English Translation. Hindi Translation
আমাদের ছোট্ট দাদু বড় হতে হতে 145 বছরের হয়ে গেল|পুরনো সামাজিকতায় বেঁধে লিখলে আপনি সম্বোধনেই লেখার কথা| কিন্তু, আমি তো সৃষ্ঠিছাড়া| কোনোদিনই দাদুকে আপনি বলে ডাকিনি, তাই আজও ডাকব না| আপনি আজ্ঞে এসব আমার পাপা, জ্যাঠা, পিসিরা ব্যবহার করত, আমরা নাতি নাতনি, প্রোনাতি, প্রোনাতনিরা ওসব পরনো পোষাকি রং-ঢং এ বিশ্বাসী ছিলাম না| আমরা সব্বাই দাদুকে খুব ভালবাসতাম আর মনের আনন্দে তুমি বলতাম, দাদুও আমাদের কোনদিন আপত্তি জানায়নি| দাদু যদি ওই গম্ভীর গলায় “না” বলে উঠত তাহলে কার কি জো ছিল যে অন্য কিছু হয়| লোকে বলে ওঁর দাপটে নাকি বাঘে গরুতে একই ঘাটে জল খেত|
দাদুর যে চেহারাটা আমাদের কিছু মানুষের মনে এখনও গেঁথে আছে তাতে লম্বা সাদা দাড়ি, গেরুয়া ধুতি-চাদর, একটা বেতের লাঠি, একটা চরখা, একটা কাঠের ডেস্ক, দাগ টানা খাতা, দোয়াত-কলম, একটা চিনে মাটির কাঁধ-উঁচু বড় খাবারের প্লেইট, একটা বড় খাবার চামচ, কাটা, একটা ইজি চেয়ার, খিচুড়ি-তেতো-তরকারি-দই সব একসাথে মিলিয়ে মাধুকরী, সব মিলিয়ে বহু কনট্রাস্ট, বহু রং – একটার সাথে অন্যটা মেলানো খুব মুশকিল|
আমি যখন দশ বছর ছাড়িয়ে এগারোতে এলাম তখন থেকেকে আর দাদুকে দেখতে পাইনা, বাইরের দিকে না তাকিয়ে ভেতরে তাকিয়ে দেখতে হয়| আমি তো দাদুকে ঝক-ঝকে দেখতে পাই| আমার চোখে ফরসা, টাক মাথা, লম্বা সাদা দাড়ি, ধুতি-ফতুয়া-চাদর এটা দাদুকে দেখা চেহারা, অন্য-রকম একটা দাদু আছে সেটা শোনা আর মনের সাজে সাজিয়ে নেওয়া|
দাদু তখন আমাদের সাথে বেহালায় আমাদের ভাড়াবাড়ীতে| দাদুর একটা আলাদা ছোট ঘর ছিল, আমার বাকিরা অন্য একটা বড় ঘরে থাকতাম| একদিন দাদু বলল, “চলো সোনাভাই, আমি আমার এক পুরনো ছাত্রের দেখা পেয়েছি| চলো, তোমাকে একদিন আমার ছাত্রর কাছে নিয়ে যাব|” আমি তো খুব এক্সসাইটেড হয়ে পড়লাম|শেষে একদিন বিকেলবেলা দাদুর হাত ধরে বেরিয়ে পড়লাম| আমরা তখন 36বি বেচারাম চ্যাটার্জী রোডের ভাড়াবাড়িতে থাকি, যেটা পরে নম্বর বদলে 28 নম্বর হয়ে গিয়েছিল|
সে যা হোক, আমরা বাড়ি থেকে বেরিয়ে সরশুনার দিকে হাঁটতে থাকলাম| অবশেষে দাদুর সেই ছাত্রের ডেরা আসল| দেখলাম সেটা একটা বুড়োদের আসর| ওদের মধ্যে দাদুকে এক বড় দাড়ি ওয়ালা বুড়ো, পরে বুঝেছিলাম ও দাদুর স্টাইল এ দাড়ি বাড়ানোর চেষ্টা করছিল, উঠে আসলো| আরে, আসুন আসুন| তারপরে সশ্রদ্ধায় প্রণাম| দাদু অল্পসময় বসলেন আর তারপর বাড়ির দিকে হাঁটতে শুরু করলেন| আসতে আসতে দাদু বলল, তার এই ছাত্রটি ওঁর কলেজে পড়ত| আপনারা তো জানেন, দাদু ময়নামতী সার্ভে কলেজ এর প্রিন্সিপাল ছিলেন| উনি প্রিন্সিপাল ছিলেন এটা একটা প্রচলিত খবর, অনেকেই জানেন, কিন্তু আমি কখনও ওর বিপক্ষের লন্ডন থেকে আসা ইনকোয়ারি অফিসারের দাদুকে সোজা প্রশ্ন “Are you a wrangler?” নিয়ে আসর জমানোর ইচ্ছে রইল.
