कोलकाता से आए थे। और एक चाचा, जिन्हें हम “अरेक्ता-ज्येष्ठा” कहते थे, वो भी हमारे साथ ऑफिस में गए थे—रामनगर साइकिल समूह के सदस्य।

ओह हाँ! मैंने बताया ही नहीं कि रामनगर क्या था। यह वह जगह थी जो मेरे दादाजी की थी। यह बांगांव के पास, तत्कालीन पाकिस्तान सीमा से बहुत दूर नहीं थी। यह चाँदपाड़ा से तीन मील और ठाकुरनगर से ढाई मील दूर था—दोनों पास के रेलवे स्टेशन। अब यह रामचंद्रपुर पोस्ट ऑफिस के अंतर्गत आता है। दादाजी ने 1940 के प्रारंभ या 1930 के अंत में लगभग 4000 बीघा (1322.4 एकड़ या 532.2 हेक्टेयर) ज़मीन खरीदी थी। आज़ादी के बाद सरकार ने ज़मीन की सीमा तय की और उन्होंने अधिकांश ज़मीन खो दी (उन्हें कभी कोई मुआवज़ा नहीं मिला!)। बाद में ज़मीन घटते-घटते करीब 6.5 एकड़ रह गई, और तभी दादाजी ने वह ज़मीन मेरे पापा को उपहार देने का निर्णय लिया। अब सोचता हूँ, वो भी कोई छोटी ज़मीन नहीं थी।

कहानी को संक्षेप में कहें तो—कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ज़मीन पापा के नाम हो गई और हम सब रामनगर लौट आए।

आज एक पुरानी, फटी-पुरानी फाइल से वह गिफ्ट डीड निकल आई… आज 1 मई 2012 है, मई दिवस। सोचा इसे डिजिटाइज़ कर दूँ। तो मैंने दस्तावेज़ स्कैन कर दिया—ये रहा। इन पुराने कागज़ों को छूना अब भी एक सुकून देता है, भले ही अब ये मालिकाना हक का प्रतीक नहीं रहे। ज़मीन आज भी है, लेकिन हमारे पास नहीं… पर यादें अब भी ताज़ा हैं—और वही यादें अब भी जीवन का हिस्सा हैं।

कुछ अपडेट्स:
मेरे दादा (महीरुह शेखर बनर्जी) ने पोस्ट का ड्राफ्ट देखने के बाद कॉल किया और बताया कि दादाजी ने वास्तव में 1935 में 1600 बीघा (526.96 एकड़ या 214.08 हेक्टेयर) ज़मीन खरीदी थी।

নিখুঁত আমি, আর সবেতে গণ্ডগোল!

লেখক – কেমনামি বোকানি*  

ভাবছিলাম আমি একজন দারুণ লেখক। আর মানুষ হিসেবে? এক্কেবারে, যাকে বলে নিখুঁত।  আরে আরে রেগে যাচ্ছেন কেন? ভাবতে কি অসুবিধে বলুন তো মশাই? এবার সত্যি কথাটা শুনুন, যখন লিখতে শুরু করলাম তখন আমার সব বিদ্যে-বুদ্ধি অসভ্যের মতন দাঁত বের করে  সামনে এসে দাঁড়িয়ে পড়ল। আমি তো লজ্জায় কুপোকাত! এতটা হরিদাস পাল নিজেকে কখনোই ভাবতে পারিনা।   

এবার ভণিতা ছেড়ে অন্য কথায় আসি। সেতো সাড়ে ছয় দশক পেরিয়ে প্রায় সাত দশক হতে চলল, আমার মতন দশাসই অকাজের মানুষের ওজন বয়ে চলতে ধরতী-মায়ের মুখে কোন রা নেই, অন্য দেবতারাও তেমন করে কোন আওয়াজ ওঠাচ্ছেন না। কিন্তু, সময় নিয়ে কিছুটা সমস্যা বোধ হচ্ছে। সময়টাকে সুন্দর করে তোলাটা যে যেমন-তেমন কাজ নয় সেটা সহজেই বুঝতে পারি। সময়টা সুযোগ পেলেই ব্রহ্মদত্যির মতন হুড়মুড় করে ঘাড়ে চেপে বসে ঘাড় মটকে দিতে  চায়, কিন্তু ওকে দিয়ে আদর করিয়ে নিতে গেলে বা সুন্দর গল্পে মন ভুলিয়ে নিতে গেলেই মহা-চাপ। 

কথাপ্রসঙ্গে বলি, এই ‘চাপ’  কথাটা আজকাল বেশ জমিয়ে চলছে। আজকের বাঙ্গালীদের জন্য ‘চাপ’ নিয়ে থিওরি কষার দরকার পড়েনা। কাকারা চাপে ও তাপে বেশ আছেন। কারুরই খুব একটা নিজেকে নিয়ে ভাববার সময় নেই, অনেক মানুষই প্রায় নিঃস্বার্থভাবে অন্যের কি করা উচিত তা নিয়ে চিন্তিত হয়ে পড়েন। এতে, যারা ভাবছেন তাদের চাপ বাড়ে,বহু ক্ষেত্রে রক্তচাপও হয়ত বাড়ে। অনেকেই নিশ্চয় দুঃখিত হয়ে পড়েন যে তাদের এত ভাবা সত্যেও,  যাকে বা যাদের নিয়ে তারা চিন্তিত তাদের খুব একটা হেলদুল দেখতে পান না। বাংলায় এই ধরনের ঘটনাকেই বোধহয় বলে; “কবি এখানেই কেঁদেছেন”, এটি একটি বিশেষ বাগধারা বা লব্জ যাকে সোজা বাংলায় “বেঙ্গলী ইডিয়ম” বলা চলে।

