দাদুর ডাইকোটমি

English Translation. Hindi Translation

আমাদের ছোট্ট দাদু বড় হতে হতে 145 বছরের হয়ে গেল|পুরনো সামাজিকতায় বেঁধে লিখলে আপনি সম্বোধনেই লেখার কথা| কিন্তু, আমি তো সৃষ্ঠিছাড়া| কোনোদিনই দাদুকে আপনি বলে ডাকিনি, তাই আজও ডাকব না| আপনি আজ্ঞে এসব আমার পাপা, জ্যাঠা, পিসিরা ব্যবহার করত, আমরা নাতি নাতনি, প্রোনাতি, প্রোনাতনিরা ওসব পরনো পোষাকি রং-ঢং এ বিশ্বাসী ছিলাম না| আমরা সব্বাই দাদুকে খুব ভালবাসতাম আর মনের আনন্দে তুমি বলতাম, দাদুও আমাদের কোনদিন আপত্তি জানায়নি| দাদু যদি ওই গম্ভীর গলায় “না” বলে উঠত তাহলে কার কি জো ছিল যে অন্য কিছু হয়| লোকে বলে ওঁর দাপটে নাকি বাঘে গরুতে একই ঘাটে জল খেত|

দাদুর যে চেহারাটা আমাদের কিছু মানুষের মনে এখনও গেঁথে আছে তাতে লম্বা সাদা দাড়ি, গেরুয়া ধুতি-চাদর, একটা বেতের লাঠি, একটা চরখা, একটা কাঠের ডেস্ক, দাগ টানা খাতা, দোয়াত-কলম, একটা চিনে মাটির কাঁধ-উঁচু বড় খাবারের প্লেইট, একটা বড় খাবার চামচ, কাটা, একটা ইজি চেয়ার, খিচুড়ি-তেতো-তরকারি-দই সব একসাথে মিলিয়ে মাধুকরী, সব মিলিয়ে বহু কনট্রাস্ট, বহু রং – একটার সাথে অন্যটা মেলানো খুব মুশকিল|

আমি যখন দশ বছর ছাড়িয়ে এগারোতে এলাম তখন থেকেকে আর দাদুকে দেখতে পাইনা, বাইরের দিকে না তাকিয়ে ভেতরে তাকিয়ে দেখতে হয়| আমি তো দাদুকে ঝক-ঝকে দেখতে পাই| আমার চোখে ফরসা, টাক মাথা, লম্বা সাদা দাড়ি, ধুতি-ফতুয়া-চাদর এটা দাদুকে দেখা চেহারা, অন্য-রকম একটা দাদু আছে সেটা শোনা আর মনের সাজে সাজিয়ে নেওয়া|

দাদু তখন আমাদের সাথে বেহালায় আমাদের ভাড়াবাড়ীতে| দাদুর একটা আলাদা ছোট ঘর ছিল, আমার বাকিরা অন্য একটা বড় ঘরে থাকতাম| একদিন দাদু বলল, “চলো সোনাভাই, আমি আমার এক পুরনো ছাত্রের দেখা পেয়েছি| চলো, তোমাকে একদিন আমার ছাত্রর কাছে নিয়ে যাব|” আমি তো খুব এক্সসাইটেড হয়ে পড়লাম|শেষে একদিন বিকেলবেলা দাদুর হাত ধরে বেরিয়ে পড়লাম| আমরা তখন 36বি বেচারাম চ্যাটার্জী রোডের ভাড়াবাড়িতে  থাকি, যেটা পরে নম্বর বদলে 28 নম্বর হয়ে গিয়েছিল|

সে যা হোক, আমরা বাড়ি থেকে বেরিয়ে সরশুনার দিকে হাঁটতে থাকলাম| অবশেষে দাদুর সেই ছাত্রের ডেরা আসল| দেখলাম সেটা একটা বুড়োদের আসর| ওদের মধ্যে দাদুকে এক বড় দাড়ি ওয়ালা বুড়ো, পরে বুঝেছিলাম ও দাদুর স্টাইল এ দাড়ি বাড়ানোর চেষ্টা করছিল, উঠে আসলো| আরে, আসুন আসুন| তারপরে সশ্রদ্ধায় প্রণাম| দাদু অল্পসময় বসলেন আর তারপর বাড়ির দিকে হাঁটতে শুরু করলেন| আসতে আসতে দাদু বলল, তার এই ছাত্রটি ওঁর কলেজে পড়ত| আপনারা  তো জানেন, দাদু ময়নামতী সার্ভে কলেজ এর প্রিন্সিপাল ছিলেন| উনি প্রিন্সিপাল ছিলেন এটা একটা প্রচলিত খবর, অনেকেই জানেন, কিন্তু আমি কখনও ওর বিপক্ষের লন্ডন থেকে আসা ইনকোয়ারি অফিসারের দাদুকে সোজা প্রশ্ন “Are you a wrangler?” নিয়ে আসর জমানোর ইচ্ছে রইল.

টিপ্পনী: At the University of Cambridge in England, a “Wrangler” is a student who gains first-class honours in the Mathematical Tripos competition. 

Click to know more: https://en.wikipedia.org/wiki/Wrangler_(University_of_Cambridge)            

Yesterday was dadu’s 146th Birthday. [b. Ramanavami 1880, d. 14 June 1985]. I designed. a Birthday card for him. Here it is:

আমি এই ভিডিওটা অনেককে.পাঠিছিলাম. ছোড়দির কাছ থেকে প্রায় সাথে সাথেই উত্তর পেলাম । ও লিখলো : “অসাধারণ অপূর্ব অদ্ভূত সুন্দর– করলি কি করে???!!!!”

আমি দুষ্টুমি করে উত্তর দিলাম…

এটা খুউবই সোজা। এটা তুইও ছোটবেলায় করেছিস, একে আমরা বলতাম প্ল্যানচেট|

দাদুকে ডাকলাম, বললাম সাহেবী পোশাকে নেকটাই পড়ে চলে এসো| তারপর “হ্যাপি বার্থডে টু ইউ”, কিছু বেলুন উড়িয়ে ভিডিও করতে শুরু করে দিলাম| জানিস তো দাদু কিছুতেই বেশিক্ষণ থাকল না — চলে গেল| ভাগ্যিস একটু ভিডিও করে রেখেছিলাম, দ্যাখ, তুইও দেখতে পেলি|  

বিশ্বাস করলি না তো? জানি করবি না| কথায় বলে, “বিশ্বাসে মিলায় দাদু, তর্কে বহুদূর|”   

কলকাতা | 28/03/2026

English Translation

Dadu’s Dichotomy

Our little “Dadu” (grandfather), as time passed, turned 145 years old. According to old social customs, one is supposed to address elders formally while writing. But I’ve always been a bit unconventional. I never addressed Dadu formally, and I won’t start today either. That kind of formal “you” was used by my father, uncles, and aunts. We—his grandchildren and great-grandchildren—never really believed in those old-fashioned formalities.

We all loved Dadu dearly and happily addressed him informally as “you.” And Dadu never objected. If he had ever said “no” in that deep, serious voice of his, no one would have dared to go against it! People used to say that such was his authority that even a tiger and a cow could drink water from the same ghat under his influence.

The image of Dadu that is still etched in some of our minds includes a long white beard, saffron dhoti and shawl, a cane stick, a spinning wheel, a wooden desk, lined notebooks, ink and pen, a large high-edged porcelain plate, a big serving spoon, a fork, an easy chair, and meals of khichuri, bitter vegetables, curry, and curd all mixed together like “madhukari.” Altogether, he was a striking blend of contrasts and colors—hard to reconcile into a single picture.

When I crossed ten and turned eleven, I could no longer see Dadu outwardly; I had to look inward to find him. But in my mind’s eye, I see him clearly—fair-skinned, bald-headed, with a long white beard, dressed in dhoti, vest, and shawl. That is the Dadu I have seen. The other version of him is something I’ve only heard about and imagined in my own way.

Back then, Dadu lived with us in our rented house in Behala. He had a small separate room, while the rest of us stayed in a bigger one. One day, Dadu said, “Come, Sonabhai, I’ve found one of my old students. Let me take you to meet him.” I was very excited. Finally, one afternoon, holding Dadu’s hand, I set out with him. We were then living at 36B Becharam Chatterjee Road, which was later renumbered as 28.

Anyway, we walked from our house towards Sarsuna. At last, we reached the place where that student lived. It turned out to be a gathering of elderly men. Among them, one old man with a large beard—later I realized he was trying to imitate Dadu’s style—came forward warmly to receive him. “Ah, please come, please come!” he said, and then bowed respectfully.

Dadu sat for a short while, and then we started walking back home. On the way, Dadu told me that this man had been his student in college. As you know, Dadu was the principal of Moynamoti Survey College. Many people are aware of this fact. But I’ve always been curious to recreate that moment when an inquiry officer from London asked him directly, “Are you a wrangler?”

Note: At the University of Cambridge in England, a “Wrangler” is a student who earns first-class honours in the Mathematical Tripos.

Yesterday was Dadu’s 146th birthday.
(Born on Ramanavami, 1880 – Died on 14 June 1985.)
I designed a birthday card. Here it is.

Hindi Translation

हमारे छोटे से दादू उम्र बढ़ते-बढ़ते 145 साल के हो गए। पुरानी सामाजिक परंपराओं के अनुसार लिखते समय उन्हें औपचारिक “आप” कहकर संबोधित करना चाहिए। लेकिन मैं तो हमेशा से थोड़ा अलग रहा हूँ। मैंने कभी भी दादू को “आप” नहीं कहा, इसलिए आज भी नहीं कहूँगा। “आप-आज्ञा” जैसी बातें मेरे पापा, चाचा और बुआ लोग इस्तेमाल करते थे; हम—नाती, नातिन, परनाती, परनातिन—इन पुराने औपचारिक ढंगों में विश्वास नहीं रखते थे।

हम सब दादू को बहुत प्यार करते थे और दिल से उन्हें “तुम” कहकर बुलाते थे। दादू ने भी कभी कोई आपत्ति नहीं की। अगर वे अपनी उस गंभीर आवाज़ में “ना” कह देते, तो किसी की क्या मजाल थी कि कोई और कुछ करता! लोग कहते हैं कि उनके रौब में तो बाघ और गाय भी एक ही घाट पर पानी पीते थे।

दादू की जो छवि आज भी हममें से कुछ लोगों के मन में बसी है, उसमें एक लंबी सफेद दाढ़ी, गेरुआ धोती-चादर, एक बेंत की लाठी, एक चरखा, एक लकड़ी की मेज़, लाइन वाली कॉपियाँ, दवात-कलम, एक ऊँची किनारी वाली बड़ी चीनी मिट्टी की थाली, एक बड़ा चम्मच, कांटा, एक ईज़ी चेयर, और खिचड़ी, कड़वी सब्ज़ी, तरकारी, दही सबको मिलाकर बना “माधुकरी”—सब कुछ शामिल है। कुल मिलाकर कई तरह के विरोधाभास, कई रंग—जिन्हें एक साथ मिलाना आसान नहीं।

जब मैं दस साल पार करके ग्यारह का हुआ, तब से मैं दादू को बाहर से देख नहीं पाता; उन्हें देखने के लिए भीतर झाँकना पड़ता है। लेकिन मेरी आँखों में दादू साफ-साफ दिखाई देते हैं—गोरा रंग, गंजा सिर, लंबी सफेद दाढ़ी, धोती-फतुआ-चादर पहने हुए। यही वह रूप है जिसमें मैंने दादू को देखा है। दादू का एक और रूप है, जिसके बारे में केवल सुना है और मन में कल्पना करके सजाया है।

उस समय दादू हमारे साथ बेहाला में हमारे किराए के घर में रहते थे। उनका एक छोटा अलग कमरा था, और हम बाकी लोग एक बड़े कमरे में रहते थे। एक दिन दादू ने कहा, “चलो सोनाभाई, मुझे मेरा एक पुराना छात्र मिला है। चलो, तुम्हें एक दिन उससे मिलवाता हूँ।” मैं तो बहुत उत्साहित हो गया। आखिर एक दिन शाम को दादू का हाथ पकड़कर निकल पड़ा। तब हम 36B बेचाराम चटर्जी रोड के किराए के घर में रहते थे, जिसका नंबर बाद में बदलकर 28 हो गया।

खैर, हम घर से निकलकर सरशुना की ओर पैदल चलने लगे। आखिरकार दादू के उस छात्र का ठिकाना आ गया। देखा, वह बूढ़े लोगों की एक महफ़िल थी। उनमें से एक बड़ी दाढ़ी वाला बूढ़ा—बाद में समझ आया कि वह दादू की शैली में दाढ़ी बढ़ाने की कोशिश कर रहा था—उठकर आया और बोला, “अरे, आइए, आइए!” फिर उसने श्रद्धा से प्रणाम किया।

दादू थोड़ी देर बैठे, फिर हम घर की ओर लौटने लगे। रास्ते में दादू ने बताया कि यह उनका छात्र उनके कॉलेज में पढ़ता था। आप तो जानते ही हैं, दादू मयनामती सर्वे कॉलेज के प्रिंसिपल थे। यह बात काफ़ी प्रचलित है और बहुत लोग जानते हैं। लेकिन मेरे मन में हमेशा यह इच्छा रही कि उस लंदन से आए इनक्वायरी ऑफिसर और दादू के बीच हुई सीधी बातचीत—“Are you a wrangler?”—को लेकर एक सभा जमाऊँ।

टिप्पणी: इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में “Wrangler” उस छात्र को कहा जाता है जो Mathematical Tripos परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता है।
और जानने के लिए: https://en.wikipedia.org/wiki/Wrangler_(University_of_Cambridge)

यह तो बहुत ही आसान है। यह तुमने भी बचपन में किया है—इसे हम “प्लांचेट” कहते थे।

मैंने दादू को बुलाया और कहा—साहबी कपड़े पहनकर, नेकटाई लगाकर आओ। फिर “हैप्पी बर्थडे टू यू” गाया, कुछ गुब्बारे उड़ाए और वीडियो बनाना शुरू कर दिया। तुम तो जानते ही हो, दादू ज़्यादा देर रुके नहीं—चले गए। अच्छा हुआ कि थोड़ा वीडियो बना लिया था—देखो, तुम भी देख पाए।

यकीन नहीं हुआ न? मुझे पता था, नहीं होगा। कहा भी जाता है—
“विश्वास में दादू मिलते हैं, तर्क में बहुत दूर चले जाते हैं।”

বগলা প্রসন্ন, স্যান্ডহার্স্ট, ও চার্চিল

English translation Hindi Translation

কিছু শোনা গল্প

গত-রাত্রে আবিষ্কার করলাম যে আমি শুনে শুনে অনেক কিছু জানি, কিন্তু এ খবরটা আমার কাছেই ছিলনা। গতকাল ছেলে আর তার বৌ আমাকে বগলদাবা করে দাদা-বৌদির সল্টলেকের বাড়িতে নিয়ে গিয়েছিল, সেখানেই এই অবাক-জ্ঞান প্রকট হ’ল। কেন কি ব্যাপার এসব বলতে গেলে পুরো মজাটাই চটকে যাবে। কিন্তু যে আইডিয়াটা এলো তা হচ্ছে “শোনা গল্প” এই নামে একটা সিরিজ শুরু করতে হবে। সিরিজের প্রথম গল্প “বগলা প্রসন্ন, স্যান্ডহার্স্ট, ও চার্চিল”।

[সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায়, মার্চ 22, 2026]

বগলা প্রসন্ন, স্যান্ডহার্স্ট, ও চার্চিল

সেটা ছিল 1923, বগলা প্রসন্নর বয়স তখন বছর পনেরো হবে। ডানহাতে ভারী রোলার আর বা-কাখে বছর তিনেকের ছোট ভাই খোকনকে নিয়ে টিলার ওপরে বাড়িতে পৌঁছন বগলার খেলার মধ্যেই পড়ত। সুঠাম শরীর আর শক্তি দেখে অ্যাশ-পাশের মানুষ প্রশংসার চোখে তাকিয়ে থাকত। গল্পের সূত্রপাত এখান থেকেই।

সেদিন রবিবার, রাজেন্দ্রলালের বাড়িতে সাজ-সাজ রব, কেউ টেবিল সাজাচ্ছে তো কেউ চেয়ার মুছছে, সব ঝকঝকে দেখাতে হবে। নতুন চিনামাটির প্লেট, ছুড়ি, কাঁটা, চামচ সব থরে থরে সাজানো হচ্ছে, তাড়া-হুড়োতে মাঝে মাঝেই বাসনে-বাসনে ঠকাঠুকির আওয়াজ পাওয়া যাচ্ছে। সকাল 11-টা নাগাদ খবর এলো ডিস্ট্রিক্ট ম্যাজিস্ট্রেট সাহেব পৌঁছে গেছেন। হঠাৎ করেই পুরো বাড়ী শান্ত হয়ে গেল। কোট প্যান্ট টাই বুট পরা টক টকে গোরা সাহেব চার্লস জিওফ্রে বাকল্যান্ড স্টিভেনস  তার গাউন পরা বৌকে নিয়ে গট গট করে হেঁটে ওপরে উঠে এলেন। রাজেন্দ্রলাল তখন এগিয়ে এসে “গুড মর্নিং মিস্টার স্টিভেনস, হ্যালো ম্যাডাম গুড মর্নিং” করে অভ্যর্থনা জানালেন। আসুন আসুন করে অতিথিদের বসান হল, সামনে বড় টেবিল তাতে যত্নে সাজানো বাগান থেকে সদ্য তুলে আনা থোকা থোকা ফুল।

রাজেন্দ্রলাল তাঁর বড়ছেলেকে ডাকলেন, “খোকা, এদিকে আয়।“ বালক বগলা প্রসন্ন মাথা উঁচু পিঠ সোজা করে ঘরে ঢুকল। ব্যাপারটা সাহেবের কিছুটা অন্যরকম লাগল। সাহেব ভাবলেন “Indian kids are rarely this confident!” বগলা প্রসন্ন এগিয়ে এসে সাহেবের সাথে হাত মেলালেন। ১৫ বছরের বগলা আর ৪৩ বছরের স্টিভেনস। মিলিটারি ট্রেইন্ড সাহেবের বজ্রমুষ্টি বগলার হাতে পড়ল। বগলা বুঝল যে সাহেব হাত শক্ত করছে, সেও হাতের শক্তি বাড়াতে শুরু করল। সাহেব শক্তি বাড়াচ্ছে তো বগলাও বাড়াচ্ছে। ৪৩বছরের স্টিভেনস আর  ১৫র বগলার এই ছোট্ট শক্তি যুদ্ধে সাহেব বুঝলেন যে এই বাচ্চার প্রতিভা আছে। স্টিভেনস ততক্ষণে ইমপ্রেসড হয়ে গ্যাছেন, ওঁর মিলিটারি ইনস্টিংট কাজ করতে শুরু করেছে। বগলা ঘর থেকে চলে যাবার পর সাহেব মুখ খুললেন। বললেন, “Mr. Banerjee, let me tell you something. I think, your son Bagala will do good if he goes through military training. What do you think?  I shall be glad to check out the possibilities.” রাজেন্দ্রলাল বললেন, “Certainly, Sir, whatever you think good. I shall be very glad.”  