টিপ্পনী: At the University of Cambridge in England, a “Wrangler” is a student who gains first-class honours in the Mathematical Tripos competition.
Click to know more: https://en.wikipedia.org/wiki/Wrangler_(University_of_Cambridge)
Yesterday was dadu’s 146th Birthday. [b. Ramanavami 1880, d. 14 June 1985]. I designed. a Birthday card for him. Here it is:
আমি এই ভিডিওটা অনেককে.পাঠিছিলাম. ছোড়দির কাছ থেকে প্রায় সাথে সাথেই উত্তর পেলাম । ও লিখলো : “অসাধারণ অপূর্ব অদ্ভূত সুন্দর– করলি কি করে???!!!!”
আমি দুষ্টুমি করে উত্তর দিলাম…
এটা খুউবই সোজা। এটা তুইও ছোটবেলায় করেছিস, একে আমরা বলতাম প্ল্যানচেট|
দাদুকে ডাকলাম, বললাম সাহেবী পোশাকে নেকটাই পড়ে চলে এসো| তারপর “হ্যাপি বার্থডে টু ইউ”, কিছু বেলুন উড়িয়ে ভিডিও করতে শুরু করে দিলাম| জানিস তো দাদু কিছুতেই বেশিক্ষণ থাকল না — চলে গেল| ভাগ্যিস একটু ভিডিও করে রেখেছিলাম, দ্যাখ, তুইও দেখতে পেলি|
বিশ্বাস করলি না তো? জানি করবি না| কথায় বলে, “বিশ্বাসে মিলায় দাদু, তর্কে বহুদূর|”
কলকাতা | 28/03/2026
English Translation
Dadu’s Dichotomy
Our little “Dadu” (grandfather), as time passed, turned 145 years old. According to old social customs, one is supposed to address elders formally while writing. But I’ve always been a bit unconventional. I never addressed Dadu formally, and I won’t start today either. That kind of formal “you” was used by my father, uncles, and aunts. We—his grandchildren and great-grandchildren—never really believed in those old-fashioned formalities.
We all loved Dadu dearly and happily addressed him informally as “you.” And Dadu never objected. If he had ever said “no” in that deep, serious voice of his, no one would have dared to go against it! People used to say that such was his authority that even a tiger and a cow could drink water from the same ghat under his influence.
The image of Dadu that is still etched in some of our minds includes a long white beard, saffron dhoti and shawl, a cane stick, a spinning wheel, a wooden desk, lined notebooks, ink and pen, a large high-edged porcelain plate, a big serving spoon, a fork, an easy chair, and meals of khichuri, bitter vegetables, curry, and curd all mixed together like “madhukari.” Altogether, he was a striking blend of contrasts and colors—hard to reconcile into a single picture.
When I crossed ten and turned eleven, I could no longer see Dadu outwardly; I had to look inward to find him. But in my mind’s eye, I see him clearly—fair-skinned, bald-headed, with a long white beard, dressed in dhoti, vest, and shawl. That is the Dadu I have seen. The other version of him is something I’ve only heard about and imagined in my own way.
Back then, Dadu lived with us in our rented house in Behala. He had a small separate room, while the rest of us stayed in a bigger one. One day, Dadu said, “Come, Sonabhai, I’ve found one of my old students. Let me take you to meet him.” I was very excited. Finally, one afternoon, holding Dadu’s hand, I set out with him. We were then living at 36B Becharam Chatterjee Road, which was later renumbered as 28.
Anyway, we walked from our house towards Sarsuna. At last, we reached the place where that student lived. It turned out to be a gathering of elderly men. Among them, one old man with a large beard—later I realized he was trying to imitate Dadu’s style—came forward warmly to receive him. “Ah, please come, please come!” he said, and then bowed respectfully.
Dadu sat for a short while, and then we started walking back home. On the way, Dadu told me that this man had been his student in college. As you know, Dadu was the principal of Moynamoti Survey College. Many people are aware of this fact. But I’ve always been curious to recreate that moment when an inquiry officer from London asked him directly, “Are you a wrangler?”
Note: At the University of Cambridge in England, a “Wrangler” is a student who earns first-class honours in the Mathematical Tripos.
Yesterday was Dadu’s 146th birthday.
(Born on Ramanavami, 1880 – Died on 14 June 1985.)
I designed a birthday card. Here it is.