কথা হচ্ছে, কবি না কাঁদলেও রাগ তো হতেই পারে। যারা সমাজসেবী তাদের কথা আলাদা, তাঁদের  জীবনই তো অন্যদের জন্যে উৎসর্গিত, আর এই ভাবনা তাঁদের সেবার অঙ্গ। যারা দেশ চালান বা দেশ চালানর কাজে যুক্ত হতে চান বা যে কোন অর্থে মানুষের সেবায় নিয়োজিত তাদের নিয়ে লিখছিনা, আমার লেখা এঁদের অতিরিক্ত মানুষজন নিয়ে। এই ধরনের মানুষজন অনেক বড় বড় ব্যপারের সাথে নিজেদের যুক্ত রাখেন, যেমন, কিউবার রাজনীতি বা দক্ষিণ আফ্রিকার অর্থনীতি। তখনই ছোটখাটো বিষয়ে চিন্তা করেন যখন নিজে কোন কারণে আটকে পড়েন। এই অসুবিধেটা অন্য কারুর বা ত্রুটিপূর্ণ ব্যাবস্থার দোষে হয়েছে, এ বিষয়ে তাদের খুব একটা সন্দেহ থাকেনা। ওই মানুষটা যদি এমনটি  করতেন তাহলেই তো কাজটা হয়ে যেত অথবা বর্তমান দোষপূর্ণ ব্যবস্থাই সব গণ্ডগোলের জড়। আমি ব্যাপারটাকে সাপোর্ট করি। তাই তো বলি; নিখুঁত আমি, আর সবেতে গণ্ডগোল!  

*নামটা দুষ্টুমি করে বদলে দেওয়া। “কেমনামি বোকানি” আসলে ভুল নিয়মের বাংলা বাক্য, যেখানে কেমন+আমি=কেমনামি, আর ‘না’ কে ‘নি’ লেখা হয়েছে, বোকা + নি (না) = বোকানি; কেমনামি বোকানি –> কেমন আমি, বোকা না? আরে আরে, রেগে যাচ্ছেন কেন? পরশুরামের ভাষায়; “হয় হয়, zaনতি পারনা” [দক্ষিণ-চব্বিশ-পরগণা অঞ্চলে নকারাত্মক অর্থে ‘নি’ এর প্রয়োগের বহুলতা দেখে পাওয়া যায়। যেমন, যাবেনি? দেবেনি? ইত্যাদি। যদিও ‘বোকানি’ সেভাবে হয়ত প্রয়োগ হয়না।]       

লেখক সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় বলছেন; “এ লেখাটা যদি ভাল লাগে তাহলে প্রশংসা আমাকেই করবেন। কিন্তু যদি পড়ে কিলোতে ইচ্ছে হয় তবে সে দায়িত্ব আমার নয়। সত্যি বলছি, ছোড়দি আর রাতু ভাল ভাল করেছে, তাই গ্যাস খেয়ে থাকতে না পেরে লেখাটা পাবলিক করে দিলাম। খারাপ লাগলে জানাবেন, ওদের ঠিকানা দিয়ে দেব।”

Hindi translation

निख़ुत मैं, और बाकी सब में गड़बड़!
लेखक केमनामी बोकानी (मस्ती में बदला गया नाम)*

सोच रहा था कि मैं एक ज़बरदस्त लेखक हूँ। और इंसान के तौर पर? बस कहिए—एकदम परफेक्ट। अरे अरे, ग़ुस्सा क्यों हो रहे हैं? सोचने में कोई टैक्स लगता है क्या? अब ज़रा सच्ची बात सुनिए—जब मैंने लिखना शुरू किया, तो मेरी सारी विद्या-बुद्धि ऐसे सामने आकर हँसने लगी जैसे कोई असभ्य आदमी बत्तीसी निकालकर हँसे! मैं तो शर्म के मारे गड़ गया। इतनी फज़ीहत कभी सोची भी नहीं थी।

ख़ैर, अब भूमिका छोड़कर असली बात पर आते हैं। साढ़े छह दशक बीत चुके हैं, लगभग सातवें में कदम रखने ही वाला हूँ। धरती माता पर मैं जैसा काम का न निकला, फिर भी धरती माँ चुपचाप मेरा बोझ ढो रही हैं—न कोई उफ़, न ही किसी देवता की तरफ से कोई आपत्ति। लेकिन, समय को लेकर थोड़ी गड़बड़ जरूर लगती है। समय को सुंदर बनाना मामूली बात नहीं है, ये मैं अच्छी तरह समझ चुका हूँ। समय मौका मिलते ही ब्रह्मदैत्‍य की तरह गर्दन पर चढ़ बैठता है और उसे मरोड़ देने को उतावला रहता है। लेकिन अगर उसे ज़रा प्यार से समझाओ, या अच्छी कहानी से बहलाओ—तो बस फिर भारी ‘चाप’ (दबाव)।