এর পর স্টিভেনস সাহেব ইংল্যান্ডে ওর এক বন্ধুকে চিঠি লিখে পুরো ব্যাপারটা জানান। বন্ধু চার্চিল তখন সেক্রেটারি অফ স্টেট অফ ওয়ার। চার্চিল, হ্যাঁ, ঠিক ধরেছেন স্যার উইনস্টন চার্চিল যিনি পরে ব্রিটিশ প্রিমিয়ারে হয়েছিলেন। উনি স্যান্ডহার্স্টে, মানে রয়েল মিলিটারি একাডেমি স্যান্ডহার্স্টএ বগলা প্রসন্নের ভর্তির জন্য সুপারিশ করেন। প্রসঙ্গত বলে রাখি ভারত-পাকিস্তানের 1965-র যুদ্ধের দুই-পক্ষের সেনা-প্রমুখ জেনারেল জে এন চৌধুরী ও জেনারেল আয়ুব খান দুজনেই 1920’র দশকে একই সাথে  স্যান্ডহার্স্টে প্রশিক্ষিত হন।

স্যান্ডহার্স্ট থেকে বগলা প্রসন্নের ভর্তির চিঠি ছাড়া হয়, সে চিঠি যখন কুমিল্লার ময়নামতী পৌঁছয় তখন বগলা অসুস্থ, আর তার কিছুদিন পর উনি টাইফয়েড রোগে আক্রান্ত হয়ে মারা যান। ওর স্যান্ডহার্স্টে ভর্তি হয়ে নিজেকে প্রমাণিত করা আর হয়ে উঠলোনা। এই ধাক্কাটা খুব ভারী পড়ল। অনেকেই মনে করেন, এই ঘটনা সম্পূর্ণ পরিবারের বর্তমান ও ভবিষ্যৎকে সবলে নাড়িয়ে দিয়েছিল।      

English Translation

Stories Heard in Passing

Last night I discovered something about myself—that I know many things simply by listening, yet I was unaware of this fact myself. Yesterday, my son and his wife practically dragged me off to my elder brother and sister-in-law’s house in Salt Lake, and it was there that this surprising realization surfaced.

If I begin to explain why and how, the charm of the story will be lost. But the idea that emerged is this: I must start a series titled “Stories Heard in Passing.”

The first story in this series: “Bagala Prasanna, Sandhurst, and Churchill.”

[Sanjay Bandopadhyay, March 22, 2026]

Bagala Prasanna, Sandhurst, and Churchill

It was the year 1923. Bagala Prasanna was about fifteen years old. Carrying a heavy roller in his right hand and his three-years-younger brother Khokon tucked under his left arm, climbing up to their house on the hill was part of Bagala’s play. His well-built physique and strength drew admiring glances from people around. The story begins from here.

That day was a Sunday. At Rajendralal’s house there was a flurry of preparation—someone arranging the table, someone polishing chairs. Everything had to look spotless. New porcelain plates, knives, forks, and spoons were being laid out in neat rows. In the rush, the occasional clinking of utensils could be heard.

Around 11 in the morning, news arrived: the District Magistrate Sahib had reached. Suddenly, the entire house fell silent. Dressed in coat, pants, tie, and boots, the fair-skinned Englishman Charles Geoffrey Buckland Stevens walked in briskly with his gown-clad wife and went upstairs. Rajendralal stepped forward and greeted them warmly,
“Good morning, Mr. Stevens. Hello, Madam, good morning.”

The guests were seated. In front of them was a large table, carefully decorated with freshly picked clusters of flowers from the garden.

Rajendralal called out to his elder son,
“Khoka, come here.”

The young Bagala Prasanna entered the room, head held high, back straight. Something about him struck the Sahib as unusual. He thought to himself, “Indian kids are rarely this confident!”

Bagala stepped forward and shook hands with him. Fifteen-year-old Bagala and forty-three-year-old Stevens. The military-trained Sahib’s iron grip met Bagala’s hand. Bagala realized the Sahib was tightening his grip, and he began to increase his own strength in response. As Stevens tightened, Bagala matched him. In this brief contest of strength between a 43-year-old man and a 15-year-old boy, the Sahib quickly recognized the boy’s potential.

Impressed, Stevens’ military instinct was awakened. After Bagala left the room, he spoke:
“Mr. Banerjee, let me tell you something. I think your son Bagala will do well if he goes through military training. What do you think? I shall be glad to check out the possibilities.”

Rajendralal replied,
“Certainly, Sir. Whatever you think is good, I shall be very glad.”

After this, Stevens wrote to a friend of his in England explaining the entire matter. That friend was Churchill, who at the time was the Secretary of State for War. Yes, Sir Winston Churchill, who later became the British Prime Minister. He recommended Bagala Prasanna for admission to Sandhurst—the Royal Military Academy.

As a side note, it is worth mentioning that the commanding generals of both sides in the 1965 India–Pakistan war—General J. N. Chaudhuri and General Ayub Khan—were both trained at Sandhurst during the 1920s.

An admission letter for Bagala Prasanna was issued from Sandhurst. But by the time the letter reached Mainamati in Comilla, Bagala had fallen ill. Soon after, he succumbed to typhoid and passed away.

His journey to Sandhurst and the possibility of proving himself never came to fruition.

The shock of this loss was immense. Many believe that this single event deeply shook the entire family—both in its present and its future.          

Hindi Translation

सुनी-सुनाई कहानियाँ

कल रात मैंने अपने बारे में एक नई बात खोजी—कि मैं बहुत-सी बातें केवल सुनकर जानता हूँ, पर यह बात मुझे खुद ही पता नहीं थी। कल मेरा बेटा और उसकी पत्नी मुझे लगभग पकड़कर सॉल्ट लेक में मेरे बड़े भाई और भाभी के घर ले गए थे, और वहीं यह आश्चर्यजनक अनुभूति सामने आई।

क्यों और कैसे—यह बताने लगूँ तो कहानी का सारा मज़ा चला जाएगा। लेकिन एक विचार ज़रूर आया—“सुनी-सुनाई कहानियाँ” नाम से एक श्रृंखला शुरू करनी चाहिए।

इस श्रृंखला की पहली कहानी:
बगला प्रसन्न, सैंडहर्स्ट और चर्चिल”

[संजय बंद्योपाध्याय, 22 मार्च 2026]

बगला प्रसन्न, सैंडहर्स्ट और चर्चिल

वह वर्ष 1923 था। बगला प्रसन्न की उम्र तब लगभग पंद्रह वर्ष रही होगी। दाहिने हाथ में भारी रोलर और बाईं बाँह में अपने तीन साल छोटे भाई खोकोन को दबाए हुए, टीले पर बने घर तक चढ़ जाना बगला के लिए खेल जैसा था। उसका सुदृढ़ शरीर और ताकत देखकर आसपास के लोग प्रशंसा भरी नज़रों से देखते थे। कहानी की शुरुआत यहीं से होती है।

उस दिन रविवार था। राजेंद्रलाल के घर में खूब तैयारी चल रही थी—कोई मेज़ सजा रहा था, तो कोई कुर्सियाँ साफ कर रहा था। सब कुछ चमकदार दिखना चाहिए। नई चीनी मिट्टी की प्लेटें, छुरी, कांटे और चम्मच करीने से सजाए जा रहे थे। भाग-दौड़ के बीच बर्तनों की खनखनाहट भी सुनाई दे रही थी।

करीब सुबह 11 बजे खबर आई कि डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट साहब पहुँच चुके हैं। अचानक पूरे घर में सन्नाटा छा गया। कोट-पैंट, टाई और बूट पहने गोरे साहब चार्ल्स जियोफ्रे बकलैंड स्टीवन्स अपनी गाउन पहने पत्नी के साथ तेज़ी से चलते हुए ऊपर आए। राजेंद्रलाल आगे बढ़े और उनका स्वागत किया—
“गुड मॉर्निंग, मिस्टर स्टीवन्स। हैलो मैडम, गुड मॉर्निंग।”

मेहमानों को बैठाया गया। सामने बड़ी मेज़ थी, जिस पर बगीचे से अभी-अभी तोड़े गए फूलों के गुच्छे सलीके से सजाए गए थे।

राजेंद्रलाल ने अपने बड़े बेटे को बुलाया—
“खोका, इधर आओ।”

बालक बगला प्रसन्न सिर ऊँचा और पीठ सीधी करके कमरे में आया। यह बात साहब को कुछ अलग लगी। उन्होंने सोचा—भारतीय बच्चे इतने आत्मविश्वासी कम ही होते हैं!”

बगला आगे बढ़ा और साहब से हाथ मिलाया। पंद्रह साल का बगला और तैंतालीस साल के स्टीवन्स। सैन्य-प्रशिक्षित साहब की मजबूत पकड़ बगला के हाथ पर पड़ी। बगला समझ गया कि साहब अपनी पकड़ कस रहे हैं, तो उसने भी अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की। जैसे-जैसे स्टीवन्स अपनी शक्ति बढ़ाते गए, बगला भी वैसा ही करता गया। इस छोटे-से शक्ति-परीक्षण में साहब ने समझ लिया कि इस लड़के में असाधारण क्षमता है।

स्टीवन्स प्रभावित हो चुके थे, उनका सैन्य अनुभव काम करने लगा। बगला के कमरे से बाहर जाते ही उन्होंने कहा—
“मिस्टर बनर्जी, मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि आपका बेटा बगला सैन्य प्रशिक्षण के लिए बहुत उपयुक्त रहेगा। आप क्या सोचते हैं? मैं इस दिशा में संभावनाएँ देखने के लिए तैयार हूँ।”

राजेंद्रलाल ने उत्तर दिया—
“निश्चित रूप से, सर। आप जो उचित समझें, मुझे बहुत खुशी होगी।”

इसके बाद स्टीवन्स ने इंग्लैंड में अपने एक मित्र को पत्र लिखकर पूरी बात बताई। वह मित्र उस समय युद्ध विभाग के सचिव थे—चर्चिल। जी हाँ, वही सर विंस्टन चर्चिल, जो बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने बगला प्रसन्न के लिए सैंडहर्स्ट—रॉयल मिलिट्री अकादमी—में प्रवेश की सिफारिश की।

यह उल्लेखनीय है कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दोनों पक्षों के सेना प्रमुख—जनरल जे. एन. चौधुरी और जनरल अयूब खान—दोनों ने 1920 के दशक में सैंडहर्स्ट में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

सैंडहर्स्ट से बगला प्रसन्न के नाम प्रवेश-पत्र भेजा गया। लेकिन जब वह पत्र कुमिल्ला के मयनामती पहुँचा, तब तक बगला बीमार पड़ चुका था। कुछ ही समय बाद वह टाइफॉयड से ग्रस्त होकर चल बसे।

सैंडहर्स्ट जाकर स्वयं को सिद्ध करने का उसका सपना अधूरा रह गया।

इस घटना का आघात बहुत गहरा था। बहुतों का मानना है कि इस एक घटना ने पूरे परिवार के वर्तमान और भविष्य को गहराई से झकझोर दिया।

খরগোশ আর দন-দনা-দন

“আমরা খরগোশ দলে দলে

বাস করি ওই গাছের তলে

করাইশুটি আর কপি ক্ষেতে

লুটোপুটি যাই সবাই মিলে।“  

ছড়াটা শুনেছেন? শুনলে ভালো, না শুনলে আরও ভালো; ওই ছড়াটাই এক বিকেলে আমার জীবনে অনেক দুঃখ এনে দিয়েছিল। গল্পটা বলি শুনুন।

তখন আমি বেড়ে-টেড়ে সাত বছরের ধেরে হয়ে গেছি। হীরেন রায় আমাকে একটা ছোট্ট সেতার বানিয়ে দিলেন। আমার তো খুশি আর ধরে না। পাপা, সা রে গা মা, সারেগা, রেগামা এসব শেখাতে শুরু করলেন। শুরু শুরু তে তো বেশ লাগল, নতুন চকচকে সেতার, সেটা আবার আমি বাজাচ্ছি! এতদিন পাপাকেই বাজাতে দেখেছি, কিন্তু এখন আমার হাতেও সেতার। সমস্যা দু-এক দিন পরের থেকে শুরু হল, আঙ্গুলে এত ব্যথা লাগে, এ তো বড় মুশকিল। অতএব বাজানো কমে গেল। পাপা দেখলেন ছেলে তো বাজাচ্ছেনা। তখন উনি একটা উপায় কষলেন। উনি ভাবলেন, ছেলেকে যদি কোনও মজার গান বাজানো শেখানো যায় তাহলে ইন্টারেস্ট বাড়বে। বিপত্তির শুরু এখানেই। খরগোশ ভালো, খরগোশের ছড়া ভাল, খরগোশের গান ভালো, খরগোশের গান সেতারে ভালো, কিন্তু তাতে যদি ছাল-চামড়া উঠে যায় তাহলে খুব মুশকিল।

সেতার পেয়ে পাড়ার বন্ধুদের মাঝে একটু ফাঁট দেখানোর সুযোগ পেয়ে গেলাম। সুযোগ পেলে কে না ছাড়ে, বলুন? বন্ধুদের বললাম, আমি তো সেতার বাজাই, ওরা তো খুব আগ্রহী হয়ে পড়ল, “তাহলে, শোনা একদিন”। আমি তো বিপদেই পড়ে গেলাম। শোনাবো কি, ওই শুধু সারেগামা? বন্ধুদের বললাম, “শোনাব, শোনাব।“ এর কিছুদিন পরই ওই “খরগোশ”। আমার যা বাজানোর এলেম তাতে ওই খরগোশেই আমি মোটামুটি কুপোকাত। যাই হোক, কিছুদিন পর খরগোশ-করাইশুটি নিয়ে আমার অল্প-স্বল্প লুটোপুটি শুরু হল। মা’কে চুপি-চুপি বললাম বন্ধুরা বাজনা শুনতে চাইছে। সময় কেটে যাচ্ছে কিন্তু বাজনা শোনান আর হচ্ছেনা। আমি জানি ফট করে বন্ধুদের  বাজনা শোনাতে ডাকলে পাপা রেগে বোম হয়ে যেতে পারেন। আর পাপা রেগে গেলে কপালে কি আছে বলা মুশকিল।

একদিন সাহস করে বন্ধুদের ডেকেই ফেললাম, বললাম অমুকদিন চলে আয়। মা’কেও বললাম বন্ধুদের ডেকেছি। সেদিন ঘরের মেঝেতে তোশক তার ওপর পরিষ্কার সাদা চাদর বিছানো হল, মা আমাকে সাদা পাজামা – সাদা পাঞ্জাবী পরিয়ে তৈরি করে দিলেন। আমি তো রেডি, শুধু ঘড়ি দেখছি বন্ধুরা কখন আসবে।  

বন্ধুরা আসার পর সেতার নিয়ে বসে পড়লাম, সে যে কি ফিলিং; মনটা কখনও ফড়িং হয়ে নাচানাচি করছে কখনও বা উচ্চিংরে। তার পর শুরু হল “আমার খরগোশ”। খরগোশ তো গাছের তলায় বাস করে     আর  কপি ক্ষেতে লুটোপুটি খেয়ে টায়ার্ড হয়ে  গেল, তার পর? বন্ধুরা  বলল, “বেশ বেশ; আরও বাজা  আরও শুনব।” আমার তো স্টক শেষ, এখন কি করি? তারপর “সারেগামা”।  এই সারেগামা বাঁচিয়ে দিল, সবাই  বোর হয়ে চলে গেল, আমি স্বস্তির নিঃশ্বাস ফেললাম। তখনও জানিনা যে সুনামি আমার জন্যে অপেক্ষা করছে।