Hindi Translation
हमारे छोटे से दादू उम्र बढ़ते-बढ़ते 145 साल के हो गए। पुरानी सामाजिक परंपराओं के अनुसार लिखते समय उन्हें औपचारिक “आप” कहकर संबोधित करना चाहिए। लेकिन मैं तो हमेशा से थोड़ा अलग रहा हूँ। मैंने कभी भी दादू को “आप” नहीं कहा, इसलिए आज भी नहीं कहूँगा। “आप-आज्ञा” जैसी बातें मेरे पापा, चाचा और बुआ लोग इस्तेमाल करते थे; हम—नाती, नातिन, परनाती, परनातिन—इन पुराने औपचारिक ढंगों में विश्वास नहीं रखते थे।
हम सब दादू को बहुत प्यार करते थे और दिल से उन्हें “तुम” कहकर बुलाते थे। दादू ने भी कभी कोई आपत्ति नहीं की। अगर वे अपनी उस गंभीर आवाज़ में “ना” कह देते, तो किसी की क्या मजाल थी कि कोई और कुछ करता! लोग कहते हैं कि उनके रौब में तो बाघ और गाय भी एक ही घाट पर पानी पीते थे।
दादू की जो छवि आज भी हममें से कुछ लोगों के मन में बसी है, उसमें एक लंबी सफेद दाढ़ी, गेरुआ धोती-चादर, एक बेंत की लाठी, एक चरखा, एक लकड़ी की मेज़, लाइन वाली कॉपियाँ, दवात-कलम, एक ऊँची किनारी वाली बड़ी चीनी मिट्टी की थाली, एक बड़ा चम्मच, कांटा, एक ईज़ी चेयर, और खिचड़ी, कड़वी सब्ज़ी, तरकारी, दही सबको मिलाकर बना “माधुकरी”—सब कुछ शामिल है। कुल मिलाकर कई तरह के विरोधाभास, कई रंग—जिन्हें एक साथ मिलाना आसान नहीं।
जब मैं दस साल पार करके ग्यारह का हुआ, तब से मैं दादू को बाहर से देख नहीं पाता; उन्हें देखने के लिए भीतर झाँकना पड़ता है। लेकिन मेरी आँखों में दादू साफ-साफ दिखाई देते हैं—गोरा रंग, गंजा सिर, लंबी सफेद दाढ़ी, धोती-फतुआ-चादर पहने हुए। यही वह रूप है जिसमें मैंने दादू को देखा है। दादू का एक और रूप है, जिसके बारे में केवल सुना है और मन में कल्पना करके सजाया है।
उस समय दादू हमारे साथ बेहाला में हमारे किराए के घर में रहते थे। उनका एक छोटा अलग कमरा था, और हम बाकी लोग एक बड़े कमरे में रहते थे। एक दिन दादू ने कहा, “चलो सोनाभाई, मुझे मेरा एक पुराना छात्र मिला है। चलो, तुम्हें एक दिन उससे मिलवाता हूँ।” मैं तो बहुत उत्साहित हो गया। आखिर एक दिन शाम को दादू का हाथ पकड़कर निकल पड़ा। तब हम 36B बेचाराम चटर्जी रोड के किराए के घर में रहते थे, जिसका नंबर बाद में बदलकर 28 हो गया।
खैर, हम घर से निकलकर सरशुना की ओर पैदल चलने लगे। आखिरकार दादू के उस छात्र का ठिकाना आ गया। देखा, वह बूढ़े लोगों की एक महफ़िल थी। उनमें से एक बड़ी दाढ़ी वाला बूढ़ा—बाद में समझ आया कि वह दादू की शैली में दाढ़ी बढ़ाने की कोशिश कर रहा था—उठकर आया और बोला, “अरे, आइए, आइए!” फिर उसने श्रद्धा से प्रणाम किया।
दादू थोड़ी देर बैठे, फिर हम घर की ओर लौटने लगे। रास्ते में दादू ने बताया कि यह उनका छात्र उनके कॉलेज में पढ़ता था। आप तो जानते ही हैं, दादू मयनामती सर्वे कॉलेज के प्रिंसिपल थे। यह बात काफ़ी प्रचलित है और बहुत लोग जानते हैं। लेकिन मेरे मन में हमेशा यह इच्छा रही कि उस लंदन से आए इनक्वायरी ऑफिसर और दादू के बीच हुई सीधी बातचीत—“Are you a wrangler?”—को लेकर एक सभा जमाऊँ।
टिप्पणी: इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में “Wrangler” उस छात्र को कहा जाता है जो Mathematical Tripos परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता है।
और जानने के लिए: https://en.wikipedia.org/wiki/Wrangler_(University_of_Cambridge)
यह तो बहुत ही आसान है। यह तुमने भी बचपन में किया है—इसे हम “प्लांचेट” कहते थे।
मैंने दादू को बुलाया और कहा—साहबी कपड़े पहनकर, नेकटाई लगाकर आओ। फिर “हैप्पी बर्थडे टू यू” गाया, कुछ गुब्बारे उड़ाए और वीडियो बनाना शुरू कर दिया। तुम तो जानते ही हो, दादू ज़्यादा देर रुके नहीं—चले गए। अच्छा हुआ कि थोड़ा वीडियो बना लिया था—देखो, तुम भी देख पाए।
यकीन नहीं हुआ न? मुझे पता था, नहीं होगा। कहा भी जाता है—
“विश्वास में दादू मिलते हैं, तर्क में बहुत दूर चले जाते हैं।”