अब चूंकि बात निकली है, तो कह दूँ—आजकल ‘चाप’ शब्द बड़ा हिट चल रहा है। आज के बंगालियों को इस पर कोई शोध करने की ज़रूरत नहीं है। सब काका-मामा दबाव और ताप में अच्छे से पके हुए हैं। किसी को भी खुद को लेकर सोचने का फुर्सत नहीं, मगर दूसरों को क्या करना चाहिए—इस पर सब बहुत चिंतित रहते हैं। इस चक्कर में, सोचने वाले का चाप बढ़ता है, और कई बार रक्तचाप (BP) भी! कई लोग दुखी भी हो जाते हैं कि इतनी चिंता करने के बावजूद, जिनके बारे में वो चिंतित हैं, वे ज़रा भी नहीं बदलते। बंगाल में इसको शायद कहते हैं—”कवि यहीं रो पड़ा!” यह एक खास बांग्ला मुहावरा है, यानी एक “Bengali idiom”, जैसा कि आजकल स्टाइलिश लोग कहते हैं।

अब बात ये है कि कवि रोए या न रोए, ग़ुस्सा तो आ ही सकता है! समाजसेवियों की बात अलग है—उनका जीवन तो सेवा के लिए समर्पित होता है। जो देश चला रहे हैं, या देश चलाने का सपना देखते हैं, या किसी भी तरह से सेवा में लगे हैं—मैं यहाँ उनके बारे में नहीं लिख रहा। मेरा लेख बाकी सब लोगों के बारे में है।

ऐसे लोग बहुत बड़े-बड़े मुद्दों से खुद को जोड़कर रखते हैं—जैसे क्यूबा की राजनीति या दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था। लेकिन छोटे-मोटे मुद्दों की बात तब ही करते हैं जब ख़ुद किसी मुसीबत में फँस जाते हैं। और तब, ये पूरा यक़ीन होता है कि गलती उनकी नहीं, बल्कि किसी और की या किसी व्यवस्था की है। “अगर वह आदमी ऐसा करता तो काम हो गया होता!” या फिर, “सिस्टम ही सड़ा हुआ है!” — इन पर इनका दृढ़ विश्वास होता है।

और मैं? मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूँ। तभी तो कहता हूँ—निख़ुत मैं, और बाकी सबमें गड़बड़!”


* *यह नाम मस्ती में बिगाड़ा गया है। “ केमनामी बोकानी ” असल में गड़बड़ बांग्ला व्याकरण से बना है, जहाँ ‘केमन’ (कैसा) + ‘आमी’ (मैं) = ‘केमनामी’, और ‘ना’ को ‘नि’ करके ‘बोका’ (बेवकूफ़) + ‘नि’ = ‘बोकानी’। तो “केमनामी बोकानी” का मतलब निकलता है—”मैं कैसा हूँ, बेवकूफ़ नहीं क्या?”
अरे अरे, फिर से ग़ुस्सा कर रहे हैं? परशुराम की भाषा में कहें तो—”हाय हाय, Zaनती पारोना!” (यह दक्षिण २४-परगना क्षेत्र में नकारात्मक अर्थ में ‘नि’ का लोकप्रिय प्रयोग है—जैसे ‘जाबेनि?’ यानी ‘नहीं जाओगे?’, ‘देबेनि?’ यानी ‘नहीं दोगे?’, आदि। हालाँकि ‘बोकिनी’ इस तरह सामान्यतः नहीं कहा जाता)।

लेखक संजय बंदोपाध्याय कहते हैं:
“अगर यह लेख अच्छा लगे तो तारीफ़ मुझे ही कोरियेगा। लेकिन अगर पढ़कर ठुकाई करने का मन करे, तो उसकी ज़िम्मेदारी मेरी नहीं। सच में कह रहा हूँ—छोड़ीदी और रातू ने हौसला बढ़ाया, जयादा गैस कहा कर लेखको पब्लिक कर दिया। अगर बुरा लगे तो बताइए, उनका पता दे दे दूँ।”

प्रकाशित तिथि: 10 सितम्बर, 2021

‘১৩ জুলাই ২০১৮ আমার মৃত্যুদিন’ – চিত্রগুপ্ত কি চটজলদি কিছু আপডেট করলেন?

First posted on July 22, 2018 by sitardivine

সমুদ্রে প্রচণ্ড ঢেউ, ডুবেই  যাচ্ছি,  শরীরটাকেও ধরে রাখা যাচ্ছেনা, স্রোত  টেনে নিয়ে যাচ্ছে ! পারের জেলেটিকে  আমার মেয়ে বল্ল,  একটু এগিয়ে গিয়ে  বাবাকে  বাঁচিয়ে নাও। “না দিদি, পারবোনা ।”

বেশ কিছুদিন  ধরেই  আমরা ভাবছিলাম  কোথাও  একটু বেড়িয়ে  এলে  কেমন হয়।   মেয়ের  বিয়ের  পর  আমাদের সবাই  মিলে কোথাও  যাওয়াই হয়নি। টিপাই-র বুক করা হেনরি আইল্যান্ড এর মনোরম অতিথিশালায় যখন পৌঁছুলাম তখন সন্ধ্যে হয় হয়। তারপর তো  জমজমাট পার্টি! শুতে শুতে বেশ অনেকটাই রাত হয়ে গেলো। ভোর পৌনে পাঁচটায়, তখন ও ঘুম পুরো হয়নি, ফোন বেজে উঠল;  “বীচে যাবে নাকি?”  মিম্মাইর ফোন। আমি  ঝটপট তৈরি হয়ে নিলাম, দুজন ড্রাইভারকেও  জাগানো হল। আমার গিন্নি বললেন, তাঁর তৈরি হতে কিছুটা সময় লাগবে। মা আর রুশাই  অন্য ঘরে  ছিল। রুশাই এর ও ঘুম জরুরী। তাই, ওরা তিনজন রয়ে গেলো। আমরা পাঁচজন;  সতুদা, বৌদি, টিপাই, মিম্মাই আর আমি গাড়ী চেপে রওনা হয়ে গেলাম। গাড়ী পৌঁছে দিলো একটা বাঁশের সাঁকোর সামনে।

