English translation Hindi Translation
কিছু শোনা গল্প
গত-রাত্রে আবিষ্কার করলাম যে আমি শুনে শুনে অনেক কিছু জানি, কিন্তু এ খবরটা আমার কাছেই ছিলনা। গতকাল ছেলে আর তার বৌ আমাকে বগলদাবা করে দাদা-বৌদির সল্টলেকের বাড়িতে নিয়ে গিয়েছিল, সেখানেই এই অবাক-জ্ঞান প্রকট হ’ল। কেন কি ব্যাপার এসব বলতে গেলে পুরো মজাটাই চটকে যাবে। কিন্তু যে আইডিয়াটা এলো তা হচ্ছে “শোনা গল্প” এই নামে একটা সিরিজ শুরু করতে হবে। সিরিজের প্রথম গল্প “বগলা প্রসন্ন, স্যান্ডহার্স্ট, ও চার্চিল”।
[সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায়, মার্চ 22, 2026]
বগলা প্রসন্ন, স্যান্ডহার্স্ট, ও চার্চিল
সেটা ছিল 1923, বগলা প্রসন্নর বয়স তখন বছর পনেরো হবে। ডানহাতে ভারী রোলার আর বা-কাখে বছর তিনেকের ছোট ভাই খোকনকে নিয়ে টিলার ওপরে বাড়িতে পৌঁছন বগলার খেলার মধ্যেই পড়ত। সুঠাম শরীর আর শক্তি দেখে অ্যাশ-পাশের মানুষ প্রশংসার চোখে তাকিয়ে থাকত। গল্পের সূত্রপাত এখান থেকেই।
সেদিন রবিবার, রাজেন্দ্রলালের বাড়িতে সাজ-সাজ রব, কেউ টেবিল সাজাচ্ছে তো কেউ চেয়ার মুছছে, সব ঝকঝকে দেখাতে হবে। নতুন চিনামাটির প্লেট, ছুড়ি, কাঁটা, চামচ সব থরে থরে সাজানো হচ্ছে, তাড়া-হুড়োতে মাঝে মাঝেই বাসনে-বাসনে ঠকাঠুকির আওয়াজ পাওয়া যাচ্ছে। সকাল 11-টা নাগাদ খবর এলো ডিস্ট্রিক্ট ম্যাজিস্ট্রেট সাহেব পৌঁছে গেছেন। হঠাৎ করেই পুরো বাড়ী শান্ত হয়ে গেল। কোট প্যান্ট টাই বুট পরা টক টকে গোরা সাহেব চার্লস জিওফ্রে বাকল্যান্ড স্টিভেনস তার গাউন পরা বৌকে নিয়ে গট গট করে হেঁটে ওপরে উঠে এলেন। রাজেন্দ্রলাল তখন এগিয়ে এসে “গুড মর্নিং মিস্টার স্টিভেনস, হ্যালো ম্যাডাম গুড মর্নিং” করে অভ্যর্থনা জানালেন। আসুন আসুন করে অতিথিদের বসান হল, সামনে বড় টেবিল তাতে যত্নে সাজানো বাগান থেকে সদ্য তুলে আনা থোকা থোকা ফুল।
রাজেন্দ্রলাল তাঁর বড়ছেলেকে ডাকলেন, “খোকা, এদিকে আয়।“ বালক বগলা প্রসন্ন মাথা উঁচু পিঠ সোজা করে ঘরে ঢুকল। ব্যাপারটা সাহেবের কিছুটা অন্যরকম লাগল। সাহেব ভাবলেন “Indian kids are rarely this confident!” বগলা প্রসন্ন এগিয়ে এসে সাহেবের সাথে হাত মেলালেন। ১৫ বছরের বগলা আর ৪৩ বছরের স্টিভেনস। মিলিটারি ট্রেইন্ড সাহেবের বজ্রমুষ্টি বগলার হাতে পড়ল। বগলা বুঝল যে সাহেব হাত শক্ত করছে, সেও হাতের শক্তি বাড়াতে শুরু করল। সাহেব শক্তি বাড়াচ্ছে তো বগলাও বাড়াচ্ছে। ৪৩বছরের স্টিভেনস আর ১৫র বগলার এই ছোট্ট শক্তি যুদ্ধে সাহেব বুঝলেন যে এই বাচ্চার প্রতিভা আছে। স্টিভেনস ততক্ষণে ইমপ্রেসড হয়ে গ্যাছেন, ওঁর মিলিটারি ইনস্টিংট কাজ করতে শুরু করেছে। বগলা ঘর থেকে চলে যাবার পর সাহেব মুখ খুললেন। বললেন, “Mr. Banerjee, let me tell you something. I think, your son Bagala will do good if he goes through military training. What do you think? I shall be glad to check out the possibilities.” রাজেন্দ্রলাল বললেন, “Certainly, Sir, whatever you think good. I shall be very glad.”