বসার ঘরের পর্দাগুলো ফেলা ছিল তাই অন্য ঘরে কি হচ্ছে তার কোনও আইডিয়া ছিলনা। পর্দা সরিয়ে পাশের ঘরে পা দিয়েই দেখি যমরাজ, মনে পাপা। উনি অফিস থেকে তাড়াতাড়ি চলে এসেছেন, আর আমার হাইলি আর্টিস্টিক কাণ্ড-কারখানার আন্দাজ পেয়ে কোনরকম ডিসটার্ব না করে সোজা অন্য ঘরে ঢুকে গেছেন আর বোঝার চেষ্টা করছেন অন্য ঘরে কি হচ্ছে। আমি ঘরে ঢোকার পরই জিজ্ঞেস করলেন, “এত সাজ-গোজা, কি ব্যাপার?” বললাম বন্ধুর এসছিল, সেতার বাজালাম। তার পরই শুরু দন-দনা-দন, “তিনদিন সেতার শিখে আর্টিস্ট হয়ে গ্যাছো?” আবার দন-দনা-দন, “বাজনা শুরুই হলোনা আর বন্ধু ডেকে বাজনা শোনান হচ্ছে?” দন-দনা-দন। একটা বাক্য তারপরই দন-দনা-দন, দ্বিতীয় বাক্য আবার দন-দনা-দন, এরকম কিছুক্ষণ চলল। তারপর বোধহয় হাতে  ব্যথা পেয়ে গেলেন আর সুনামি থামল।

চুপিচুপি একটা কথা আপনাদের বলে দিই কাউকে প্লিজ বলবেন না; মার খেতে খেতে আমি কিছু ডিফেন্স টেকনিক আবিষ্কার করেছিলাম, তাতে আমার ব্যথা কম লাগতো আর যে মারছে সে কখনও কখনও ব্যথা পেয়ে যেত।

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ১৬ জুলাই ২০২৫        

खरगोश और दन-दना-दन

“हम खरगोश, टोली बना
बैठें उस पेड़ की छाया तले।
मटर-गोभी के खेतों में
लोटपोट हो खेलें मिलजुल के।”

ये कविता सुनी है? अच्छा किया! और न सुनी हो, तो और भी अच्छा – क्योंकि यही कविता एक दिन मेरे जीवन में भारी दुख लेकर आई थी।
अब सुनिए पूरी कहानी।

तब मैं पूरे सात साल का हो चुका था। हिरेन राय ने मुझे एक छोटा-सा सितार बना दिया। खुशी से मेरा दिल बाग-बाग! पापा ने मुझे सिखाना शुरू किया – सा रे गा मा, सारेगामा, रेगामा…
शुरुआत में सब बहुत मजेदार लग रहा था – चमचमाता सितार, और वो भी मैं बजा रहा था! अब तक तो पापा को ही बजाते देखा था, और अब खुद के हाथ में सितार!

मगर कुछ ही दिन में गड़बड़ शुरू हो गई – उंगलियों में ऐसी दर्द होने लगी जैसे कोई कांटे चुभो रहा हो। सितार छूने का मन ही नहीं करता था। पापा ने देखा कि बेटा तो ढीला पड़ गया। उन्होंने एक उपाय निकाला – सोचा कि अगर किसी मजेदार गाने के ज़रिए सिखाऊं तो बच्चे का मन लगेगा। बस, यहीं से शुरू हुई मुसीबत! खरगोश ठीक, खरगोश की कविता ठीक, खरगोश का गाना ठीक, सितार पर ठीक, लेकिन अगर उसी से खाल छिल जाए, तो?

अब सितार मिला है तो मोहल्ले के दोस्तों के बीच थोड़ा रौब जमाने का मौका तो बनता है ना?
मैंने ऐलान कर दिया – “मैं सितार बजाता हूँ!” दोस्तों ने भी फौरन कहा – “तो कभी सुनाओ ना।” अब मैं फंस गया! सुनाऊं क्या? वो ही सा-रे-गा-मा? मैंने टालमटोल करते हुए कहा, “सुनाऊंगा, सुनाऊंगा।”

कुछ दिनों बाद आया वो “खरगोश”! जो थोड़ी-बहुत बजाने की कला थी, उसी खरगोश में सब गड़बड़ हो गई।
खैर, किसी तरह “खरगोश – मटर – गोभी” में थोड़ी बहुत लोटपोट कर ही ली।

मैंने माँ को धीरे से बताया कि दोस्त लोग मेरी बजाई सुनना चाहते हैं। समय बीत रहा था, पर कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ रहा था। अब मुझे मालूम था कि अगर बिना बताए दोस्तों को बुला लूं और पापा को खबर हो जाए, तो समझिए भूकंप आ जाएगा। और जब पापा नाराज़ होते हैं, तो परिणाम अज्ञात और डरावना होता है।

फिर एक दिन हिम्मत जुटाकर दोस्तों को बुला ही लिया – “फलां दिन आ जाना!” माँ को भी बता दिया – “माँ, दोस्तों को बुलाया है।” उस दिन घर में उत्सव जैसा माहौल बन गया – बैठक में तोशक बिछा, उस पर सफेद चादर,
माँ ने मुझे सफेद पायजामा और कुरता पहना दिया – एकदम कलाकार बना दिया।

अब मैं तैयार बैठा – बस घड़ी देख रहा हूँ कि दोस्त कब आएंगे। दोस्त आए, और मैं सितार लेकर बैठ गया।
उस वक्त की फीलिंग! मन जैसे फुदकता टिड्डा, कभी उछलता, कभी डरता। फिर मैंने शुरू किया – “हम खरगोश टोली बना…” खरगोश गाना खत्म हुआ – मटर-गोभी खा-खा के थक गए खरगोश।
दोस्तों ने कहा – “बहुत अच्छा! और सुनाओ!”

अब मेरी तो पूरी तैयारी बस इतने पर थी। तो फिर मैंने सहारा लिया – “सा-रे-गा-मा”। बस वही मुझे बचा ले गया – दोस्त बोर होकर चले गए और मैं चैन की सांस ले पाया। तब तक मुझे अंदाजा नहीं था कि एक सूनामी मेरा इंतजार कर रही है।

बैठक के परदे गिरे हुए थे – इसलिए पता ही नहीं चला कि बगल के कमरे में क्या चल रहा था। जब परदा हटा और मैं उस कमरे में घुसा… सामने यमराज खड़े थे – यानी पापा। वो दफ्तर से जल्दी लौट आए थे, और मेरे महान कलात्मक करतब की भनक लगाकर बिना कोई हलचल किए, चुपचाप दूसरे कमरे में जा बैठे थे – सब सुन रहे थे।

मैं जैसे ही कमरे में घुसा, पापा बोले, “इतनी सज-धज क्यों? क्या बात है?” मैंने कहा – “दोस्त आए थे, सितार बजाया।” बस, फिर क्या था – शुरू हुआ दन-दना-दन! “तीन दिन सीखा और कलाकार बन गया?” – दन-दना-दन! “अभी ठीक से सुर पकड़ना नहीं आया, और दोस्तों को बजाकर सुना भी दिया?” – दन-दना-दन! हर वाक्य के बाद दन-दना-दन। दूसरा वाक्य – फिर दन-दना-दन। ये सिलसिला थोड़ी देर तक चला…
फिर शायद उनके हाथ दुखने लगे और तूफान रुका।

अब एक बात चुपचाप आपसे कहता हूँ – कृपया किसी को मत बताइएगा। मार खाते-खाते मैंने कुछ डिफेंस टेक्निक खोज लिए थे – जिनसे मुझे कम दर्द होता था, और मारने वाले को कभी-कभी ज्यादा हो जाता था! 

ভুল করে ঠিক

সন বোধ করি ১৯৫৬, আমার বয়েস বেড়ে বছর দুয়েক হল। আমরা তখন রসা রোডের ভাড়া-বাড়িতে থাকি। মা’য়ের চাপাচাপিতে বাবা ইংরেজ হয়ে পাপা হয়ে গেল, মানে আমি পাপা ডাকতে শুরু করলাম। মা দুটো অপশন দিয়েছিল, পাপা অথবা পাপাই। ওই ছোট্ট মাথায় পাপা ডাকটাই কম ঝামেলার মনে হল, বাবা-র  সাথে পাপা অনেকটা মিলেও যায়। 

পাপা আমাকে তার মনের মত তৈরী করার জন্যে একটা স্তর অবধি চেষ্টা করতেন, আর আমি তার প্রায় কোনটাই হতে দিতাম না; তার মধ্যে সবচেয়ে যেটা খারাপ ছিল সেটা হচ্ছে পড়াশুনো; ছি ছি, এটা কি কোন সুস্থ বাচ্চার কাজ? আমাদের ইস্কুলের জবরদস্তি পড়াশুনো যদি কোনও বাচ্চার ভালো লাগে তাহলে তার সুস্থতা নিয়েই কেমন যেন সন্দেহ জাগে। সে যা হোক, পড়াশুনোরই জয় সর্বত্র। কিন্তু এ ব্যাপারটা কেমন যেন কখনোই মানতে পারতাম না।

পড়াশুনো করার একেবারেই যে চেষ্টা করিনি তা নয়। কিন্তু বই-এর লেখাগুলোর সাথে আমার সাধারণ বুদ্ধিতে বোঝা জানার কেমন যেন জুঁতসই কোনও মিল পেতাম না। যেমন ধরুন এক ধরনের অঙ্ক  কষতে হোত, তার নাম ছিল “সরল”। “সরল” যে কেন সরল, তার সরলতাই ঠাহর করে উঠতে  পারতাম না, এই সরল যে কোন কাজের তাও মনে হত বোঝা জানার বাইরে।

আমার তখন অনেকটাই বয়েস, বুড়াই বলতে পারেন। একটি উচ্চশিক্ষণ-সংস্থা আমাকে বায়ুযানের ভাড়া-পত্তর দিয়ে কথা-বার্তা বলতে ডেকেছিল। সেখানেও বহু পণ্ডিতের মাঝেও প্রশ্নটা রেখেছিলাম। বলেছিলাম যে ছোটবেলায় সরল করার চেষ্টা করতাম যেখানে যোগ, বিয়োগ, গুণ, ভাগ, এর, প্রথম, দ্বিতীয়, তৃতীয় ব্রাকেট ইত্যাদি নানা রকম অশান্তি থাকত, আর তারপর তার উত্তর বেরুত “১”। আমি এখন ও বুঝে উঠতে পারলাম না ওটা কি করে ছবি এঁকে বোঝানো যাবে, আর কোন মাষ্টারমশাই ওটা বাচ্চাদের সেভাবে বুঝিয়ে থাকেন। যদি এটা না বোঝানোই যায় তাহলে অত  কঠিন করে ১ উত্তর জেনে কি লাভ? তখন এক অঙ্কের পণ্ডিত বললেন, আমরা যদিও ও ভাবে অঙ্ক শেখাই না, কিন্তু আপনি ফিনল্যান্ডের অঙ্ক শেখানোর পদ্ধতি দেখুন। মশাই; থাকি ভারতে, ফিনল্যান্ড দিয়ে আমি কি করব?   

সে যা হোক, কোনও কিছু মাথা-মুন্ডু বুঝতে না পেরে, পড়াশুনো ডকে উঠল। আমি মন দিয়ে গান-বাজনা করি পাপা এর ঘোরতর বিরোধী ছিলেন, উনি চাইতেন আমি ভালো করে পড়াশুনো করে, বিজ্ঞানী হব, বিশ্বিদ্যালয়ে পড়াব। আমি কোন পশ্চাতাপ ছাড়াই ওর সে সব আশায় সফলতার সাথে জল ঢেলে দিয়েছি। যদিও দেশে ও বিদেশে বিশ্ববিদ্যালয়ে পড়িয়েছি, কিছুটা হয়ত গবেষণার সাথেও  জুড়েছি; কিন্তু সেটা কোনভাবেই প্রচলিত লোকমান্য বিজ্ঞান নয়। হ্যাঁ, ঠিকই ধরেছেন, ভারতীয় গান-বাজনা বা তার সাথে জোড়া বিষয় নিয়ে সময় কাটিয়েছি, এই বিশেষ জ্ঞানের সাথে হয়তো বা কখনও  “পলব” বা “প্রচলিত লোকমান্য বিজ্ঞান” জুড়ে গিয়েছে; পড়াশুনো করেছি, কিন্তু সেটা চাপিয়ে দেওয়া নয়, নিজের খুশিতে মহা আনন্দে। যা পড়তে ইচ্ছে হয়েছে পড়েছি, জেনেছি, আর তার প্রয়োগ করেছি। এই বয়েসে এসে মনে হচ্ছে, যা করেছি তা যেন সব ভুল করে ঠিক হয়ে গিয়েছে!    

সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় ৽ কলকাতা ৽ ১৫ জুলাই ২০২৫

भूल से बनी बात

सन 1956 की बात है। मेरी उम्र तब दो साल के करीब रही होगी। हम रसा रोड की एक किराए की मकान में रहते थे। मम्मी ने एक दिन ऐलान किया—“अब से ‘बाबा’ नहीं, तुम्हें ‘पापा’ कहना है।” विकल्प भी दिया: ‘पापा’ या ‘पापाइ’। मेरी नन्हीं सी बुद्धि ने तुरन्त ‘पापा’ चुन लिया—कम बोझ, ज़्यादा मेल।

अब पापा की तमन्ना थी कि मुझे अपने जैसा बना दें। उन्होंने पूरी योजना बना रखी थी — मैं खूब पढ़ूँ, साइंटिस्ट बनूँ, और अंत में विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनकर देश की सेवा करूँ। मगर मैं था कि हर मोड़ पर उनकी योजना में पेंच लगा देता।

सबसे बड़ी लड़ाई पढ़ाई को लेकर हुई। मुझे किताबों से अजीब सी चिढ़ थी। स्कूल की ज़बरदस्ती वाली पढ़ाई तो जैसे किसी मानसिक अत्याचार से कम नहीं लगती थी। और फिर वो ‘सरल’ गणित! नाम था ‘सरल’, पर उसमें जोड़, घटाव, गुणा, भाग और न जाने कौन-कौन से ब्रैकेट! और नतीजा? “1”! अब भला बताइए, इतनी जहमत उठाकर अगर अंत में ‘1’ ही पाना है, तो वो झंझट क्यों? मुझे तो बचपन से यही लगता था कि ‘सरल’ के नाम पर बहुत बड़ा धोखा है।

सालों बाद, जब बाल सफेद हो गए और वक्त कुछ धीमा चला, मुझे एक नामी संस्थान ने बुलाया—हवाई जहाज का टिकट भेजकर! वहाँ बड़ी-बड़ी हस्तियाँ बैठी थीं, और मैं वही पुराना सवाल उठा लाया: “ये ‘सरल’ वाला हिसाब बच्चों को आखिर क्यों सिखाया जाता है?” एक विद्वान बोले, “आप फिनलैंड की मैथड देखिए।” मैंने सोचा, “मियाँ, फिनलैंड से पहले तो मुझे अपना बचपन ही समझ नहीं आया।”

ख़ैर, पापा को मुझसे जो उम्मीदें थीं, उनमें मैंने पानी ही फेरा। उन्होंने सोचा था, मैं लैब को चमका दूँगा। मैंने सितार को चमका दिया। उन्होंने चाहा मैं विज्ञान में शोध करूँ। मैंने रागों में जीवन खोज निकाला। वे चाहते थे कि मैं क्लासरूम में लेक्चर दूँ, मैंने मंच पर अलाप छेड़ दिए।

आख़िर में क्या हुआ? पढ़ाई की — लेकिन अपनी पसंद से। जो दिल चाहा, वही पढ़ा। और वही अपनाया। बिना पछतावे के। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है—सब कुछ गलतियों से ही सही, पर सही दिशा में चला गया।

कभी-कभी, ज़िंदगी भी ‘सरल गणित’ की तरह होती है—समझ में नहीं आती, लेकिन अंत में उत्तर ‘ठीक’ ही आता है।

Three miles on a bicycle .. Ramnagar in 1960

First Posted on May 1, 2012 by sitardivine

I still remember the three miles on a bicycle, seating on a small seat in front of my father. Now I know it was 24 October in the year 1960. A little calculation tells me that I was then six years old. We went to Ramnagar two days earlier. I did not understand why we were there but liked the rural ambiance… the huge expanse of paddy ground.. the sunflowers… the trees everywhere.. the Magnolia tree in front of the small bungalow.  Huge playground not far from the house.. the smell of cooking of fresh chicken or hunted duck curry in the evening… the tube-well on the other side.. the blackberry and custard apple trees… the litchi tree, the olive and tamarind trees … the flowers.. the breeze.. the fresh air, clear moonlit sky far from the madding Calcutta crowd.

Papa told me that he would go somewhere a bit far from Ramnagar. I constantly went on requesting that I would like to be with him.

So, he tried to arrange some transport to accommodate me and finally managed to find a bicycle that has a small seat in the front. I was happy and took the ride with him on that little red baby seat. I remember there were quite a few others who were in the group and all on bicycles. It was a bumpy village road and too long for me on that uncomfortable seat. Still, I enjoyed the ride.. the only bicycle ride I ever had with my father!

I don’t clearly remember how Bado-Jatha [my uncle] joined us. Now I know that his presence was very important, he had to sign the gift deed on behalf of Dadu [grandfather]. He transferred the land to Papa’s name.  I remember I saw Jatha [jathA]  at Chandpara. He was there at the Sub-Registrar’s office. Jatha possibly reached there directly by train from Calcutta on the same day. I remember Arekta-Jatha [another uncle] came to the office with us. He was among us in the Ramnagar bicycle group.