নীল-সাদা রং করা  বাঁশের সাঁকো পেরুতেই   সমুদ্রের আওয়াজ কানে এলো। মনটা খুশীতে ভরে গেলো, সমুদ্র যদিও তখনও  দেখা যাচ্ছেনা। রুশাইর পছন্দ আর আমার গিন্নীর সমর্থনে একটা দামী ফোন কিনেছিলাম। ওটি বেশ ভালো ছবি তোলেন আর পকেটেও সহজেই চলে আসেন, তাই এবার  আর ক্যামেরা বা আই-প্যাড নিয়ে যাইনি। হৈ-চৈ করে ছবি তুলতে থাকলাম। নিজে ছবি তুলি, আর নিজেই খুশি হই। মাঝে মাঝে তারিফ পাওয়ার জন্য, কখনো সতুদা বা কখনো বৌদিকে ছবিগুলো দেখাই। মিম্মাই আর টিপাই কে দেখিয়ে লাভ নেই, কারণ ওদের পকেটেও ওই  যন্ত্র বা ওর থেকেও  ভালো যন্ত্র আছে। যাই  হোক ,  শেষ পর্যন্ত  বীচে  পৌঁছে গেলাম। দেখলাম বেশ বড় বড় কয়েকটা  সাইনবোর্ড।অতো সুন্দরের  মাঝে  কেউ কি আর পড়াশুনো করে? হয়ত’  পড়লাম, কিন্তু কিছুই  মাথায় ঢুকলোনা।

সমুদ্রতটে পৌঁছে  দেখলাম সামনে  অল্প  একটু জল, ওটা পেরুলেই  চড়া, আর  তার পরই দিগন্তজোড়া সমুদ্র –  তাতে সূর্য উঠছে!  সমুদ্র যেন হাতছানি দিয়ে ডাকল, ‘চলে এসো’। আমরা  পাঁচজনেই ছপ-ছপ  করে  জল পেরিয়ে চরায় গিয়ে   উঠলাম।  মনটা ভরে গেলো। সতুদা আর টিপাই আরও এগিয়ে সমুদ্রের জলে পা ভেজাল।  আমি আসার আগে ইন্টারনেট এ  হেনরি আইল্যান্ড সম্বন্ধে কিছুটা পড়েছিলাম। জেনেছিলাম, ওখানে চোরাবালি আছে। বাচ্চাদের মনের জোর অনেক বেশী, রুশাই কে বলাতে ও মুচকি হেসেছিল, হয়ত মনে মনে বলেছিল ‘বাবাইটাকে নিয়ে আর পারা যায়না’।  যাই হোক আমি নিজে খুব সাবধানে পা ফেলে ফেলে চলছিলাম, যাতে  বালি নরম পেলেই টের পাই। দেখলাম সমুদ্রের কাছে সহজেই পোঁছে গেলাম। আনন্দ  আর ধরেনা। ছবির পর  ছবি তুলতে শুরু করলাম। সতুদা নানা পোজ দিয়ে  ছবি তুলল, একটা ছবি আবার বৌদিকে আধ-জড়িয়ে। টিপাই একদম ছবি তোলাতে চায়না। বৌদি বল্ল, ওর কয়েকটা ছবি তুলে দাও। দুর থেকে জুম করে যতটা  তোলা যায় তুললাম। কিন্তু ওভাবে কি আর ভালো ছবি হয়?  তখন ওকে বললাম, ‘এই  কাছে আয়, তোর সাথে দু-একটা সেলফি  তুলি। ও আপত্তি করলনা। স্ক্রিন এ ওর বাবা-মা আসছিল, বল্ল, তাড়াতাড়ি তোল, ওঁরাও ছবিতে চলে আসুক। সতুদাকে ফ্রেমে ধরা গেলনা, কিন্তু বৌদিকে ধরতে পারলাম।

তাখন সমুদ্র অল্প অল্প করে বাড়তে শুরু করেছে। টিপাই আর মিম্মাই সকালের প্রয়োজনে  আমাদের ছেড়ে আবার ওই ছপ-ছপ করে জল পেরিয়ে চলে গেলো। আমার বুড়ো-বুড়ীরা  তখন চরাতে হইচই করছি।  কিছুক্ষণ চলার পড় মনে হল এখন ফেরা যাক।

সমুদ্রের দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে দেখি মিম্মাই আর তার মা তটে  চলে  এসেছে। তখনই টের পেলাম সমুদ্র বেশ তাড়াতাড়ি  উথাল পাথাল করতে শুরু করেছে। সতুদা কে ডাকলাম, ‘তাড়াতাড়ি চলে আয়’। ও বোধ হয় ঠিক বুঝতে পারলনা। আমি ফেরার জন্যে হাঁটতে শুরু করেছি, সাথে বৌদি, সতুদা বেশ কিছুটা দুরে। আমি আর বৌদি তখন চেঁচাতে শুরু করেছি, ‘তাড়াতাড়ি এসো’, ‘তাড়াতাড়ি আয়’।