এর পর স্টিভেনস সাহেব ইংল্যান্ডে ওর এক বন্ধুকে চিঠি লিখে পুরো ব্যাপারটা জানান। বন্ধু চার্চিল তখন সেক্রেটারি অফ স্টেট অফ ওয়ার। চার্চিল, হ্যাঁ, ঠিক ধরেছেন স্যার উইনস্টন চার্চিল যিনি পরে ব্রিটিশ প্রিমিয়ারে হয়েছিলেন। উনি স্যান্ডহার্স্টে, মানে রয়েল মিলিটারি একাডেমি স্যান্ডহার্স্টএ বগলা প্রসন্নের ভর্তির জন্য সুপারিশ করেন। প্রসঙ্গত বলে রাখি ভারত-পাকিস্তানের 1965-র যুদ্ধের দুই-পক্ষের সেনা-প্রমুখ জেনারেল জে এন চৌধুরী ও জেনারেল আয়ুব খান দুজনেই 1920’র দশকে একই সাথে স্যান্ডহার্স্টে প্রশিক্ষিত হন।
স্যান্ডহার্স্ট থেকে বগলা প্রসন্নের ভর্তির চিঠি ছাড়া হয়, সে চিঠি যখন কুমিল্লার ময়নামতী পৌঁছয় তখন বগলা অসুস্থ, আর তার কিছুদিন পর উনি টাইফয়েড রোগে আক্রান্ত হয়ে মারা যান। ওর স্যান্ডহার্স্টে ভর্তি হয়ে নিজেকে প্রমাণিত করা আর হয়ে উঠলোনা। এই ধাক্কাটা খুব ভারী পড়ল। অনেকেই মনে করেন, এই ঘটনা সম্পূর্ণ পরিবারের বর্তমান ও ভবিষ্যৎকে সবলে নাড়িয়ে দিয়েছিল।
English Translation

Stories Heard in Passing
Last night I discovered something about myself—that I know many things simply by listening, yet I was unaware of this fact myself. Yesterday, my son and his wife practically dragged me off to my elder brother and sister-in-law’s house in Salt Lake, and it was there that this surprising realization surfaced.
If I begin to explain why and how, the charm of the story will be lost. But the idea that emerged is this: I must start a series titled “Stories Heard in Passing.”
The first story in this series: “Bagala Prasanna, Sandhurst, and Churchill.”
[Sanjay Bandopadhyay, March 22, 2026]
Bagala Prasanna, Sandhurst, and Churchill
It was the year 1923. Bagala Prasanna was about fifteen years old. Carrying a heavy roller in his right hand and his three-years-younger brother Khokon tucked under his left arm, climbing up to their house on the hill was part of Bagala’s play. His well-built physique and strength drew admiring glances from people around. The story begins from here.
That day was a Sunday. At Rajendralal’s house there was a flurry of preparation—someone arranging the table, someone polishing chairs. Everything had to look spotless. New porcelain plates, knives, forks, and spoons were being laid out in neat rows. In the rush, the occasional clinking of utensils could be heard.