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Oh yes! I forgot to tell you what Ramnagar was.  This was a name of a place that my Dadu owned. This was not far from the then Pakistan border at Bangaon. This was about three miles from Chandpara and two and a half-mile from Thakurnagar, the two close-by railway stations. This is now under the post office Ramchandrapur.  Dadu [grandfather] purchased a piece of land during early 1940s or late 1930s. I hear that it was a stretch of 4000 bighas  [1322.4 Acres  or 532.2 hectare]. After Indian independence the government introduced land ceiling and he lost a large part of the land [He never received any compensation on that though!]. However, at one point the land area came to as little as around 6.5 acres and at that point Dadu decided to gift the land to my father.  Now I can imagine, that too was not too small an area..

Back to the story and making the long story short, the land got transferred to Papa after the legal formalities and we all came back to Ramnagar.

I discovered that Gift-deed today lying in an old worn-out packet… Today is the 2012 May Day (01 May]. I thought digitization of the document is a good idea. So, I scanned the document and here it is for you.. It feels good to lay my hands over these old pieces of paper that no more possess the symbol of ownership. The land is still there but not with us… but the memory is still fresh and alive.. Enjoying the old memories!

Some updates:

My Dada [Mahiruha Shekhar Banerjee] called me after looking at the draft post and pointed out that Dadu actually purchased 1600 bighas [526.96 acre or 214.08 hectare] of land in the year 1935.

সাইকেলে তিন মাইল… ১৯৬০ সালের রামনগর

প্রথম প্রকাশ: ১ মে, ২০১২ | sitardivine

আমি এখনও স্পষ্ট মনে করতে পারি – বাবার সাইকেলের সামনে ছোট্ট একটা সিটে বসে তিন মাইল রাস্তা। এখন জানি, সেটা ছিল ২৪ অক্টোবর, ১৯৬০ সাল। একটু হিসেব করলেই বোঝা যায়, তখন আমার বয়স ছিল ছয়। আমরা রামনগরে গিয়েছিলাম তার দু’দিন আগে। ঠিক কেন গেছি, সেটা তখন বুঝিনি, কিন্তু গ্রামবাংলার পরিবেশ দারুণ লেগেছিল—ধানের মাঠের বিশাল বিস্তার, সূর্যমুখী ফুল, চারদিকে গাছগাছালি, ছোট্ট বাংলো বাড়িটার সামনে ম্যাগনোলিয়ার গাছ। একটু দূরে বিশাল খেলার মাঠ, সন্ধেবেলায় রান্না করা টাটকা মুরগি বা শিকার করা হাঁসের ঝোলের গন্ধ, এক পাশে টিউবওয়েল, জামরুল আর আতা গাছ, লিচু, জলপাই ও তেঁতুল গাছ… ফুল, হাওয়া, নির্মল বাতাস, আর স্পষ্ট জ্যোৎস্না – সব মিলিয়ে এক অন্য জগৎ, কলকাতার কোলাহল থেকে অনেক দূরে।

বাবা বললেন, উনি একটু দূরে কোথাও যাবেন। আমি বারবার আবদার করতে লাগলাম—আমিও যাব, আমিও যাব। শেষমেশ, আমার জন্য একটা ব্যবস্থা করে ফেললেন। সামনে ছোট্ট একটা সিটওয়ালা সাইকেল পেলেন, আর তাতেই আমি উঠে বসলাম, একেবারে লাল রঙের বাচ্চাদের সিট। খুব খুশি হয়ে চেপে বসলাম। মনে আছে, আমরা একটা দলের অংশ ছিলাম—সবাই সাইকেলে। কাঁচা গ্রাম্য রাস্তা, আমার মতো খুদে বালকের জন্য বেশ লম্বা আর অস্বস্তিকর ছিল সেই সফর, কিন্তু উপভোগ করেছিলাম—বাবার সঙ্গে আমার জীবনের একমাত্র সাইকেল-ভ্রমণ!

বড় জেঠু ঠিক কীভাবে আমাদের সঙ্গে যোগ দিলেন, স্পষ্ট মনে নেই। তবে এখন জানি, উনি খুব গুরুত্বপূর্ণ ছিলেন—দাদুর পক্ষে গিফট ডিডে সই করার দায়িত্ব ছিল ওনার। সেই জমি বাবার নামে হস্তান্তরিত হয়েছিল। মনে আছে, চাঁদপাড়ায় জেঠুকে দেখেছিলাম—সাব-রেজিস্ট্রার অফিসে। সম্ভবত উনি সেদিনই কলকাতা থেকে ট্রেনে এসে পৌঁছেছিলেন। আরও একজন জেঠু, যাঁকে আমরা “আরেকটা-জেঠু” বলতাম, তিনিও আমাদের সঙ্গে অফিসে গিয়েছিলেন। উনিও ছিলেন রামনগর সাইকেল দলের একজন।

ও হ্যাঁ! রামনগর ব্যাপারটা বলা হয়নি। এটা ছিল দাদুর কেনা একটি জায়গা, বনগাঁর কাছে, তৎকালীন পাকিস্তান সীমান্ত থেকে খুব দূরে নয়। চাঁদপাড়া থেকে প্রায় তিন মাইল আর ঠাকুরনগর থেকে আড়াই মাইল দূরে। এখন এই জায়গা পড়ে রামচন্দ্রপুর ডাকঘরের অধীনে। দাদু সম্ভবত ১৯৪০-এর দশকের শুরু বা ১৯৩০-এর দশকের শেষে প্রায় ৪০০০ বিঘা জমি (১৩২২.৪ একর বা ৫৩২.২ হেক্টর) কিনেছিলেন [এটি সঠিক নয়, ঠিক তথ্যের জন্যে নিচে দেখুন] । স্বাধীনতার পরে জমি সংস্কার আইনে অনেকটা জমি চলে যায় (যার বিনিময়ে কোনো ক্ষতিপূরণও পাননি)। এক সময় জমির পরিমাণ কমে এসে দাঁড়ায় ৬.৫ একরে, তখনই দাদু ঠিক করেন এই জমিটা বাবাকে উপহার দেবেন। এখন ভাবলে, সেটাও তো কম কিছু নয়।

আর সেই ঘটনা সংক্ষেপে বললে—আইনি প্রক্রিয়া সম্পন্ন হয়ে জমির মালিকানা বাবার নামে চলে যায়, আর আমরা সবাই আবার রামনগরে ফিরে আসি।

আজ হঠাৎ পুরনো এক প্যাকেট থেকে সেই গিফট-ডিডটা বেরিয়ে পড়ল… আজ ১ মে ২০১২, মে-ডে। ভাবলাম, ডকুমেন্টটা ডিজিটাল করে রাখাই ভালো হবে। স্ক্যান করে এখানে দিলাম তোমাদের জন্য। জমির মালিকানা নেই, কিন্তু সেই কাগজের ছোঁয়া এখনও এক অনুভূতির জন্ম দেয়। জমি আজও আছে, তবে আমাদের নয়—তবে স্মৃতিটা একেবারে টাটকা, জীবন্ত।

নতুন তথ্য:
আমার দাদা (মহীরুহ শেখর ব্যানার্জি) ফোন করে জানালেন, দাদু আসলে ১৯৩৫ সালে ১৬০০ বিঘা (৫২৬.৯৬ একর বা ২১৪.০৮ হেক্টর) জমি কিনেছিলেন।

साइकिल पर तीन मील… 1960 का रामनगर

प्रथम प्रकाशन: 1 मई 2012 | sitardivine

मुझे आज भी याद है—बाबा की साइकिल के सामने लगी छोटी सी सीट पर बैठकर तीन मील का सफर। अब मुझे पता है, वह दिन था 24 अक्टूबर 1960। थोड़ा हिसाब लगाने पर पता चलता है कि मेरी उम्र तब छह साल थी। हम दो दिन पहले रामनगर पहुँचे थे। मुझे यह नहीं समझ में आया कि हम वहाँ क्यों थे, लेकिन गाँव का वातावरण बहुत भाया—चारों ओर फैले धान के खेत, सूरजमुखी के फूल, पेड़ों की भरमार, उस छोटे से बंगले के सामने मैगनोलिया का पेड़। घर से थोड़ी दूर एक बड़ा खेल का मैदान, शाम को ताज़े मुर्गे या शिकार की हुई बतख के झोल की खुशबू, दूसरी तरफ ट्यूबवेल, जामुन और शरीफा के पेड़, लीची, जैतून और इमली के पेड़… फूल, हवा, ताज़गी, और चाँदनी रात—सब कुछ बहुत ही सुकूनदायक था, कोलकाता की भीड़-भाड़ से बहुत दूर।

पापा ने कहा कि उन्हें रामनगर से थोड़ी दूर कहीं जाना है। मैंने ज़िद पकड़ ली कि मैं भी उनके साथ चलूँगा। फिर उन्होंने कोई इंतज़ाम करने की कोशिश की और एक ऐसी साइकिल मिल गई, जिसमें आगे एक छोटा सा सीट था। मैं बहुत खुश हुआ और उस छोटी लाल सीट पर बैठ गया। याद है, और भी कुछ लोग थे हमारे साथ—सब साइकिल पर। वह एक ऊबड़-खाबड़ गाँव की सड़क थी, और मेरे जैसे छोटे बच्चे के लिए काफी लंबा सफर। लेकिन फिर भी मैंने उस सवारी का पूरा मज़ा लिया—बाबा के साथ मेरी पहली और आखिरी साइकिल की सवारी!

मुझे ठीक से याद नहीं कि बड़े-ज्येष्ठा (मेरे चाचा) हमारे साथ कैसे जुड़े, लेकिन अब समझ में आता है कि उनका साथ होना ज़रूरी था—दादाजी की तरफ से गिफ्ट-डीड पर हस्ताक्षर करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी। उसी दिन ज़मीन पापा के नाम ट्रांसफर की गई। मुझे याद है, ज्येष्ठा को मैंने चाँदपाड़ा में देखा था, सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में। शायद वो उसी दिन ट्रेन से कोलकाता से आए थे। और एक चाचा, जिन्हें हम “अरेक्ता-ज्येष्ठा” कहते थे, वो भी हमारे साथ ऑफिस में गए थे—रामनगर साइकिल समूह के सदस्य।

ओह हाँ! मैंने बताया ही नहीं कि रामनगर क्या था। यह वह जगह थी जो मेरे दादाजी की थी। यह बांगांव के पास, तत्कालीन पाकिस्तान सीमा से बहुत दूर नहीं थी। यह चाँदपाड़ा से तीन मील और ठाकुरनगर से ढाई मील दूर था—दोनों पास के रेलवे स्टेशन। अब यह रामचंद्रपुर पोस्ट ऑफिस के अंतर्गत आता है। दादाजी ने 1940 के प्रारंभ या 1930 के अंत में लगभग 4000 बीघा (1322.4 एकड़ या 532.2 हेक्टेयर) ज़मीन खरीदी थी। आज़ादी के बाद सरकार ने ज़मीन की सीमा तय की और उन्होंने अधिकांश ज़मीन खो दी (उन्हें कभी कोई मुआवज़ा नहीं मिला!)। बाद में ज़मीन घटते-घटते करीब 6.5 एकड़ रह गई, और तभी दादाजी ने वह ज़मीन मेरे पापा को उपहार देने का निर्णय लिया। अब सोचता हूँ, वो भी कोई छोटी ज़मीन नहीं थी।

कहानी को संक्षेप में कहें तो—कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ज़मीन पापा के नाम हो गई और हम सब रामनगर लौट आए।

आज एक पुरानी, फटी-पुरानी फाइल से वह गिफ्ट डीड निकल आई… आज 1 मई 2012 है, मई दिवस। सोचा इसे डिजिटाइज़ कर दूँ। तो मैंने दस्तावेज़ स्कैन कर दिया—ये रहा। इन पुराने कागज़ों को छूना अब भी एक सुकून देता है, भले ही अब ये मालिकाना हक का प्रतीक नहीं रहे। ज़मीन आज भी है, लेकिन हमारे पास नहीं… पर यादें अब भी ताज़ा हैं—और वही यादें अब भी जीवन का हिस्सा हैं।

कुछ अपडेट्स:
मेरे दादा (महीरुह शेखर बनर्जी) ने पोस्ट का ड्राफ्ट देखने के बाद कॉल किया और बताया कि दादाजी ने वास्तव में 1935 में 1600 बीघा (526.96 एकड़ या 214.08 हेक्टेयर) ज़मीन खरीदी थी।

নিখুঁত আমি, আর সবেতে গণ্ডগোল!

লেখক – কেমনামি বোকানি*  

ভাবছিলাম আমি একজন দারুণ লেখক। আর মানুষ হিসেবে? এক্কেবারে, যাকে বলে নিখুঁত।  আরে আরে রেগে যাচ্ছেন কেন? ভাবতে কি অসুবিধে বলুন তো মশাই? এবার সত্যি কথাটা শুনুন, যখন লিখতে শুরু করলাম তখন আমার সব বিদ্যে-বুদ্ধি অসভ্যের মতন দাঁত বের করে  সামনে এসে দাঁড়িয়ে পড়ল। আমি তো লজ্জায় কুপোকাত! এতটা হরিদাস পাল নিজেকে কখনোই ভাবতে পারিনা।   

এবার ভণিতা ছেড়ে অন্য কথায় আসি। সেতো সাড়ে ছয় দশক পেরিয়ে প্রায় সাত দশক হতে চলল, আমার মতন দশাসই অকাজের মানুষের ওজন বয়ে চলতে ধরতী-মায়ের মুখে কোন রা নেই, অন্য দেবতারাও তেমন করে কোন আওয়াজ ওঠাচ্ছেন না। কিন্তু, সময় নিয়ে কিছুটা সমস্যা বোধ হচ্ছে। সময়টাকে সুন্দর করে তোলাটা যে যেমন-তেমন কাজ নয় সেটা সহজেই বুঝতে পারি। সময়টা সুযোগ পেলেই ব্রহ্মদত্যির মতন হুড়মুড় করে ঘাড়ে চেপে বসে ঘাড় মটকে দিতে  চায়, কিন্তু ওকে দিয়ে আদর করিয়ে নিতে গেলে বা সুন্দর গল্পে মন ভুলিয়ে নিতে গেলেই মহা-চাপ। 

কথাপ্রসঙ্গে বলি, এই ‘চাপ’  কথাটা আজকাল বেশ জমিয়ে চলছে। আজকের বাঙ্গালীদের জন্য ‘চাপ’ নিয়ে থিওরি কষার দরকার পড়েনা। কাকারা চাপে ও তাপে বেশ আছেন। কারুরই খুব একটা নিজেকে নিয়ে ভাববার সময় নেই, অনেক মানুষই প্রায় নিঃস্বার্থভাবে অন্যের কি করা উচিত তা নিয়ে চিন্তিত হয়ে পড়েন। এতে, যারা ভাবছেন তাদের চাপ বাড়ে,বহু ক্ষেত্রে রক্তচাপও হয়ত বাড়ে। অনেকেই নিশ্চয় দুঃখিত হয়ে পড়েন যে তাদের এত ভাবা সত্যেও,  যাকে বা যাদের নিয়ে তারা চিন্তিত তাদের খুব একটা হেলদুল দেখতে পান না। বাংলায় এই ধরনের ঘটনাকেই বোধহয় বলে; “কবি এখানেই কেঁদেছেন”, এটি একটি বিশেষ বাগধারা বা লব্জ যাকে সোজা বাংলায় “বেঙ্গলী ইডিয়ম” বলা চলে।

কথা হচ্ছে, কবি না কাঁদলেও রাগ তো হতেই পারে। যারা সমাজসেবী তাদের কথা আলাদা, তাঁদের  জীবনই তো অন্যদের জন্যে উৎসর্গিত, আর এই ভাবনা তাঁদের সেবার অঙ্গ। যারা দেশ চালান বা দেশ চালানর কাজে যুক্ত হতে চান বা যে কোন অর্থে মানুষের সেবায় নিয়োজিত তাদের নিয়ে লিখছিনা, আমার লেখা এঁদের অতিরিক্ত মানুষজন নিয়ে। এই ধরনের মানুষজন অনেক বড় বড় ব্যপারের সাথে নিজেদের যুক্ত রাখেন, যেমন, কিউবার রাজনীতি বা দক্ষিণ আফ্রিকার অর্থনীতি। তখনই ছোটখাটো বিষয়ে চিন্তা করেন যখন নিজে কোন কারণে আটকে পড়েন। এই অসুবিধেটা অন্য কারুর বা ত্রুটিপূর্ণ ব্যাবস্থার দোষে হয়েছে, এ বিষয়ে তাদের খুব একটা সন্দেহ থাকেনা। ওই মানুষটা যদি এমনটি  করতেন তাহলেই তো কাজটা হয়ে যেত অথবা বর্তমান দোষপূর্ণ ব্যবস্থাই সব গণ্ডগোলের জড়। আমি ব্যাপারটাকে সাপোর্ট করি। তাই তো বলি; নিখুঁত আমি, আর সবেতে গণ্ডগোল!  