চরার শেষ প্রান্তে এসে দেখি, সেই অল্প জল প্রায় চারগুণ চওড়া হয়ে গেছে। কোথা দিয়ে যে ফিরব  ঠিক করতে সময় লাগছে। মিম্মাই বল্ল,  ‘ওদিক দিয়ে এসো’, ওদিকটা কিছুটা কম  চওড়া। ওই প্রান্তে গিয়ে দেখছি পার ভাঙতে শুরু করেছে। তখনই বুঝলাম,  যত দেরী হবে ততই তীরে  পৌঁছোতে পারার সম্ভাবনা  কমতে থাকবে। তখনও সতুদা বেশ কিছুটা দুরে।  অবস্থার ভয়াবহতা তখনো ও জানেনা। যাই হোক। নেমেই দেখলাম হাঁটু জল, জলে বেশ তোড়। হাঁটতে  শুরু করলাম,  যতটা তাড়াতাড়ি ওই স্রোতে হাঁটতে পারি। যতই সামনে এগুচ্ছি জল বাড়ছে, হাঁটু থেকে বুক, বুক থেকে গলা, তারপর তারও  ওপরে। মুখে নোনা জল ঢুকে যাচ্ছে, আর পা পাচ্ছিনা। ছোটবেলায়  ঢাকুরিয়াতে ‘ডগস ক্রল’ শিখেছিলাম, চেষ্টা করলাম, তেমন কোন কাজে এলনা। সমুদ্র তখন এই ভারী শরীরটাকেও ভাসিয়ে দুরে নিয়ে যাচ্ছে। যখন মাথা উঠল, তখন জেলেটিকে বললাম সাহায্য করতে, সে স্পষ্ট ‘না’ বলে দিলো। আমি মিম্মাই কে বললাম ‘তুই দৌড়ো’। গিন্নিকেও দেখলাম, সে অনেকটা দুরে। আমি বেশ তাড়াতাড়ি স্রোতের তোড়ে  সরে সরে যাচ্ছিলাম যে, ক্রস কারেন্টে খুব তাড়াতাড়ি পায়ের নিচের বালি সরে যাচ্ছিল। সেইসময় জেলেটি বল্ল, ‘বসে পরুন’। আমি হাঁটুর ওপর ভর দিয়ে বসে পড়লাম, শরীরটা যতটা উঁচু রাখা যায় সেভাবে। তাতে আমার বয়ে যাওয়াটা আটকাল। তখন সমুদ্রের বড়  ঢেউটা ফিরে গেছে আর নতুন ঢেউ তৈরি হচ্ছে। আমার গলা অবধি জল, বসে আছি। মিম্মাই তাখন জলে নেমে এসেছে। ও বলছে, ‘বাবাই,  দাঁড়িয়ে পড়’। আমি দাঁড়াব কি, তখনও ওখানে যা তোড়, দাঁড়ালেই তো  ভেসে যাব! মিম্মাইর যখন হাত বাড়াতে বাড়াতে আমার হাত অবধি পৌঁছুল, তখন ওরও হাঁটুর ওপরে জল। ওর হাত ধরে উঠে দাঁড়িয়ে যত তাড়াতাড়ি পারি জল ভেঙ্গে পারে এলাম।

পারে এসে দেখি সতুদা আর বৌদি তখনও চরাতে। ওদের গল্প আরও অনেক অনেক বেশী ভয়ঙ্কর। সে গল্প আরেকদিন বলব। শুধু এইটুকুই বলে রাখি, ওরাও  চিত্রগুপ্তের খাতায়  নতুন করে নাম লিখিয়েছে।

গ্যাংটক২২ জুলাই ২০১৮

—–

কোন ছবি দিতে পারলাম না। আমি যদিও  প্রাণ পেয়েছি,  কিন্তু  আমার  ফোনটি  বঙ্গোপসাগরের  জলে দেহ  রেখেছে।

“13 July 2018 – My Death Day” – Did Chitragupta suddenly update something?
First posted on July 22, 2018 by sitardivine

Huge waves in the sea. I was going under. I couldn’t hold my body steady—dragged by the current! My daughter asked a young girl on the shore, “Please help save my father.” The girl flatly refused, “No, Didi, I can’t.”

For some time, we’d been thinking of taking a small trip. After my daughter’s wedding, we hadn’t gone anywhere as a family. So we booked rooms at a charming guest house in Henry Island through Tipai. We reached just around dusk. Then—party time! We stayed up late, and around 4:45 in the morning, still not fully asleep, I got a call: “Want to go to the beach?” It was Mimmy. I got ready quickly, and we even woke up two drivers. My wife said she needed more time. My mother and Rushai were in another room. Rushai values her sleep dearly. So those three stayed back. The five of us—Satudada, Boudi, Tipai, Mimmy, and I—set off in a car. It dropped us in front of a bamboo bridge.

As we crossed the blue-and-white painted bridge, we could hear the sea. My heart leapt with joy, though the sea was not yet visible. I had recently bought a fancy phone, encouraged by Rushai and my wife, that took great photos and fit easily into a pocket—so I’d left the camera and iPad behind. We started clicking pictures, full of cheer. I took photos and happily admired them. Occasionally, I’d show them to Satudada or Boudi to fish for compliments. No point showing Tipai or Mimmy—they had better gadgets in their pockets!

Eventually, we reached the beach. There were big signboards everywhere—but who reads in paradise? I might’ve glanced, but nothing registered. Reaching the shore, we saw a shallow stream; across it lay a sandbar, and beyond that—the boundless sea, with the sun rising! The sea seemed to beckon, “Come to me.” All five of us splashed through the water to the sandbar. It was magical. Satudada and Tipai went further and wet their feet in the sea. I’d read up online beforehand and knew the area had quicksand. I had warned Rushai, who had just smiled—probably thinking, “Dad and his over-worrying!”