Around 11 in the morning, news arrived: the District Magistrate Sahib had reached. Suddenly, the entire house fell silent. Dressed in coat, pants, tie, and boots, the fair-skinned Englishman Charles Geoffrey Buckland Stevens walked in briskly with his gown-clad wife and went upstairs. Rajendralal stepped forward and greeted them warmly,
“Good morning, Mr. Stevens. Hello, Madam, good morning.”
The guests were seated. In front of them was a large table, carefully decorated with freshly picked clusters of flowers from the garden.
Rajendralal called out to his elder son,
“Khoka, come here.”
The young Bagala Prasanna entered the room, head held high, back straight. Something about him struck the Sahib as unusual. He thought to himself, “Indian kids are rarely this confident!”
Bagala stepped forward and shook hands with him. Fifteen-year-old Bagala and forty-three-year-old Stevens. The military-trained Sahib’s iron grip met Bagala’s hand. Bagala realized the Sahib was tightening his grip, and he began to increase his own strength in response. As Stevens tightened, Bagala matched him. In this brief contest of strength between a 43-year-old man and a 15-year-old boy, the Sahib quickly recognized the boy’s potential.
Impressed, Stevens’ military instinct was awakened. After Bagala left the room, he spoke:
“Mr. Banerjee, let me tell you something. I think your son Bagala will do well if he goes through military training. What do you think? I shall be glad to check out the possibilities.”
Rajendralal replied,
“Certainly, Sir. Whatever you think is good, I shall be very glad.”
After this, Stevens wrote to a friend of his in England explaining the entire matter. That friend was Churchill, who at the time was the Secretary of State for War. Yes, Sir Winston Churchill, who later became the British Prime Minister. He recommended Bagala Prasanna for admission to Sandhurst—the Royal Military Academy.
As a side note, it is worth mentioning that the commanding generals of both sides in the 1965 India–Pakistan war—General J. N. Chaudhuri and General Ayub Khan—were both trained at Sandhurst during the 1920s.
An admission letter for Bagala Prasanna was issued from Sandhurst. But by the time the letter reached Mainamati in Comilla, Bagala had fallen ill. Soon after, he succumbed to typhoid and passed away.
His journey to Sandhurst and the possibility of proving himself never came to fruition.
The shock of this loss was immense. Many believe that this single event deeply shook the entire family—both in its present and its future.
Hindi Translation
सुनी-सुनाई कहानियाँ
कल रात मैंने अपने बारे में एक नई बात खोजी—कि मैं बहुत-सी बातें केवल सुनकर जानता हूँ, पर यह बात मुझे खुद ही पता नहीं थी। कल मेरा बेटा और उसकी पत्नी मुझे लगभग पकड़कर सॉल्ट लेक में मेरे बड़े भाई और भाभी के घर ले गए थे, और वहीं यह आश्चर्यजनक अनुभूति सामने आई।
क्यों और कैसे—यह बताने लगूँ तो कहानी का सारा मज़ा चला जाएगा। लेकिन एक विचार ज़रूर आया—“सुनी-सुनाई कहानियाँ” नाम से एक श्रृंखला शुरू करनी चाहिए।
इस श्रृंखला की पहली कहानी:
“बगला प्रसन्न, सैंडहर्स्ट और चर्चिल”
[संजय बंद्योपाध्याय, 22 मार्च 2026]
बगला प्रसन्न, सैंडहर्स्ट और चर्चिल
वह वर्ष 1923 था। बगला प्रसन्न की उम्र तब लगभग पंद्रह वर्ष रही होगी। दाहिने हाथ में भारी रोलर और बाईं बाँह में अपने तीन साल छोटे भाई खोकोन को दबाए हुए, टीले पर बने घर तक चढ़ जाना बगला के लिए खेल जैसा था। उसका सुदृढ़ शरीर और ताकत देखकर आसपास के लोग प्रशंसा भरी नज़रों से देखते थे। कहानी की शुरुआत यहीं से होती है।
उस दिन रविवार था। राजेंद्रलाल के घर में खूब तैयारी चल रही थी—कोई मेज़ सजा रहा था, तो कोई कुर्सियाँ साफ कर रहा था। सब कुछ चमकदार दिखना चाहिए। नई चीनी मिट्टी की प्लेटें, छुरी, कांटे और चम्मच करीने से सजाए जा रहे थे। भाग-दौड़ के बीच बर्तनों की खनखनाहट भी सुनाई दे रही थी।
करीब सुबह 11 बजे खबर आई कि डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट साहब पहुँच चुके हैं। अचानक पूरे घर में सन्नाटा छा गया। कोट-पैंट, टाई और बूट पहने गोरे साहब चार्ल्स जियोफ्रे बकलैंड स्टीवन्स अपनी गाउन पहने पत्नी के साथ तेज़ी से चलते हुए ऊपर आए। राजेंद्रलाल आगे बढ़े और उनका स्वागत किया—
“गुड मॉर्निंग, मिस्टर स्टीवन्स। हैलो मैडम, गुड मॉर्निंग।”
मेहमानों को बैठाया गया। सामने बड़ी मेज़ थी, जिस पर बगीचे से अभी-अभी तोड़े गए फूलों के गुच्छे सलीके से सजाए गए थे।
राजेंद्रलाल ने अपने बड़े बेटे को बुलाया—
“खोका, इधर आओ।”
बालक बगला प्रसन्न सिर ऊँचा और पीठ सीधी करके कमरे में आया। यह बात साहब को कुछ अलग लगी। उन्होंने सोचा—“भारतीय बच्चे इतने आत्मविश्वासी कम ही होते हैं!”
बगला आगे बढ़ा और साहब से हाथ मिलाया। पंद्रह साल का बगला और तैंतालीस साल के स्टीवन्स। सैन्य-प्रशिक्षित साहब की मजबूत पकड़ बगला के हाथ पर पड़ी। बगला समझ गया कि साहब अपनी पकड़ कस रहे हैं, तो उसने भी अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की। जैसे-जैसे स्टीवन्स अपनी शक्ति बढ़ाते गए, बगला भी वैसा ही करता गया। इस छोटे-से शक्ति-परीक्षण में साहब ने समझ लिया कि इस लड़के में असाधारण क्षमता है।
स्टीवन्स प्रभावित हो चुके थे, उनका सैन्य अनुभव काम करने लगा। बगला के कमरे से बाहर जाते ही उन्होंने कहा—
“मिस्टर बनर्जी, मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि आपका बेटा बगला सैन्य प्रशिक्षण के लिए बहुत उपयुक्त रहेगा। आप क्या सोचते हैं? मैं इस दिशा में संभावनाएँ देखने के लिए तैयार हूँ।”
राजेंद्रलाल ने उत्तर दिया—
“निश्चित रूप से, सर। आप जो उचित समझें, मुझे बहुत खुशी होगी।”
इसके बाद स्टीवन्स ने इंग्लैंड में अपने एक मित्र को पत्र लिखकर पूरी बात बताई। वह मित्र उस समय युद्ध विभाग के सचिव थे—चर्चिल। जी हाँ, वही सर विंस्टन चर्चिल, जो बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने बगला प्रसन्न के लिए सैंडहर्स्ट—रॉयल मिलिट्री अकादमी—में प्रवेश की सिफारिश की।
यह उल्लेखनीय है कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दोनों पक्षों के सेना प्रमुख—जनरल जे. एन. चौधुरी और जनरल अयूब खान—दोनों ने 1920 के दशक में सैंडहर्स्ट में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
सैंडहर्स्ट से बगला प्रसन्न के नाम प्रवेश-पत्र भेजा गया। लेकिन जब वह पत्र कुमिल्ला के मयनामती पहुँचा, तब तक बगला बीमार पड़ चुका था। कुछ ही समय बाद वह टाइफॉयड से ग्रस्त होकर चल बसे।
सैंडहर्स्ट जाकर स्वयं को सिद्ध करने का उसका सपना अधूरा रह गया।
इस घटना का आघात बहुत गहरा था। बहुतों का मानना है कि इस एक घटना ने पूरे परिवार के वर्तमान और भविष्य को गहराई से झकझोर दिया।