*নামটা দুষ্টুমি করে বদলে দেওয়া। “কেমনামি বোকানি” আসলে ভুল নিয়মের বাংলা বাক্য, যেখানে কেমন+আমি=কেমনামি, আর ‘না’ কে ‘নি’ লেখা হয়েছে, বোকা + নি (না) = বোকানি; কেমনামি বোকানি –> কেমন আমি, বোকা না? আরে আরে, রেগে যাচ্ছেন কেন? পরশুরামের ভাষায়; “হয় হয়, zaনতি পারনা” [দক্ষিণ-চব্বিশ-পরগণা অঞ্চলে নকারাত্মক অর্থে ‘নি’ এর প্রয়োগের বহুলতা দেখে পাওয়া যায়। যেমন, যাবেনি? দেবেনি? ইত্যাদি। যদিও ‘বোকানি’ সেভাবে হয়ত প্রয়োগ হয়না।]       

লেখক সঞ্জয় বন্দ্যোপাধ্যায় বলছেন; “এ লেখাটা যদি ভাল লাগে তাহলে প্রশংসা আমাকেই করবেন। কিন্তু যদি পড়ে কিলোতে ইচ্ছে হয় তবে সে দায়িত্ব আমার নয়। সত্যি বলছি, ছোড়দি আর রাতু ভাল ভাল করেছে, তাই গ্যাস খেয়ে থাকতে না পেরে লেখাটা পাবলিক করে দিলাম। খারাপ লাগলে জানাবেন, ওদের ঠিকানা দিয়ে দেব।”

Hindi translation

निख़ुत मैं, और बाकी सब में गड़बड़!
लेखक केमनामी बोकानी (मस्ती में बदला गया नाम)*

सोच रहा था कि मैं एक ज़बरदस्त लेखक हूँ। और इंसान के तौर पर? बस कहिए—एकदम परफेक्ट। अरे अरे, ग़ुस्सा क्यों हो रहे हैं? सोचने में कोई टैक्स लगता है क्या? अब ज़रा सच्ची बात सुनिए—जब मैंने लिखना शुरू किया, तो मेरी सारी विद्या-बुद्धि ऐसे सामने आकर हँसने लगी जैसे कोई असभ्य आदमी बत्तीसी निकालकर हँसे! मैं तो शर्म के मारे गड़ गया। इतनी फज़ीहत कभी सोची भी नहीं थी।

ख़ैर, अब भूमिका छोड़कर असली बात पर आते हैं। साढ़े छह दशक बीत चुके हैं, लगभग सातवें में कदम रखने ही वाला हूँ। धरती माता पर मैं जैसा काम का न निकला, फिर भी धरती माँ चुपचाप मेरा बोझ ढो रही हैं—न कोई उफ़, न ही किसी देवता की तरफ से कोई आपत्ति। लेकिन, समय को लेकर थोड़ी गड़बड़ जरूर लगती है। समय को सुंदर बनाना मामूली बात नहीं है, ये मैं अच्छी तरह समझ चुका हूँ। समय मौका मिलते ही ब्रह्मदैत्‍य की तरह गर्दन पर चढ़ बैठता है और उसे मरोड़ देने को उतावला रहता है। लेकिन अगर उसे ज़रा प्यार से समझाओ, या अच्छी कहानी से बहलाओ—तो बस फिर भारी ‘चाप’ (दबाव)।

अब चूंकि बात निकली है, तो कह दूँ—आजकल ‘चाप’ शब्द बड़ा हिट चल रहा है। आज के बंगालियों को इस पर कोई शोध करने की ज़रूरत नहीं है। सब काका-मामा दबाव और ताप में अच्छे से पके हुए हैं। किसी को भी खुद को लेकर सोचने का फुर्सत नहीं, मगर दूसरों को क्या करना चाहिए—इस पर सब बहुत चिंतित रहते हैं। इस चक्कर में, सोचने वाले का चाप बढ़ता है, और कई बार रक्तचाप (BP) भी! कई लोग दुखी भी हो जाते हैं कि इतनी चिंता करने के बावजूद, जिनके बारे में वो चिंतित हैं, वे ज़रा भी नहीं बदलते। बंगाल में इसको शायद कहते हैं—”कवि यहीं रो पड़ा!” यह एक खास बांग्ला मुहावरा है, यानी एक “Bengali idiom”, जैसा कि आजकल स्टाइलिश लोग कहते हैं।

अब बात ये है कि कवि रोए या न रोए, ग़ुस्सा तो आ ही सकता है! समाजसेवियों की बात अलग है—उनका जीवन तो सेवा के लिए समर्पित होता है। जो देश चला रहे हैं, या देश चलाने का सपना देखते हैं, या किसी भी तरह से सेवा में लगे हैं—मैं यहाँ उनके बारे में नहीं लिख रहा। मेरा लेख बाकी सब लोगों के बारे में है।

ऐसे लोग बहुत बड़े-बड़े मुद्दों से खुद को जोड़कर रखते हैं—जैसे क्यूबा की राजनीति या दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था। लेकिन छोटे-मोटे मुद्दों की बात तब ही करते हैं जब ख़ुद किसी मुसीबत में फँस जाते हैं। और तब, ये पूरा यक़ीन होता है कि गलती उनकी नहीं, बल्कि किसी और की या किसी व्यवस्था की है। “अगर वह आदमी ऐसा करता तो काम हो गया होता!” या फिर, “सिस्टम ही सड़ा हुआ है!” — इन पर इनका दृढ़ विश्वास होता है।

और मैं? मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूँ। तभी तो कहता हूँ—निख़ुत मैं, और बाकी सबमें गड़बड़!”


* *यह नाम मस्ती में बिगाड़ा गया है। “ केमनामी बोकानी ” असल में गड़बड़ बांग्ला व्याकरण से बना है, जहाँ ‘केमन’ (कैसा) + ‘आमी’ (मैं) = ‘केमनामी’, और ‘ना’ को ‘नि’ करके ‘बोका’ (बेवकूफ़) + ‘नि’ = ‘बोकानी’। तो “केमनामी बोकानी” का मतलब निकलता है—”मैं कैसा हूँ, बेवकूफ़ नहीं क्या?”
अरे अरे, फिर से ग़ुस्सा कर रहे हैं? परशुराम की भाषा में कहें तो—”हाय हाय, Zaनती पारोना!” (यह दक्षिण २४-परगना क्षेत्र में नकारात्मक अर्थ में ‘नि’ का लोकप्रिय प्रयोग है—जैसे ‘जाबेनि?’ यानी ‘नहीं जाओगे?’, ‘देबेनि?’ यानी ‘नहीं दोगे?’, आदि। हालाँकि ‘बोकिनी’ इस तरह सामान्यतः नहीं कहा जाता)।

लेखक संजय बंदोपाध्याय कहते हैं:
“अगर यह लेख अच्छा लगे तो तारीफ़ मुझे ही कोरियेगा। लेकिन अगर पढ़कर ठुकाई करने का मन करे, तो उसकी ज़िम्मेदारी मेरी नहीं। सच में कह रहा हूँ—छोड़ीदी और रातू ने हौसला बढ़ाया, जयादा गैस कहा कर लेखको पब्लिक कर दिया। अगर बुरा लगे तो बताइए, उनका पता दे दे दूँ।”

प्रकाशित तिथि: 10 सितम्बर, 2021

‘১৩ জুলাই ২০১৮ আমার মৃত্যুদিন’ – চিত্রগুপ্ত কি চটজলদি কিছু আপডেট করলেন?

First posted on July 22, 2018 by sitardivine

সমুদ্রে প্রচণ্ড ঢেউ, ডুবেই  যাচ্ছি,  শরীরটাকেও ধরে রাখা যাচ্ছেনা, স্রোত  টেনে নিয়ে যাচ্ছে ! পারের জেলেটিকে  আমার মেয়ে বল্ল,  একটু এগিয়ে গিয়ে  বাবাকে  বাঁচিয়ে নাও। “না দিদি, পারবোনা ।”

বেশ কিছুদিন  ধরেই  আমরা ভাবছিলাম  কোথাও  একটু বেড়িয়ে  এলে  কেমন হয়।   মেয়ের  বিয়ের  পর  আমাদের সবাই  মিলে কোথাও  যাওয়াই হয়নি। টিপাই-র বুক করা হেনরি আইল্যান্ড এর মনোরম অতিথিশালায় যখন পৌঁছুলাম তখন সন্ধ্যে হয় হয়। তারপর তো  জমজমাট পার্টি! শুতে শুতে বেশ অনেকটাই রাত হয়ে গেলো। ভোর পৌনে পাঁচটায়, তখন ও ঘুম পুরো হয়নি, ফোন বেজে উঠল;  “বীচে যাবে নাকি?”  মিম্মাইর ফোন। আমি  ঝটপট তৈরি হয়ে নিলাম, দুজন ড্রাইভারকেও  জাগানো হল। আমার গিন্নি বললেন, তাঁর তৈরি হতে কিছুটা সময় লাগবে। মা আর রুশাই  অন্য ঘরে  ছিল। রুশাই এর ও ঘুম জরুরী। তাই, ওরা তিনজন রয়ে গেলো। আমরা পাঁচজন;  সতুদা, বৌদি, টিপাই, মিম্মাই আর আমি গাড়ী চেপে রওনা হয়ে গেলাম। গাড়ী পৌঁছে দিলো একটা বাঁশের সাঁকোর সামনে।

নীল-সাদা রং করা  বাঁশের সাঁকো পেরুতেই   সমুদ্রের আওয়াজ কানে এলো। মনটা খুশীতে ভরে গেলো, সমুদ্র যদিও তখনও  দেখা যাচ্ছেনা। রুশাইর পছন্দ আর আমার গিন্নীর সমর্থনে একটা দামী ফোন কিনেছিলাম। ওটি বেশ ভালো ছবি তোলেন আর পকেটেও সহজেই চলে আসেন, তাই এবার  আর ক্যামেরা বা আই-প্যাড নিয়ে যাইনি। হৈ-চৈ করে ছবি তুলতে থাকলাম। নিজে ছবি তুলি, আর নিজেই খুশি হই। মাঝে মাঝে তারিফ পাওয়ার জন্য, কখনো সতুদা বা কখনো বৌদিকে ছবিগুলো দেখাই। মিম্মাই আর টিপাই কে দেখিয়ে লাভ নেই, কারণ ওদের পকেটেও ওই  যন্ত্র বা ওর থেকেও  ভালো যন্ত্র আছে। যাই  হোক ,  শেষ পর্যন্ত  বীচে  পৌঁছে গেলাম। দেখলাম বেশ বড় বড় কয়েকটা  সাইনবোর্ড।অতো সুন্দরের  মাঝে  কেউ কি আর পড়াশুনো করে? হয়ত’  পড়লাম, কিন্তু কিছুই  মাথায় ঢুকলোনা।

সমুদ্রতটে পৌঁছে  দেখলাম সামনে  অল্প  একটু জল, ওটা পেরুলেই  চড়া, আর  তার পরই দিগন্তজোড়া সমুদ্র –  তাতে সূর্য উঠছে!  সমুদ্র যেন হাতছানি দিয়ে ডাকল, ‘চলে এসো’। আমরা  পাঁচজনেই ছপ-ছপ  করে  জল পেরিয়ে চরায় গিয়ে   উঠলাম।  মনটা ভরে গেলো। সতুদা আর টিপাই আরও এগিয়ে সমুদ্রের জলে পা ভেজাল।  আমি আসার আগে ইন্টারনেট এ  হেনরি আইল্যান্ড সম্বন্ধে কিছুটা পড়েছিলাম। জেনেছিলাম, ওখানে চোরাবালি আছে। বাচ্চাদের মনের জোর অনেক বেশী, রুশাই কে বলাতে ও মুচকি হেসেছিল, হয়ত মনে মনে বলেছিল ‘বাবাইটাকে নিয়ে আর পারা যায়না’।  যাই হোক আমি নিজে খুব সাবধানে পা ফেলে ফেলে চলছিলাম, যাতে  বালি নরম পেলেই টের পাই। দেখলাম সমুদ্রের কাছে সহজেই পোঁছে গেলাম। আনন্দ  আর ধরেনা। ছবির পর  ছবি তুলতে শুরু করলাম। সতুদা নানা পোজ দিয়ে  ছবি তুলল, একটা ছবি আবার বৌদিকে আধ-জড়িয়ে। টিপাই একদম ছবি তোলাতে চায়না। বৌদি বল্ল, ওর কয়েকটা ছবি তুলে দাও। দুর থেকে জুম করে যতটা  তোলা যায় তুললাম। কিন্তু ওভাবে কি আর ভালো ছবি হয়?  তখন ওকে বললাম, ‘এই  কাছে আয়, তোর সাথে দু-একটা সেলফি  তুলি। ও আপত্তি করলনা। স্ক্রিন এ ওর বাবা-মা আসছিল, বল্ল, তাড়াতাড়ি তোল, ওঁরাও ছবিতে চলে আসুক। সতুদাকে ফ্রেমে ধরা গেলনা, কিন্তু বৌদিকে ধরতে পারলাম।

তাখন সমুদ্র অল্প অল্প করে বাড়তে শুরু করেছে। টিপাই আর মিম্মাই সকালের প্রয়োজনে  আমাদের ছেড়ে আবার ওই ছপ-ছপ করে জল পেরিয়ে চলে গেলো। আমার বুড়ো-বুড়ীরা  তখন চরাতে হইচই করছি।  কিছুক্ষণ চলার পড় মনে হল এখন ফেরা যাক।

সমুদ্রের দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে দেখি মিম্মাই আর তার মা তটে  চলে  এসেছে। তখনই টের পেলাম সমুদ্র বেশ তাড়াতাড়ি  উথাল পাথাল করতে শুরু করেছে। সতুদা কে ডাকলাম, ‘তাড়াতাড়ি চলে আয়’। ও বোধ হয় ঠিক বুঝতে পারলনা। আমি ফেরার জন্যে হাঁটতে শুরু করেছি, সাথে বৌদি, সতুদা বেশ কিছুটা দুরে। আমি আর বৌদি তখন চেঁচাতে শুরু করেছি, ‘তাড়াতাড়ি এসো’, ‘তাড়াতাড়ি আয়’।

চরার শেষ প্রান্তে এসে দেখি, সেই অল্প জল প্রায় চারগুণ চওড়া হয়ে গেছে। কোথা দিয়ে যে ফিরব  ঠিক করতে সময় লাগছে। মিম্মাই বল্ল,  ‘ওদিক দিয়ে এসো’, ওদিকটা কিছুটা কম  চওড়া। ওই প্রান্তে গিয়ে দেখছি পার ভাঙতে শুরু করেছে। তখনই বুঝলাম,  যত দেরী হবে ততই তীরে  পৌঁছোতে পারার সম্ভাবনা  কমতে থাকবে। তখনও সতুদা বেশ কিছুটা দুরে।  অবস্থার ভয়াবহতা তখনো ও জানেনা। যাই হোক। নেমেই দেখলাম হাঁটু জল, জলে বেশ তোড়। হাঁটতে  শুরু করলাম,  যতটা তাড়াতাড়ি ওই স্রোতে হাঁটতে পারি। যতই সামনে এগুচ্ছি জল বাড়ছে, হাঁটু থেকে বুক, বুক থেকে গলা, তারপর তারও  ওপরে। মুখে নোনা জল ঢুকে যাচ্ছে, আর পা পাচ্ছিনা। ছোটবেলায়  ঢাকুরিয়াতে ‘ডগস ক্রল’ শিখেছিলাম, চেষ্টা করলাম, তেমন কোন কাজে এলনা। সমুদ্র তখন এই ভারী শরীরটাকেও ভাসিয়ে দুরে নিয়ে যাচ্ছে। যখন মাথা উঠল, তখন জেলেটিকে বললাম সাহায্য করতে, সে স্পষ্ট ‘না’ বলে দিলো। আমি মিম্মাই কে বললাম ‘তুই দৌড়ো’। গিন্নিকেও দেখলাম, সে অনেকটা দুরে। আমি বেশ তাড়াতাড়ি স্রোতের তোড়ে  সরে সরে যাচ্ছিলাম যে, ক্রস কারেন্টে খুব তাড়াতাড়ি পায়ের নিচের বালি সরে যাচ্ছিল। সেইসময় জেলেটি বল্ল, ‘বসে পরুন’। আমি হাঁটুর ওপর ভর দিয়ে বসে পড়লাম, শরীরটা যতটা উঁচু রাখা যায় সেভাবে। তাতে আমার বয়ে যাওয়াটা আটকাল। তখন সমুদ্রের বড়  ঢেউটা ফিরে গেছে আর নতুন ঢেউ তৈরি হচ্ছে। আমার গলা অবধি জল, বসে আছি। মিম্মাই তাখন জলে নেমে এসেছে। ও বলছে, ‘বাবাই,  দাঁড়িয়ে পড়’। আমি দাঁড়াব কি, তখনও ওখানে যা তোড়, দাঁড়ালেই তো  ভেসে যাব! মিম্মাইর যখন হাত বাড়াতে বাড়াতে আমার হাত অবধি পৌঁছুল, তখন ওরও হাঁটুর ওপরে জল। ওর হাত ধরে উঠে দাঁড়িয়ে যত তাড়াতাড়ি পারি জল ভেঙ্গে পারে এলাম।

পারে এসে দেখি সতুদা আর বৌদি তখনও চরাতে। ওদের গল্প আরও অনেক অনেক বেশী ভয়ঙ্কর। সে গল্প আরেকদিন বলব। শুধু এইটুকুই বলে রাখি, ওরাও  চিত্রগুপ্তের খাতায়  নতুন করে নাম লিখিয়েছে।

গ্যাংটক২২ জুলাই ২০১৮

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কোন ছবি দিতে পারলাম না। আমি যদিও  প্রাণ পেয়েছি,  কিন্তু  আমার  ফোনটি  বঙ্গোপসাগরের  জলে দেহ  রেখেছে।

“13 July 2018 – My Death Day” – Did Chitragupta suddenly update something?
First posted on July 22, 2018 by sitardivine

Huge waves in the sea. I was going under. I couldn’t hold my body steady—dragged by the current! My daughter asked a young girl on the shore, “Please help save my father.” The girl flatly refused, “No, Didi, I can’t.”