So I moved cautiously, testing the sand with every step. Soon, I found myself quite close to the sea, bursting with joy, taking picture after picture. Satudada struck dramatic poses, even wrapping an arm around Boudi for one. Tipai hates being photographed, but Boudi asked me to take some. I zoomed in from a distance, though not very successfully. I asked Tipai to come closer for a selfie. She didn’t mind. As her parents were also in the frame, she said, “Quick, take it before they leave!” I couldn’t fit Satudada in, but managed to capture Boudi.

By then, the tide had begun to rise. Tipai and Mimmy left for the morning’s necessities, splashing back across the water. The older folks were still on the sandbar, merrily chatting. After a while, I decided to return.

Turning back from the sea, I saw Mimmy and her mom already on the shore. That’s when I noticed how fast the tide was rising. I called out to Satudada, “Come back quickly!” But he didn’t seem to grasp the urgency. I started walking back with Boudi. We began shouting: “Come quickly! Hurry!”

When I reached the edge of the sandbar, the shallow stream had widened nearly fourfold. I wasn’t sure where to cross. Mimmy pointed to a narrower stretch, “Try that way.” But when we reached it, we saw the shoreline was eroding. I suddenly realized—the longer we delayed, the harder it would be to get back. Satudada was still far behind and unaware of the danger. I stepped in—knee-deep water, strong current. I tried walking as fast as I could. The water kept rising—knee, chest, neck, even higher. Salty water splashed into my mouth, and my feet lost contact with the ground.

I’d once learned “dog’s crawl” swimming in Dhakuria as a kid. Tried it—useless. My heavy body was being swept away. I surfaced and called out to a girl nearby for help. She said flatly, “No.” I shouted to Mimmy, “Run!” I saw my wife far away. The cross-current was eroding the sand under my feet rapidly. Then the girl said, “Sit down.” I knelt, keeping my body as upright as possible. That somehow stopped me from being swept away.

The biggest wave had passed, and a new one was building. I was neck-deep in water, just sitting. Mimmy had stepped in by then. She called out, “Babai, stand up!” But how could I? In that kind of current, I’d be gone in seconds. When her outstretched hand finally reached mine, the water was already above her knees. Holding her hand, I somehow stood up, waded through the water, and reached the shore.

On the shore, I saw Satudada and Boudi still stranded on the sandbar. Their story is even more terrifying. I’ll save that for another day. Let’s just say—they too had their names freshly entered into Chitragupta’s ledger.

Gangtok, July 22, 2018

Couldn’t share any photos. Though I survived, my phone now rests forever in the Bay of Bengal.


१३ जुलाई २०१८ मेरी मृत्यु तिथि” क्या चित्रगुप्त ने अचानक कुछ अपडेट किया?
प्रथम प्रकाशन: २२ जुलाई २०१८, sitardivine द्वारा

समुद्र में ज़बरदस्त लहरें थीं। मैं डूब रहा था, शरीर को भी संभाल नहीं पा रहा था, धारा खींचे लिए जा रही थी! किनारे की एक लड़की से मेरी बेटी बोली, “जरा आगे जाकर पापा को बचा लो।” लड़की बोली, “ना दीदी, मैं नहीं कर सकती।”

काफी दिनों से सोच रहे थे कि कहीं घूम आएं। बेटी की शादी के बाद हम सबने साथ कहीं जाना ही नहीं हुआ था। टाइपाई ने हेनरी आइलैंड की सुंदर गेस्टहाउस बुक कर दी। हम जब पहुँचे, तो शाम होने वाली थी। फिर तो पार्टी! सोते-सोते रात काफी हो गई। सुबह पौने पाँच बजे, नींद पूरी नहीं हुई थी, तभी फोन बजा: “बीच पर चलोगे?” मिम्माइ का फोन था। मैं जल्दी तैयार हो गया, दो ड्राइवरों को भी उठाया गया। मेरी पत्नी ने कहा, उन्हें थोड़ा समय लगेगा। माँ और रुशाइ दूसरे कमरे में थीं, वे तीनों वहीं रहीं। हम पाँच—सतुदा, बौदी, टाइपाई, मिम्माइ और मैं—गाड़ी में सवार होकर निकल पड़े। गाड़ी हमें एक बाँस के पुल तक छोड़ गई।

नीले-सफेद रंग वाले बाँस के उस पुल को पार करते ही समुद्र की आवाज़ कानों में पड़ी। दिल खुश हो गया, भले ही समुद्र अभी दिखाई नहीं दे रहा था। रुशाइ की पसंद और पत्नी की सलाह पर एक महँगा फोन लिया था। वही काफी अच्छा फोटो लेता था और जेब में भी आसानी से आ जाता था, तो कैमरा और iPad साथ नहीं लाया। धड़ाधड़ फोटो खींचने लगे। खुद ही फोटो लेता, खुद ही खुश होता। बीच-बीच में तारीफ पाने के लिए कभी सतुदा, कभी बौदी को दिखाता। मिम्माइ और टाइपाई को दिखाने का कोई मतलब नहीं, उनके पास तो और भी अच्छे डिवाइस थे।

आख़िरकार हम बीच तक पहुँच ही गए। वहाँ बड़े-बड़े साइनबोर्ड लगे थे। लेकिन इतनी सुंदरता के बीच कौन पढ़ाई करता है? शायद पढ़ा था, लेकिन दिमाग में कुछ गया नहीं।

समुद्र तट पर थोड़ा पानी था, उसके पार एक रेत की पट्टी, और फिर क्षितिज तक फैला समुद्र—जिसमें सूरज उग रहा था! समुद्र जैसे बुला रहा था, “आ जाओ।” हम पाँचों छप-छप करते हुए रेत की पट्टी पर पहुँच गए। दिल खुश हो गया। सतुदा और टाइपाई आगे बढ़कर समुद्र में पैर डुबोए। मैंने इंटरनेट पर पहले पढ़ा था कि वहाँ दलदल है। बच्चों का मन मजबूत होता है, रुशाइ से कहा तो वो मुस्कुरा दी—शायद मन ही मन कहा, “पापा का कोई इलाज नहीं!”