For some time, we’d been thinking of taking a small trip. After my daughter’s wedding, we hadn’t gone anywhere as a family. So we booked rooms at a charming guest house in Henry Island through Tipai. We reached just around dusk. Then—party time! We stayed up late, and around 4:45 in the morning, still not fully asleep, I got a call: “Want to go to the beach?” It was Mimmy. I got ready quickly, and we even woke up two drivers. My wife said she needed more time. My mother and Rushai were in another room. Rushai values her sleep dearly. So those three stayed back. The five of us—Satudada, Boudi, Tipai, Mimmy, and I—set off in a car. It dropped us in front of a bamboo bridge.

As we crossed the blue-and-white painted bridge, we could hear the sea. My heart leapt with joy, though the sea was not yet visible. I had recently bought a fancy phone, encouraged by Rushai and my wife, that took great photos and fit easily into a pocket—so I’d left the camera and iPad behind. We started clicking pictures, full of cheer. I took photos and happily admired them. Occasionally, I’d show them to Satudada or Boudi to fish for compliments. No point showing Tipai or Mimmy—they had better gadgets in their pockets!

Eventually, we reached the beach. There were big signboards everywhere—but who reads in paradise? I might’ve glanced, but nothing registered. Reaching the shore, we saw a shallow stream; across it lay a sandbar, and beyond that—the boundless sea, with the sun rising! The sea seemed to beckon, “Come to me.” All five of us splashed through the water to the sandbar. It was magical. Satudada and Tipai went further and wet their feet in the sea. I’d read up online beforehand and knew the area had quicksand. I had warned Rushai, who had just smiled—probably thinking, “Dad and his over-worrying!”

So I moved cautiously, testing the sand with every step. Soon, I found myself quite close to the sea, bursting with joy, taking picture after picture. Satudada struck dramatic poses, even wrapping an arm around Boudi for one. Tipai hates being photographed, but Boudi asked me to take some. I zoomed in from a distance, though not very successfully. I asked Tipai to come closer for a selfie. She didn’t mind. As her parents were also in the frame, she said, “Quick, take it before they leave!” I couldn’t fit Satudada in, but managed to capture Boudi.

By then, the tide had begun to rise. Tipai and Mimmy left for the morning’s necessities, splashing back across the water. The older folks were still on the sandbar, merrily chatting. After a while, I decided to return.

Turning back from the sea, I saw Mimmy and her mom already on the shore. That’s when I noticed how fast the tide was rising. I called out to Satudada, “Come back quickly!” But he didn’t seem to grasp the urgency. I started walking back with Boudi. We began shouting: “Come quickly! Hurry!”

When I reached the edge of the sandbar, the shallow stream had widened nearly fourfold. I wasn’t sure where to cross. Mimmy pointed to a narrower stretch, “Try that way.” But when we reached it, we saw the shoreline was eroding. I suddenly realized—the longer we delayed, the harder it would be to get back. Satudada was still far behind and unaware of the danger. I stepped in—knee-deep water, strong current. I tried walking as fast as I could. The water kept rising—knee, chest, neck, even higher. Salty water splashed into my mouth, and my feet lost contact with the ground.

I’d once learned “dog’s crawl” swimming in Dhakuria as a kid. Tried it—useless. My heavy body was being swept away. I surfaced and called out to a girl nearby for help. She said flatly, “No.” I shouted to Mimmy, “Run!” I saw my wife far away. The cross-current was eroding the sand under my feet rapidly. Then the girl said, “Sit down.” I knelt, keeping my body as upright as possible. That somehow stopped me from being swept away.

The biggest wave had passed, and a new one was building. I was neck-deep in water, just sitting. Mimmy had stepped in by then. She called out, “Babai, stand up!” But how could I? In that kind of current, I’d be gone in seconds. When her outstretched hand finally reached mine, the water was already above her knees. Holding her hand, I somehow stood up, waded through the water, and reached the shore.

On the shore, I saw Satudada and Boudi still stranded on the sandbar. Their story is even more terrifying. I’ll save that for another day. Let’s just say—they too had their names freshly entered into Chitragupta’s ledger.

Gangtok, July 22, 2018

Couldn’t share any photos. Though I survived, my phone now rests forever in the Bay of Bengal.


१३ जुलाई २०१८ मेरी मृत्यु तिथि” क्या चित्रगुप्त ने अचानक कुछ अपडेट किया?
प्रथम प्रकाशन: २२ जुलाई २०१८, sitardivine द्वारा

समुद्र में ज़बरदस्त लहरें थीं। मैं डूब रहा था, शरीर को भी संभाल नहीं पा रहा था, धारा खींचे लिए जा रही थी! किनारे की एक लड़की से मेरी बेटी बोली, “जरा आगे जाकर पापा को बचा लो।” लड़की बोली, “ना दीदी, मैं नहीं कर सकती।”

काफी दिनों से सोच रहे थे कि कहीं घूम आएं। बेटी की शादी के बाद हम सबने साथ कहीं जाना ही नहीं हुआ था। टाइपाई ने हेनरी आइलैंड की सुंदर गेस्टहाउस बुक कर दी। हम जब पहुँचे, तो शाम होने वाली थी। फिर तो पार्टी! सोते-सोते रात काफी हो गई। सुबह पौने पाँच बजे, नींद पूरी नहीं हुई थी, तभी फोन बजा: “बीच पर चलोगे?” मिम्माइ का फोन था। मैं जल्दी तैयार हो गया, दो ड्राइवरों को भी उठाया गया। मेरी पत्नी ने कहा, उन्हें थोड़ा समय लगेगा। माँ और रुशाइ दूसरे कमरे में थीं, वे तीनों वहीं रहीं। हम पाँच—सतुदा, बौदी, टाइपाई, मिम्माइ और मैं—गाड़ी में सवार होकर निकल पड़े। गाड़ी हमें एक बाँस के पुल तक छोड़ गई।

नीले-सफेद रंग वाले बाँस के उस पुल को पार करते ही समुद्र की आवाज़ कानों में पड़ी। दिल खुश हो गया, भले ही समुद्र अभी दिखाई नहीं दे रहा था। रुशाइ की पसंद और पत्नी की सलाह पर एक महँगा फोन लिया था। वही काफी अच्छा फोटो लेता था और जेब में भी आसानी से आ जाता था, तो कैमरा और iPad साथ नहीं लाया। धड़ाधड़ फोटो खींचने लगे। खुद ही फोटो लेता, खुद ही खुश होता। बीच-बीच में तारीफ पाने के लिए कभी सतुदा, कभी बौदी को दिखाता। मिम्माइ और टाइपाई को दिखाने का कोई मतलब नहीं, उनके पास तो और भी अच्छे डिवाइस थे।

आख़िरकार हम बीच तक पहुँच ही गए। वहाँ बड़े-बड़े साइनबोर्ड लगे थे। लेकिन इतनी सुंदरता के बीच कौन पढ़ाई करता है? शायद पढ़ा था, लेकिन दिमाग में कुछ गया नहीं।

समुद्र तट पर थोड़ा पानी था, उसके पार एक रेत की पट्टी, और फिर क्षितिज तक फैला समुद्र—जिसमें सूरज उग रहा था! समुद्र जैसे बुला रहा था, “आ जाओ।” हम पाँचों छप-छप करते हुए रेत की पट्टी पर पहुँच गए। दिल खुश हो गया। सतुदा और टाइपाई आगे बढ़कर समुद्र में पैर डुबोए। मैंने इंटरनेट पर पहले पढ़ा था कि वहाँ दलदल है। बच्चों का मन मजबूत होता है, रुशाइ से कहा तो वो मुस्कुरा दी—शायद मन ही मन कहा, “पापा का कोई इलाज नहीं!”

मैं बहुत सावधानी से कदम रख रहा था ताकि नर्म बालू का अंदाज़ा लगा सकूं। देखा तो समुद्र के पास पहुँच ही गया। तस्वीरें खींचने लगा। सतुदा अलग-अलग पोज़ में फोटो खिंचवाने लगे, एक तो बौदी को आधा गले लगाकर भी। टाइपाई को फोटो नहीं खिंचवानी थी, लेकिन बौदी बोलीं, कुछ तस्वीरें ले लो। ज़ूम करके जितना हो सका, लिया। फिर कहा, “पास आ जा, एक-दो सेल्फी ले लूं।” टाइपाई मान गई। स्क्रीन पर उसके माता-पिता भी आ रहे थे, बोली, “जल्दी लो, वो भी आ जाएं तस्वीर में।” सतुदा को नहीं ला सका, पर बौदी आ गईं।

तभी समुद्र धीरे-धीरे बढ़ने लगा। टाइपाई और मिम्माइ वापस ज़रूरत से लौट गईं। हमारे बुज़ुर्ग रेत पर गपशप कर रहे थे। कुछ देर बाद लगा, अब लौटना चाहिए।

पीछे मुड़ा तो देखा मिम्माइ और उसकी माँ किनारे आ चुकी थीं। तभी समझ में आया कि समुद्र तेज़ी से चढ़ रहा है। सतुदा को आवाज़ दी, “जल्दी आओ!” शायद उन्हें खतरे की गंभीरता समझ नहीं आई। मैं बौदी के साथ वापस चल पड़ा। हम दोनों ज़ोर से चिल्लाने लगे, “जल्दी आओ, जल्दी!”

रेत की पट्टी के छोर पर देखा कि पहले जो थोड़ा पानी था, अब वो चार गुना चौड़ा हो गया है। कहाँ से पार करें, समझ नहीं आ रहा था। मिम्माइ ने कहा, “उधर से आओ,” वो हिस्सा थोड़ा कम चौड़ा था। वहाँ गए तो देखा, किनारा टूट रहा है। तब समझ में आया, जितनी देर होगी, तट तक पहुँचना उतना ही मुश्किल हो जाएगा। सतुदा अभी भी दूर थे, खतरे को शायद नहीं समझ रहे थे। मैंने उतरते ही देखा, पानी घुटनों तक था और बहाव तेज़। तेज़ी से चलने लगा। आगे बढ़ते-बढ़ते पानी घुटनों से छाती, फिर गले, फिर उससे ऊपर तक चला गया। मुँह में खारा पानी घुस रहा था, पैर ज़मीन से उखड़ चुके थे।

बचपन में ढाकुरिया में “डॉग्स क्रॉल” तैरना सीखा था, कोशिश की—कोई फ़ायदा नहीं। समुद्र मुझे बहाए ले जा रहा था। जब सिर ऊपर आया, तो उस लड़की से मदद माँगी—उसने साफ़ मना कर दिया। मिम्माइ से बोला, “तू दौड़।” पत्नी को देखा—वो काफी दूर थी। धारा के ज़ोर में बहुत तेज़ी से रेत खिसक रही थी। तभी लड़की बोली, “बैठ जाइए।” मैं घुटनों के बल बैठ गया, शरीर को जितना ऊपर रख सकूं, रखा। इससे बहाव रुक गया।

बड़ी लहर लौट चुकी थी और नई बनने लगी थी। मेरा गला तक पानी में डूबा था, मैं बैठा था। मिम्माइ पानी में आ चुकी थी। वो बोली, “बाबाई, खड़े हो जाओ।” लेकिन मैं कैसे खड़ा होता! बहाव इतना तेज़ था कि खड़े होते ही बह जाता। जब उसका हाथ मेरे हाथ तक पहुँचा, तब तक पानी उसके घुटनों के ऊपर था। उसका हाथ पकड़कर जैसे-तैसे खड़ा हुआ और पानी चीरते हुए किनारे पर आ गया।

किनारे आकर देखा, सतुदा और बौदी अभी भी रेत पर थे। उनका अनुभव और भी डरावना था। वो कहानी फिर कभी। बस इतना कह दूँ—उनके नाम भी चित्रगुप्त की डायरी में फिर से दर्ज हो गए हैं।

गैंगटोक, २२ जुलाई २०१८
–––
कोई फोटो नहीं दे सका। मैं तो बच गया, लेकिन मेरा फोन बंगाल की खाड़ी के जल में अपनी देह छोड़ गया।

Macmillan Publishers and Dadu’s Pen

First Posted on November 15, 2012 by sitardivine

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Raisaheb Rajendra Lal Banerjee

It was mid 80′s. I first chanced to have a glimpse of Dadu’s book on one of the many bookshelves at Anjanda’s house1. The two-storied building is so much packed with books that once you go in you have to almost breathe through the books. I always enjoyed this academic ambiance. Till then I did not know that Macmillan Publishers took interest in Dadu’s pen. I was very glad to discover this! I saw Dadu, my grandpa, as a saintly person in saffron, a person of very high reverence. I saw him with a long white beard. A person who had a very simple Bengali diet served with western cutleries. A spoon, a fork, and a knife to savor machher jhol, bhaat, khichudi or shukto! Isn’t it interesting? I witnessed him spending time in reading the slokas from the Bhagavat Geeta loudly or copying the Geeta with his wooden-handled pen-nib taking ink from an ink-pot or running charkha or writing letters to his sons in English! I hear that one of his pass-time was to multiply nine digits with nine digits and directly get the answer without a pen and paper. What an unusual combination of activities!!

Back to the main story. McMillan published ‘Mensuration and Elementary Surveying’ by Raisaheb R.L. Banerjee. Another book titled ‘Elements of Surveying and Relaying’ was first published in January 1926 from The Art Press, Calcutta. Here is the book in pdf format. Thanks to my dear Anjanda who very kindly allowed me to digitize the copy of the book in his collection.

Writing continues…

When I was happy to be able to lay my hands on one of Dadu’s books, I felt a bit uncomfortable without any link to his Macmillan publication. I faintly remembered that I saw the cardboard covers of that book in a huge wooden box at Ramnagar (3). I also remembered that I had a piece of the outer bind of that book. I tried to find that but could not locate it easily. Last week [last week of November 2012] I was talking to Dada (2) over the phone. He was writing on Banerjee’s and was Mensuration & Elementary Surveying

looking for as many details as he could. He was happy that I digitized Dadu’s book. He asked me if Dadu wrote something about himself in that book and so on. During the discussion, I mentioned to him Dadu’s Macmillan publication. He immediately said that he had a copy. It was really very exciting! I asked him if I could digitize the book. He readily agreed. Finally, he brought the book today. (4) I set the light, the camera, and all… my tiny DIY set-up [Do It Yourself set-up]. Dada turned the pages, put the glass sheet over the pages and I went on clicking my LUMIX. Finally, I had all the snaps and took the files to the computer. The thing got ready shortly for uploading. and here it is… Here is Dadu’s book Mensuration and Elementary Surveying by R.L. Banerjee [Rai Sahib], published by Macmillan & Co.,  Ltd, St. Martin’s Street, London published in 1934

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Four years have passed by since I wrote the upper part of this page. Today is Bijoya – 2016, the precise date is October 11. We were frantically searching for some horoscopes in all our cupboards, drawers, and all possible places—but failed to find them. Suddenly, I saw a postcard and became curious why we might have kept it with so much care! Then, I discovered that it was written by Dadu. I saw that the postcard space was divided into three sections. The first part was a letter to his youngest son—that was my father, this brief next part to his six-year-old grandson—that was I, and the third part was used for writing to his daughter-in-law—that was my mother.  Today, in 2016, it is also interesting to see the 5 paise postcard and our Behala address written to fill the address space. I would like to share the image. Here it goes—

(1) Anjan Chakravarty is a very serious book collector. He is my brother-in-law and married to my cousin-sis Arundhati [Banudi]

(2) Mahiruha Shekhar Banerjee [widely known as M.S. Banerjee]

(3) Ramanagar was our farmhouse near Bangaon. Click for some details.

(4) 02 December 2012

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Here is the translation of the given passage in:


প্রথম প্রকাশ – ১৫ নভেম্বর, ২০১২ | লেখক: sitardivine

সেটা আশির দশকের মাঝামাঝি। প্রথমবার একদিন আমি দাদুর বইটা দেখেছিলাম অঞ্জনদার বাড়ির এক বইয়ের তাকের ওপর। দুই তলা ওই বাড়িটা এত বইয়ে ভর্তি ছিল যে একবার ঢুকলে মনে হত যেন বইয়ের মধ্য দিয়েই নিঃশ্বাস নিতে হচ্ছে! আমি সবসময়ই এই রকম একাডেমিক পরিবেশ উপভোগ করতাম। তখনও জানতাম না যে ম্যাকমিলান পাবলিশার্স দাদুর লেখায় আগ্রহ দেখিয়েছিল। এটা জেনে আমি খুব আনন্দিত হয়েছিলাম!

আমি দাদুকে দেখেছিলাম গেরুয়া কাপড় পরা এক সাধুর মতো মানুষ হিসেবে, অত্যন্ত শ্রদ্ধার পাত্র। তাঁর সাদা লম্বা দাড়ি ছিল। তিনি খুবই সাধারণ বাঙালি খাবার খেতেন, তবে তা খেতেন পশ্চিমী ছুরি-চামচ-কাঁটা চামচ দিয়ে! একটা চামচ, একটা ফর্ক আর একটা ছুরি দিয়ে মাছের ঝোল, ভাত, খিচুড়ি বা শুক্তো খাওয়া—অদ্ভুত লাগে না? আমি দেখেছি তিনি গীতা পাঠ করতেন উচ্চস্বরে, কখনও কাঠের হ্যান্ডেলওয়ালা কলমে হাতে লিখতেন, কালির পাত্রে কলম ডুবিয়ে, কখনও চরকা কাটতেন, কখনও বা ছেলেদের ইংরেজিতে চিঠি লিখতেন। শুনেছি, তাঁর শখ ছিল ৯ সংখ্যার সাথে ৯ সংখ্যার গুণফল মুখে মুখে করে ফেলা—কলম-কাগজ ছাড়াই! কী অদ্ভুত সব কাজে নিজেকে নিয়োজিত করতেন!

আসল গল্পে ফিরি। ম্যাকমিলান প্রকাশ করেছিল ‘মেনজুরেশন অ্যান্ড এলিমেন্টারি সার্ভেয়িং’ বইটি, লেখক ছিলেন রাইসাহেব আর.এল. ব্যানার্জি। অন্য একটি বই, ‘এলিমেন্টস অফ সার্ভেয়িং অ্যান্ড রিলেয়িং’, প্রথম প্রকাশিত হয় ১৯২৬ সালের জানুয়ারিতে, আর্ট প্রেস, কলকাতা থেকে। এখানে সেই বইয়ের পিডিএফ রূপ আছে। ধন্যবাদ প্রিয় অঞ্জনদাকে, যিনি বইটা ডিজিটাইজ করতে দিয়েছিলেন।

লেখা চলছেই…

যখন দাদুর একটা বই হাতে পেলাম, খুব আনন্দ হয়েছিল, তবে ম্যাকমিলানের প্রকাশনার কোনো সংযোগ পাচ্ছিলাম না বলে খানিকটা অস্বস্তিও লাগছিল। মনে পড়ল, একটা কাঠের বড় বাক্সে, রামনগরে বইটার কার্ডবোর্ড কভার দেখেছিলাম কোনো এক সময়ে। মনে হল, বাইন্ডিংয়ের একটা অংশও হয়তো আমার কাছে ছিল। খুঁজে দেখলাম, কিন্তু সহজে পেলাম না।

নভেম্বর ২০১২-এর শেষ সপ্তাহে আমি দাদার (মহীরুহ শেখর ব্যানার্জি) সঙ্গে ফোনে কথা বলছিলাম। তিনি তখন ব্যানার্জিদের নিয়ে কিছু লিখছিলেন, আর সেই ‘মেনজুরেশন অ্যান্ড এলিমেন্টারি সার্ভেয়িং’ নিয়ে যতটা সম্ভব তথ্য খুঁজছিলেন। শুনে খুশি হলেন যে আমি দাদুর বইটা ডিজিটাইজ করেছি। জিজ্ঞাসা করলেন দাদু কি নিজের সম্বন্ধে কিছু লিখেছিলেন সেই বইয়ে। আলোচনার সময় আমি দাদুর ম্যাকমিলান প্রকাশিত বইয়ের কথা বললাম। সঙ্গে সঙ্গে বললেন, তাঁর কাছে একটা কপি আছে! কী উত্তেজনা! আমি জিজ্ঞেস করলাম, বইটা আমি কি ডিজিটাইজ করতে পারি? সঙ্গে সঙ্গে রাজি হয়ে গেলেন।

অবশেষে, ২ ডিসেম্বর ২০১২-তে, তিনি বইটা নিয়ে এলেন। আমি আলো, ক্যামেরা আর আমার ছোটখাটো DIY সেট-আপ প্রস্তুত করলাম। দাদা পাতা উল্টে দিচ্ছিলেন, আমি কাঁচের শিট পাতা উপর রেখে LUMIX ক্লিক করতে থাকলাম। সব ছবি তুলে ফাইল কম্পিউটারে নিলাম। আর তৈরি হয়ে গেল আপলোডের জন্য।

এই রইল দাদুর বই –
Mensuration and Elementary Surveying
লেখক: R.L. Banerjee (Rai Sahib)
প্রকাশক: Macmillan & Co. Ltd., St. Martin’s Street, London
প্রকাশকাল: ১৯৩৪

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এই পাতাটার ওপরের অংশ লিখে চার বছর কেটে গেছে। আজ বিজয়া, ২০১৬, দিনটা ১১ অক্টোবর। আমরা ঘর-বাড়ির সব আলমারি, ড্রয়ার ও সম্ভাব্য সব জায়গায় খুঁজছিলাম কিছু জন্মপত্রিকা—কিন্তু কোথাও পেলাম না। হঠাৎ একটা পোস্টকার্ড চোখে পড়ল, ভাবলাম এত যত্ন করে এটা কেন রেখে দিয়েছি?

তারপর দেখলাম, সেটা দাদুর লেখা! পোস্টকার্ডটা তিন ভাগে বিভক্ত ছিল। প্রথম অংশটা তাঁর ছোট ছেলেকে উদ্দেশ্য করে লেখা—সে আমার বাবা, মাঝের ছোট অংশটা ছয় বছরের নাতি—অর্থাৎ আমাকে উদ্দেশ্য করে, আর তৃতীয় অংশটা পুত্রবধূর জন্য—অর্থাৎ আমার মাকে লেখা।

আজ ২০১৬ সালে দাঁড়িয়ে, সেই ৫ পয়সার পোস্টকার্ড আর বেহালার ঠিকানা দেখে মনে হল একটা টুকরো ইতিহাস চোখের সামনে চলে এল। তার একটা ছবি এখানে দিচ্ছি—


प्रथम प्रकाशन – 15 नवम्बर, 2012 | लेखक: sitardivine

यह बात है 1980 के दशक के मध्य की। पहली बार मैंने दादू की किताब की एक झलक अंजनदा के घर की एक शेल्फ में देखी। वह दो-मंजिला मकान इतना ज़्यादा किताबों से भरा हुआ है कि एक बार अंदर चले गए तो ऐसा लगता है जैसे किताबों के बीच से साँस लेनी पड़ रही हो। मुझे हमेशा से ऐसा अकादमिक माहौल बहुत पसंद रहा है। तब तक मुझे यह जानकारी नहीं थी कि मैकमिलन पब्लिशर्स ने दादू की कलम में रुचि दिखाई थी। यह जानकर मैं बेहद प्रसन्न हुआ!

मैंने दादू को हमेशा गेरुए वस्त्रों में, एक तपस्वी जैसे देखा था—बेहद श्रद्धेय व्यक्तित्व। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी थी। वे बिल्कुल साधारण बंगाली खाना खाते थे, पर पश्चिमी चम्मच, कांटे और चाकू से! सोचिए, माछेर झोल, भात, खिचुड़ी या शुक्तो—इन सबको चम्मच-छुरी-कांटे से खाना! मज़ेदार नहीं है?

मैंने उन्हें भगवद्गीता के श्लोक ऊँचे स्वर में पढ़ते, लकड़ी की हैंडलवाली निब से लिखते, दवात में डुबाकर, चरखा चलाते या अपने बेटों को अंग्रेज़ी में पत्र लिखते देखा है। मैंने यह भी सुना है कि उनका एक शौक था—नौ अंकों से नौ अंकों का गुणा करना, बिना काग़ज़-कलम के सीधे उत्तर बता देना! क्या विचित्र संगम था उनके व्यक्तित्व में!

अब लौटते हैं मुख्य कथा पर। मैकमिलन ने ‘Mensuration and Elementary Surveying’ नामक किताब प्रकाशित की थी, लेखक थे रायसाहेब आर.एल. बनर्जी। एक और किताब ‘Elements of Surveying and Relaying’ जनवरी 1926 में द आर्ट प्रेस, कलकत्ता से प्रकाशित हुई थी। यहां उस पुस्तक की पीडीएफ प्रति है। इस पुस्तक को डिजिटाइज करने की अनुमति देने के लिए मैं अपने प्रिय अंजनदा का आभारी हूँ।

कहानी आगे बढ़ती है…

जब मुझे दादू की किताब हाथ लगी, तो बहुत खुशी हुई, लेकिन मैकमिलन वाली किताब से कोई कड़ी न होने के कारण थोड़ी सी असहजता भी हुई। मुझे हल्का-हल्का याद था कि रामनगर के एक बड़े लकड़ी के बॉक्स में उस किताब के कार्डबोर्ड कवर देखे थे। मुझे यह भी याद आया कि उस किताब की बाहरी जिल्द का एक हिस्सा मेरे पास था। मैंने खोजने की कोशिश की, पर वह आसानी से नहीं मिला।

नवम्बर 2012 के अंतिम सप्ताह में मेरी फोन पर बात हुई दादा (महिरुह शेखर बनर्जी) से। वे बनर्जी परिवार पर कुछ लिख रहे थे और ‘Mensuration and Elementary Surveying’ पर अधिक से अधिक जानकारी खोज रहे थे। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि मैंने दादू की किताब डिजिटाइज कर दी है। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या दादू ने उस किताब में अपने बारे में कुछ लिखा था। बातचीत के दौरान मैंने दादू की मैकमिलन वाली किताब का जिक्र किया। उन्होंने तुरंत कहा कि उनके पास एक प्रति है! कितना रोमांचक क्षण था वह! मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं उस किताब को डिजिटाइज कर सकता हूँ? उन्होंने तुरंत अनुमति दे दी।

अंततः, 2 दिसंबर 2012 को, वे किताब लेकर आए। मैंने लाइट, कैमरा और अपनी छोटी सी DIY सेट-अप तैयार की। दादा पन्ने पलटते गए, मैंने पन्नों पर कांच रखकर अपनी LUMIX से क्लिक करता गया। सारे चित्र लेकर फाइल्स को कंप्यूटर में ट्रांसफर कर दिया और अपलोड के लिए तैयार कर लिया।

यह रही दादू की किताब –
Mensuration and Elementary Surveying
लेखक: आर. एल. बनर्जी (राय साहिब)
प्रकाशक: मैकमिलन एंड कंपनी लिमिटेड, सेंट मार्टिन्स स्ट्रीट, लंदन
प्रकाशन वर्ष: 1934

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इस पृष्ठ का ऊपरी हिस्सा लिखे चार साल हो गए। आज है विजया – 2016, तारीख है 11 अक्टूबर। हम सब अलमारी, दराज़ें, और हर संभव जगह पर कुछ कुंडली खोज रहे थे—पर नहीं मिली। तभी अचानक मुझे एक पोस्टकार्ड दिखा और जिज्ञासा हुई कि इसे इतने जतन से क्यों रखा गया है!

फिर पता चला कि यह दादू द्वारा लिखा गया था। पोस्टकार्ड को तीन हिस्सों में बाँटा गया था—पहला हिस्सा उनके सबसे छोटे बेटे को, यानी मेरे पिता को लिखा गया था; अगला छोटा हिस्सा उनके छह वर्षीय पोते—यानी मुझे संबोधित था; और तीसरा हिस्सा उनकी बहू—यानी मेरी माँ को।

2016 में खड़े होकर वह 5 पैसे का पोस्टकार्ड और हमारे बेहाला वाले पते को देखना एक अनूठा अनुभव था। मैं उसकी छवि साझा करना चाहता हूँ—


সেতার, বেড়াল ও জেসপা

First posted on May 13, 2014 by sitardivine

তখন আমরা ২০ বিধান পল্লীর বাসাবাড়ীতে থাকি. ওখানে রেলগাড়ীর ডিব্বার মত সারি দেওয়া তিনটে ঘর ছিল, তারপর রান্নাঘর আর এছাড়া একটা ঘর একটু আলাদা, সেখানে আমি রেয়াজ করতাম| সেদিন পাপা বাড়িতে, আমিও সেতার নিয়ে মাঝের বড় ঘরে চলে এসেছি| পাপা খাটে শুয়ে আছেন আর আমি মেঝেতে বসে বাজাচ্ছি| সে সময় বেশ বেড়ালের উৎপাত ছিল, আর মনে হয় বেড়ালের পপুলেশনও বেশ বেশি ছিল| কারণ খুব স্পষ্ট| এখান আর অত ঘন ঘন বেড়াল চোখে পড়েনা| যদিও বেড়াল পরিসংখ্যান কোথাও তেমন করে দেখিনি, তবে এ কথা নিজের অভিজ্ঞতা থেকে হলফ করে বলতে পারি| অন্য একটা সম্ভাব্য কারণ অবশ্য, বেড়াল সম্প্রদায়ের বুদ্ধি ক্রমশঃ কমে যাচ্ছে| এ সম্পর্কে বেড়ালবিদ পন্ডিতেরা আরও ভাল বলতে পারবেন| আমি যে কথা বলতে চাইছিলাম তা হচ্ছে মাছ, দুধ ইত্যাদি বেড়ালের জিভে না পৌঁছে যাতে আমাদের জিভ স্পর্শ করে তারই জন্য আমাদের জানালার শিক্গুলোতে লোহার তার লাগান হয়েছিল| খুব যে ঘন তা নয়, তবে সাধারণ বেড়ালের সাইজ থেকে বেশ ছোট|

আমার কোনদিন সেতারি হয়ে ওঠার ব্যাপারে পাপার প্রবল সন্দেহ ছিল| বলতেন, “এত নরম হাতে সেতার কি বাজবে, ডা-রাই বাজাতে পারিসনা|” এছাড়াও গান-বাজনার লাইনে এপাশ-ওপাশ থেকে গুঁতো খেয়ে গান-বাজনা পেশাদারী সম্পর্কে ওঁর অনেক বিপরীত বক্তব্য ছিল| তবে শেখাতে কার্পন্য করেননি| একটু এপাশ ওপাশ হলেই ভুল ধরিয়ে দিতেন|

সেদিন রেয়াজ করছি, বেশ মন দিয়েই বাজাচ্ছিলাম|সেতারে জোরে ঠোক মেরে রা-রা বাজাতে বেশ ভাল লাগত| মনের খুশিতে হঠাৎ মেরে দিলাম জোরসে ঠোক, তারপরেই ঘটে গেল সে ভীষণ ব্যাপার| দেখি, কিছু একটা সাদা লম্বাকার জিনিস পিঠে ধাক্কা দিয়ে, সেতারে ধাক্কা মেরে তীব্র গতিতে জানালার ফোকর দিয়ে ছিটকে বেরিয়ে গেল| তাকিয়ে দেখি তারের একটা ফোকড় বেশ কিছুটা বড় হয়ে গেছে আর তার চারদিকে সাদা লোম| পাপাও হঠাৎআওয়াজে ধড়মড়িয়ে উঠে বসলেন| সব কান্ড বুঝে চিৎকার করে উঠলেন, “দেখছিস তোর বাজনার বহর, বেড়াল কিভাবে ভয় পেয়ে পালাচ্ছে? বেড়ালের যদি এই হয় তাহলে মানুষের কি হবে ভাবতে পারছিস?” আমি কিছুটা মুষড়ে পড়লেও বাজনা থামালামনা|

এরপর বেশ কয়েক বছর কেটে গিয়েছে| আমি তখন লম্বা সময় ধরে রেয়াজ করি| নানা জায়গায় বাজাতেও শুরু করেছি| সে সময় কালীবাড়ী লেন-এ ওস্তাদজীর বাড়ির পরের গলিতেই একটা টিউশনি পেয়ে গেলাম| ছাত্রের নাম ‘দোলন’| সে আমার থেকে বয়সে অনেকটা বড় হলেও তা কখনও বুঝতে দেয়নি| ছাত্র-শিক্ষক সম্বন্ধের যথেষ্ঠ সম্মান করত| ওকে আমি বলতাম ‘ছাত্র বাবু’| সেই ছাত্র বাবুর একটা পেল্লাই সাইজের ডোবারমেন কুকুর ছিল| নাম ছিল ‘জেসপা’| দারুন স্মার্ট| একদিন শেখাতে  পৌঁচেছি, দেখি জেসপার মেজাজ খুব গরম| খুব জোরে চেঁচিয়ে চলেছে| অনেক চেষ্টা করেও তাকে শান্ত করা যাচ্ছেনা| ছাত্র বাবু, তার স্ত্রী, সবাই অনেক চষ্টা করে হাল ছেড়ে দিলেন| আমি ভাবলাম একটা পরীক্ষা করে দেখা যাক্| গুরুর নাম নিয়ে আমি সেতার হাতে তুলে হাল্কা করে আলাপ বাজাতে শুরু করলাম| অবাক কান্ড! কিছুক্ষনের মধ্যেই জেসপা-র চিৎকার কমে গেল, তারপর চুপ করে শুয়ে পড়ল| এ ত ম্যাজিক!! গুরুদের মুখরক্ষা হ’ল, অল্প হলেও আমার গুরুদের সেখান বিদ্যে কাজে লেগে গেল|

Hindi Translation

सितार, बिल्ली और जैस्पा
(पहली बार पोस्ट किया गया – 13 मई, 2014, sitardivine द्वारा)

उस समय हम 20 विधान पल्ली के मकान में रहते थे। वहाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह लाइन में तीन कमरे थे, फिर रसोई, और एक अलग कमरा जहाँ मैं रियाज़ करता था। उस दिन पापा घर पर थे, और मैं सितार लेकर बीच वाले बड़े कमरे में आ गया। पापा खाट पर लेटे हुए थे, और मैं फर्श पर बैठकर सितार बजा रहा था।