मैं बहुत सावधानी से कदम रख रहा था ताकि नर्म बालू का अंदाज़ा लगा सकूं। देखा तो समुद्र के पास पहुँच ही गया। तस्वीरें खींचने लगा। सतुदा अलग-अलग पोज़ में फोटो खिंचवाने लगे, एक तो बौदी को आधा गले लगाकर भी। टाइपाई को फोटो नहीं खिंचवानी थी, लेकिन बौदी बोलीं, कुछ तस्वीरें ले लो। ज़ूम करके जितना हो सका, लिया। फिर कहा, “पास आ जा, एक-दो सेल्फी ले लूं।” टाइपाई मान गई। स्क्रीन पर उसके माता-पिता भी आ रहे थे, बोली, “जल्दी लो, वो भी आ जाएं तस्वीर में।” सतुदा को नहीं ला सका, पर बौदी आ गईं।

तभी समुद्र धीरे-धीरे बढ़ने लगा। टाइपाई और मिम्माइ वापस ज़रूरत से लौट गईं। हमारे बुज़ुर्ग रेत पर गपशप कर रहे थे। कुछ देर बाद लगा, अब लौटना चाहिए।

पीछे मुड़ा तो देखा मिम्माइ और उसकी माँ किनारे आ चुकी थीं। तभी समझ में आया कि समुद्र तेज़ी से चढ़ रहा है। सतुदा को आवाज़ दी, “जल्दी आओ!” शायद उन्हें खतरे की गंभीरता समझ नहीं आई। मैं बौदी के साथ वापस चल पड़ा। हम दोनों ज़ोर से चिल्लाने लगे, “जल्दी आओ, जल्दी!”

रेत की पट्टी के छोर पर देखा कि पहले जो थोड़ा पानी था, अब वो चार गुना चौड़ा हो गया है। कहाँ से पार करें, समझ नहीं आ रहा था। मिम्माइ ने कहा, “उधर से आओ,” वो हिस्सा थोड़ा कम चौड़ा था। वहाँ गए तो देखा, किनारा टूट रहा है। तब समझ में आया, जितनी देर होगी, तट तक पहुँचना उतना ही मुश्किल हो जाएगा। सतुदा अभी भी दूर थे, खतरे को शायद नहीं समझ रहे थे। मैंने उतरते ही देखा, पानी घुटनों तक था और बहाव तेज़। तेज़ी से चलने लगा। आगे बढ़ते-बढ़ते पानी घुटनों से छाती, फिर गले, फिर उससे ऊपर तक चला गया। मुँह में खारा पानी घुस रहा था, पैर ज़मीन से उखड़ चुके थे।

बचपन में ढाकुरिया में “डॉग्स क्रॉल” तैरना सीखा था, कोशिश की—कोई फ़ायदा नहीं। समुद्र मुझे बहाए ले जा रहा था। जब सिर ऊपर आया, तो उस लड़की से मदद माँगी—उसने साफ़ मना कर दिया। मिम्माइ से बोला, “तू दौड़।” पत्नी को देखा—वो काफी दूर थी। धारा के ज़ोर में बहुत तेज़ी से रेत खिसक रही थी। तभी लड़की बोली, “बैठ जाइए।” मैं घुटनों के बल बैठ गया, शरीर को जितना ऊपर रख सकूं, रखा। इससे बहाव रुक गया।

बड़ी लहर लौट चुकी थी और नई बनने लगी थी। मेरा गला तक पानी में डूबा था, मैं बैठा था। मिम्माइ पानी में आ चुकी थी। वो बोली, “बाबाई, खड़े हो जाओ।” लेकिन मैं कैसे खड़ा होता! बहाव इतना तेज़ था कि खड़े होते ही बह जाता। जब उसका हाथ मेरे हाथ तक पहुँचा, तब तक पानी उसके घुटनों के ऊपर था। उसका हाथ पकड़कर जैसे-तैसे खड़ा हुआ और पानी चीरते हुए किनारे पर आ गया।

किनारे आकर देखा, सतुदा और बौदी अभी भी रेत पर थे। उनका अनुभव और भी डरावना था। वो कहानी फिर कभी। बस इतना कह दूँ—उनके नाम भी चित्रगुप्त की डायरी में फिर से दर्ज हो गए हैं।

गैंगटोक, २२ जुलाई २०१८
–––
कोई फोटो नहीं दे सका। मैं तो बच गया, लेकिन मेरा फोन बंगाल की खाड़ी के जल में अपनी देह छोड़ गया।

Remembering Peejush Prasanna on 01 January 2009 evening

First Posted on August 15, 2012 by sitardivine

A Report by Sanjoy Bandopadhyay [copied from ‘Family Wiki’]

It was 6:15 in the evening, the call-bell rang. I got angry because I told everyone to keep the house gate unlocked – we were expecting our people to come. I thought it was Rushai who locked the door and I was about to shout at him – just then Mim commented – “Kuttipishi [Apun] has come”. I looked down from the first floor balcony and a pleasantly surprised to discover Mim was correct. Yes, it was my sweet Kuttididi and my sweet sis was confident that the door was locked – which was actually not so. She is such a good soul, simple and true!

I gave some good thoughts on how we can observe this first day of 2009 in the family. It was not easy for me to plan and manage. Finally we decided that it may be a simple one. The first thing I did was to take the phone out of the cradle and start dialing the few numbers that were almost my own numbers. It was nice to feel the warmth. Most of them said that they will make it – a few said that they won’t be able to – I could understand – After all, it was January 1, this is a day to celebrate, to go naughty, to have a special free day — to prepare for the year long routine – But, sure I did not reach all to whom I should have – thinking formally — No, it was January 01 for me too – so ‘’ Bura na mano – New Year day hai – “ Still, I can easily see I missed many. I especially missed Apu [Sandipan Mukherjee] – I shall tell you why when the time comes –

The clocked ticked by – I started getting nervous – and praying for the next soul to arrive. To my great pleasure Dada and Didin came. We were so happy! But yes, I missed some souls here too – but took caution and remembered not to ask anything — after all it was January 01. After sometime this little house was full – and I forgot everything – and started enjoying the collective consciousness – the consciousness created in a group of similar minds. I am glad that Dadabhai [Pranab] and Didibhai [Sathi] also made it. I knew how important was the 01 January evening for them too – but they chose to join us, I was very glad.

Everyone took care to first go to the thakurghar and pay their homage. It was very simple at the Thakurghar where we garlanded Thakur and Dadu-Thakuma with thick ‘Rajanigandhar mala’. Papa’s photo was just there on the table where Rakhi spread a clean white cloth. A pack of India Kings cigarette, a match box and a 100 gram Cadbury Milk Chocolate bar were there on the table as a treat to him. Rakhi read the ‘Satyanarayaner Panchali’ before Thakur. Kuttididi [Apun] joined her during the puja.

People actually arrived after the pujas was over. All went to put their homage [Pranam] to Thakur, and also Peejush Prasanna. Then we enjoyed two and a half hours uninterrupted joy! We just forgot time – we talked about Papa, we saw 145 old photographs and tried to put our brains to discover who they were! They were all our near ones – but we could not recognize many – Here Didin was the champion, she knew many of them – Dada was not behind – he also knew many – Mejdi also tried to help – Chhordi recognized some of her own photographs – It felt so good – such an enjoyable exercise—I am happy that Didin could not leave us early – and almost missed her appointment— I thought – all must go crazy – it was January 01. In between we were served tea in small plastic cups – I don’t know from where these came – I did not get them this morning. Actually, Rushai and I went to Lake Market to buy a few things including disposables – but we did not buy plastic cups— it must be Rakhi or Ma’s magic from old stock. Then we were served ‘Bake Club’ packets. Then someone told that we should have the ‘prasad’ first. So, Rakhi started the Prasad distribution arrangement. I must not forget to mention Dipankar, my student. Let me tell you Dipankar is an excellent flautist. He came around 4 in the afternoon. Since then he was busy in all the arrangements – be it heating the Chicken Piccadilly, vegetable patties or repacking them in the box and serving us.

The day ended with many promises – we promised to assemble periodically – we should remember the dripping love and affections of our seniors and should get inspired – We should spread the message of Love. We also remembered The ‘Absolute Truth’, which Papa used to propagate amongst his closest ones.

Before closing I must not forget to mention that Rushai took all the photographs – so it has become possible to create this photo-report.

Finally us, who assembled on this evening [typed without any specific sequence]: Didin [Swagata Banerjee], Dada [Mahiruha Shekhar Banerjee], Banudi [Arundhati Chakraborty], Baudi [Suchishubhra Mukherjee], Mejdi [Sushanta Siromoni], Chhordi [Samapika Sil], Tuki [Tuki Banerjee], Aindri [Aindrila banerjee], Nandada [Nandan Sil], Kuttididi [Sharmila Sivadasan], Rajada [Sivadasan], Dadabhai [Pranab Dutta], Didibhai [Sathi Dutta], Suju [Sulata Ghosh], Arun [Arun Ghosh], Mityl [Mityl Chakravarty], Manali [Manali Chakravarty], Bubu [Kastoori Guha Siromoni], Babi [Sushmita Siromoni], Tuntu [Ashmita Siromoni], Johny [Arunima Ghosh], Ratu [Ritwik Banerjee], Soma [Soma Banerjee], Rahuli [Arijit Mukherjee], Ishita [Ishita Mukherjee], Mainak [Mainak Banerjee], Dipankar [Dipankar Mukherjee], Anjanda [Anjan Chakraborty – joined late] and we in the house — Maa [Leela Banerjee], Juam [Rakhi Banerjee], Mimmai [Shreemoyee Banerjee], Rushai [Rrik Banerjee] and I [Sanjoy Bandopadhyay]. To end let me type down Papa’s writing that I found in a tiny piece of paper. He wrote it on 13 September 1983 at Khairagarh. You may also find this included in the composed photograph above.
13/9/83

Religion Universal
In universal religion

Relegare has to be found

And relegere is to be done;

It is holy and blissful,

The search for relegare

That which binds

Can nothing but Truth alone,

Not the relative, the absolute one.

Read again means repeatation

The absolute truth in meditation,

This can be had from one who knows

Otherwise there is no end of toils.

Peejush Prasanna Banerjee

SB’s note:

I take the opportunity to write the meanings of two words those are not in common use.

relegere = to read or pursue together; the same root goes to legible and intelligent

relegare = to tie back, to bind fast

Aum Satyam Aum

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