उन दिनों बिल्लियों का खासा आतंक था — लगता है बिल्ली जनसंख्या भी काफी अधिक थी। कारण बहुत स्पष्ट है, अब वैसी बिल्ली की भरमार नहीं दिखती। हालांकि बिल्ली जनगणना कहीं नहीं देखी, लेकिन अपने अनुभव से पूरी शपथ लेकर कह सकता हूँ। एक और संभावना भी है: शायद बिल्ली जाति की बुद्धि धीरे-धीरे घटती जा रही है — इस पर ‘बिल्लीतत्व’ के विशेषज्ञ पंडित ज़्यादा प्रकाश डाल सकते हैं।

मैं जो बात कहना चाहता था वह ये कि मछली, दूध वगैरह बिल्लियों की जीभ तक न पहुँच जाए और हमारे ही हिस्से में आए — इस उद्देश्य से हमने खिड़कियों पर लोहे की तार लगवाई थी। तारें बहुत घनी नहीं थीं, पर एक औसत बिल्ली के लिए अंदर घुसना मुश्किल था।

मेरे सितारी बनने को लेकर पापा को हमेशा संदेह था। कहते, “इतने नरम हाथों से सितार क्या बजेगा? डा-रा भी ढंग से नहीं बजा पाता।”
गायन-वादन को पेशेवर रूप से अपनाने को लेकर उनके विचार काफ़ी विरोधी थे — शायद उन्होंने इधर-उधर से ठोकरें खाई थीं। फिर भी उन्होंने सिखाने में कोई कंजूसी नहीं की। ज़रा सी भी चूक होती तो तुरन्त पकड़ लेते।

उस दिन मैं रियाज़ में डूबा हुआ था। सितार पर ज़ोर से ठोक कर ‘रा-रा’ बजाने में बड़ा आनंद आ रहा था। मन के उत्साह में मैंने एक ज़ोर की ठोक दी… और तभी हुआ एक अजीब हादसा!
देखता हूँ — एक लंबी सफेद आकृति मेरी पीठ से टकराकर, सितार पर धक्का मारकर खिड़की की सलाखों के बीच से बिजली की गति से निकल गई! देखा, खिड़की की तार का एक हिस्सा अब काफ़ी बड़ा हो चुका था और वहाँ सफेद बालों का गुच्छा चिपका था।

पापा भी उस तेज़ आवाज़ से चौंककर उठ बैठे। जब पूरी घटना समझ में आई तो झल्लाकर बोले,
“देख रहा है तेरी बजाने की धाक? बिल्ली डर के मारे भाग गई! अगर बिल्लियों की ये हालत है तो सोच इंसानों का क्या होगा?”
मैं थोड़ा मायूस ज़रूर हुआ, पर बजाना बंद नहीं किया।

इसके कई साल बाद की बात है। अब मैं घंटों रियाज़ करता, और अलग-अलग जगहों पर बजाने भी लगा था।
इसी दौरान मुझे कालिबाड़ी लेन में उस्ताद जी के घर के पास एक ट्यूशन मिल गई। छात्र का नाम था दोलन। उम्र में मुझसे काफ़ी बड़ा था, लेकिन व्यवहार में उसने कभी इसका अहसास नहीं होने दिया। छात्र-गुरु के रिश्ते का पूरा सम्मान करता था। मैं उसे ‘छात्र बाबू’ कहता था।

उस छात्र बाबू का एक बहुत बड़ा डॉबरमैन कुत्ता था — नाम था जेस्पा। बड़ा स्मार्ट जानवर था।
एक दिन मैं सिखाने पहुँचा तो देखा जेस्पा का मूड बहुत गर्म है। ज़ोर-ज़ोर से भौंक रहा है।
छात्र बाबू, उनकी पत्नी — सबने बहुत कोशिश की, लेकिन वो शांत नहीं हो रहा था।
मैंने सोचा, एक प्रयोग करते हैं।

गुरु का नाम लेकर मैंने सितार उठाया और हल्के सुरों में आलाप बजाना शुरू किया।
हैरत की बात! कुछ ही पलों में जेस्पा की आवाज़ धीमी पड़ने लगी — फिर एकदम शांत होकर ज़मीन पर लेट गया।

ये तो जादू था!
गुरुजनों की लाज रह गई — और थोड़ा-बहुत सही, उनकी दी हुई विद्या ने अपना काम कर ही दिया!

শোনা শুরু

First posted on May 13, 2014 by sitardivine

তখন আমি বেশ ছোট| অল্পদিনের মধ্যেই সব জামা-কাপড় কেমন যেন আঁটোসাঁটো হয়ে উঠত, জুতোর তো কথাই নেই| কাজেই, জুতো, পাতলুন, কামিজ সবই কেনা হোত দু-সাইজ বড় | দুর্গাপূজো এলেই এ-দোকান সে-দোকান, নানা রঙের জামা কাপড়ের ভীড়, আর তার মধ্যেই কয়েকটা পেয়ে যাওয়া, বেশ খুশী হতাম| পড়াশুনোর রোজকার চাপাচাপি থেকেও কিছুদিন রেহাই পেতাম| খুব ভালো লাগত প্যান্ডেলে-প্যান্ডেলে বাজতে থাকা মাইকের গান| তখন গ্রামোফোন এ গোল-গোল কালো চাকতি চালিয়ে গান বাজান হোত| ‘খোয়া খোয়া চাঁদ’, প্যার কিয়া তো ডরনা কেয়া, আই আই ইয়া করুঁ ম্যায় কেয়া সুকু সুকু’, আরও কত কি! বাড়ীতে এসব সুন্দর মিষ্টি গান শোনার ওপর কড়া সেন্সর ছিল|এসব নাকি খেলো গান, শুনলেই ছেলে বয়ে যাবে! জ্যাঠার বাড়িতে একটা ঢাউস রেডিওগ্রাম ছিল| সেখানে আটটা চাকতি চাপিয়ে দিলে একটার পর একটা বাজতে থাকত| সেখানে ফৈয়াঁজ খাঁন, আব্দুল করিম খাঁন, কেসরবাঈ, বড়ে গুলাম, ভীস্মদেব, তারাপদ বাবু, গওহরজান, জ্ঞান গোঁসাই, সুধীরলাল চলত|আমার কিন্তু ওই ‘খোয়া খোয়া চাঁদ’-ই বেশী ভাল লাগত|

আমরা তখন থাকি ৩৬বি বেচারাম চ্যাটার্জ্জী রোডের ভাড়াবাড়িতে তে| পারে সে বাড়ির নম্বর বদলে ২৮ হয়েছিল| বাড়ীতে একটা মাঝারি সাইজের মারফি রেডিও এল| কি যে আনন্দ হয়েছিল বলে বোঝান মুস্কিল| ভাবলাম এ বেশ ভাল হোল, মজা করে গান শোনা যাবে| কিন্তু পারে বুঝলাম ‘সে গুড়ে বালি’| সে কথাই বলছি শুনুন|

তখন সবে পূজো-প্যান্ডেলের ম্যারাপ বাঁধা শুরু হয়েছে|নতুন শরৎ এর রোদ্দুরে শুধু খুশী আর খুশী, ইস্কুল বন্ধ হবে হবে ভাব| সেদিন রবিবার, গেলাম পাশের বাড়ীর অমলদার কাছে| সেখানে গিয়ে দেখি সে মহানন্দে হিন্দি গান শুনছে, মানে ওই হিন্দী সিনেমার গান| আমি ত’ অবাক! অমলদাকে তো কেউ বকছেনা! আরও অবাক হলাম, রেডিওতে সেই মাইকের গানগুলোই বাজছে| আমার জানা স্টেশন থেকে এসব গান শোনা যেতনা| আমি তো শুধু সকালে আর রাতে ওই না-ভালো-লাগা গানবাজনা আর খবর শুনতে পেতাম| অমলদাকে সটান প্রশ্ন করলাম, “অমলদা, তুমি ওই মাইকের গানগুলো রেডিওতে কি করে শুনছ?” সোজা উত্তর এল, “আরে নতুন একটা স্টেশন হয়েছে ‘বিবিধ ভারতী’, সেখানেই শোনা যায়|” এটা বোধহয় ষাটের দশকের শুরুর দিকের কথা| দেখে আসলাম স্টেশন কি করে ধরা যায়| অমলদা বুঝিয়ে দিল, স্টেশন ধরার কাঁটা-টা এক্কেবাব্রে ডানদিকে নিয়ে গিয়ে অল্প-স্বল্প নাড়ালেই ‘বিবিধ ভারতী’|আমাকে আর পায় কে! আমি তো নাচতে নাচতে বাড়ি ফিরলাম|

সেসময় ‘বিবিধ ভারতী’ এখনকার মত সারাদিন ধরে চলতনা, তাই কিছুক্ষণ অপেক্ষা করতে হোল| দুপুর একটা নাগাদ রেডিও অন করে কিছুক্ষণ খোঁজাখুজি করতেই আমার সাধের স্টেশন এর নাগাল পেয়ে গেলাম| সে কি আনন্দ! গানের পার গান চলতে লাগল| সে-সময় পিসি আমাদের সাথেই থাকত| হঠাৎ পিসির গলা কানে এল, “এসব কি লারেলাপ্পা শোনা হইতাসে?” রেডিওর আওয়াজ কিছুটা কমিয়ে দিয়ে কথাটা শুনিনি শুনিনি করে রইলাম| কিছুক্ষণ পার পিসির ধৈর্যের বাঁধ ভেঙে গেল, “পোলাডা এক্কেরে অপগন্ড হইসে| বাপে রবিশঙ্করের ছাত্র আর পোলায় শোনে লারেলাপ্পা| দেইখ্যা আয়, তর সোট ভাই কিটু, হেয়ায় ক্যামন মাথা নাড়াইয়া নাড়াইয়া আব্দুল করিম শোনে …|” এরপর আর রেডিও শোনা চলেনা, অতএব বন্ধ করতেই হোল|

তখন আমার সাইজ পাড়ার হুলো বেড়ালটার থেকে খুব একটা বড় ছিলনা| রেডিও রাখার পরেও টেবিল-এ যা জায়গা থাকত তাতে আমি বেশ আরাম করে আসন-কেটে বসে যেতে পারতাম| পিসির ওই বকাটা মন থেকে কিছুতেই যাচ্ছিলনা| ওই গান কিটু শোনে!! তাহলে আমাকেও চেচ্টা করে দেখতে হবে| দুপুর একটা থেকে দেড়টা রেডিওতে খেয়াল ইত্যাদি বাজান হোত| আমিও ওইসময় রেডিও তারস্বরে চালিয়ে টেবিলে বসে মাথা নাড়াতে শুরু করতাম| পিসি কাছাকাছি থাকলে মাথা নাড়ানর গতি তীব্রতর হোত| খুব চাইতাম যে পিসি দেখুক, কিন্তু দেখত বলে মানে হতনা| আমার বেশ কিছুদিন মাথা নাড়িয়ে চেষ্টা চালিয়ে যাবার পর একদিন দুপুরে পিসি খেতে খেতে বলল, “ইবার ইটারে বাড়ির পোলা মনো হয়| কি যে ছাই-ছাতা শোনন শুরু করসিলি…”

শুরুতে ভালো না লাগলেও শেষমেষ রাগ-তালের নেশাটা লেগেই গেল|

Hindi translation

सुनना शुरू
(प्रथम प्रकाशन – 13 मई, 2014, लेखक: sitardivine)

तब मैं काफ़ी छोटा था। कुछ ही दिनों में मेरी सारी कमीज़-पतलून तंग लगने लगतीं, जूतों का तो कहना ही क्या! इसलिए हर चीज़ — जूते, पतलून, कमीज़ — दो साइज़ बड़ी ख़रीदी जाती। दुर्गा पूजा आते ही हम इस दुकान से उस दुकान भागते रहते — रंग-बिरंगे कपड़ों की भीड़ में से कुछ पसंद के कपड़े मिल ही जाते और मैं बहुत खुश हो जाता। पढ़ाई के रोज़ाना के तनाव से भी कुछ दिनों की राहत मिल जाती।

पंडाल दर पंडाल बजने वाले माइक के गानों का जो मज़ा था, वो क्या कहें! तब ग्रामोफोन पर गोल-गोल काले रिकॉर्ड चला करते थे। “खोया खोया चाँद”, “प्यार किया तो डरना क्या”, “आई आई या करूं मैं क्या, सुकू सुकू”… और भी न जाने कितने!

लेकिन घर में इन मीठे, मधुर गानों पर सख़्त सेंसर था — इन गानों को “हल्का-फुल्का” कहा जाता, और माना जाता कि इन्हें सुनते ही बच्चे बिगड़ जाते हैं!

मेरे चाचा के घर एक बहुत बड़ा रेडियोग्राम था। उसमें एक बार में आठ रिकॉर्ड लगाए जा सकते थे, और वे एक के बाद एक बजते रहते। वहां फ़ैयाज़ ख़ाँ, अब्दुल करीम ख़ाँ, केसरबाई, बड़े ग़ुलाम अली, भीष्मदेव, तारापद बाबू, गौहरजान, ज्ञान गोस्वामी, सुधीरलाल जैसे कलाकारों की आवाज़ें गूंजती रहतीं।

मगर मुझे तो “खोया खोया चाँद” ही ज़्यादा भाता था।

तब हम ३६बी बेचाराम चटर्जी रोड के एक किराए के मकान में रहते थे। बाद में उस घर का नंबर बदलकर २८ हो गया था। एक दिन घर में एक मिड-साइज़ मर्फी रेडियो आया — मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था! लगा अब मस्ती से गाने सुना करूंगा।

मगर बहुत जल्दी समझ में आ गया — उस गुड़ में तो रेत मिली थी!”
अब सुनिए आगे की बात…

तब पूजा के पंडाल की बाँस-बल्ली लगनी शुरू ही हुई थी। नई-नई शरद की धूप में हर तरफ खुशी ही खुशी — और स्कूल बंद होने के संकेत भी!

उस रविवार को मैं पड़ोस के अमल दा के घर गया। वहां जाकर देखा — वह मस्त होकर हिंदी फिल्मी गाने सुन रहा है! मैं चौंक गया — किसी ने उसे डांटा भी नहीं! और आश्चर्य की बात — वो वही माइक वाले गाने थे!

मैं तो समझ नहीं पाया — क्योंकि हमारे रेडियो पर तो ऐसे गाने कभी नहीं चलते थे। हमें तो बस सुबह-शाम वही उबाऊ रागदारी और खबरें मिलती थीं।

मैंने झट से अमल दा से पूछा —
अमल दा, तुम रेडियो पर माइक वाले गाने कैसे सुन रहे हो?”
उसने सीधे जवाब दिया —
अरे, अब एक नया स्टेशन शुरू हुआ है — विविध भारती, वहीं से सुनते हैं!”

शायद ये बात 60 के दशक की शुरुआत की है।
मैंने वहीं से देख लिया कि स्टेशन कैसे पकड़ते हैं। अमल दा ने सिखा दिया —
स्टेशन पकड़ने वाली सुई को बिल्कुल दाहिनी तरफ ले जाकर थोड़ा हिलाओ, विविध भारती मिल जाएगा।”

बस फिर क्या — मैं तो नाचते-गाते घर वापस आया!

उस समय विविध भारती आज की तरह पूरे दिन नहीं चलता था। थोड़ा इंतज़ार करना पड़ता था। दोपहर करीब एक बजे रेडियो ऑन किया, और थोड़ी खोजबीन के बाद मेरा पसंदीदा स्टेशन मिल ही गया।

क्या ख़ुशी हुई — एक के बाद एक गाने बजते रहे!

उसी समय मेरी पिसी (बड़ी बुआ) हमारे साथ ही रहती थीं। तभी अचानक उनकी आवाज़ आई —
ये क्या बकवास गाने सुने जा रहे हैं?”

मैंने रेडियो की आवाज़ थोड़ी धीमी कर दी और ऐसे जताया जैसे कुछ सुना ही नहीं।

कुछ देर बाद पिसी का धैर्य टूट गया —
ये लड़का तो बिगड़ ही गया है। बाप रविशंकर का शागिर्द और बेटा सुन रहा है लफंगे गाने! देख तो, तेरा छोटा भाई कितू कैसे सिर हिला-हिलाकर अब्दुल करीम ख़ाँ सुनता है…”

बस — उसके बाद रेडियो बंद करना ही पड़ा।

तब मेरा साइज़ मोहल्ले की बिल्ली से ज़्यादा नहीं था। रेडियो रखने के बाद टेबल पर जो थोड़ी जगह बचती, वहां मैं मजे से बैठ सकता था।

पिसी की वो डांट मुझे बिल्कुल नहीं भूली।
कितू सुनता है वो संगीत!”
मतलब अब मुझे भी कोशिश करनी चाहिए!

दोपहर 1 से 1:30 बजे तक रेडियो पर ख़याल आदि बजते थे। मैं भी उस समय रेडियो को तेज़ करके टेबल पर बैठकर सिर हिलाने लगता।

अगर पिसी पास होतीं, तो सिर हिलाने की स्पीड और भी बढ़ा देता — मन में यही इच्छा कि पिसी देखे!

हालाँकि जब वो देखतीं तो जाहिर नहीं करतीं।

कई दिनों तक सिर हिलाने की इस मेहनत के बाद एक दिन दोपहर के खाने के वक्त पिसी बोलीं —
अब लगता है लड़का अपने घर का ही है! जाने क्या-क्या बकवास सुना करता था…”

शुरू में मन नहीं भी लगा, तो क्या —
अंत में राग-ताल की लत लग ही गई!