Bengali version. Hindi Translation

This story of receiving thrash on my sitar recital surfaced after I accidentally discovered this cute picture with Abhjit in concert. I found it difficult to resist sharing this one, one of my most- musically intimate photographs with Abhijit Banerjee. It was 1995 Kolkata.
I vividly remember that this was only the second occasion on which I performed the 9⅓-matra Saptarshi Tala with Abhijit on tabla, following our earlier presentation at the India International Centre in New Delhi.
The performance generated an unexpected controversy. A prominent Kolkata music critic wrote a lengthy review—if memory serves me right, it may have appeared in Aaj Kaal. The critic was clearly a serious scholar. Disturbed by my explanation of the tala, he reportedly consulted Sangeet Ratnakara and other musicological treatises in search of references to it. Finding none, he became rather critical and accused me of miscommunicating with the audience.
The source of the misunderstanding lay in my pre-performance explanation. I had described the tala as Saptarshi because of its structure comprising seven tisra-laghu and seven guru units, and I used technical terms such as tisra-jati laghu and guru while addressing the audience. My intention was simply to explain the conceptual basis of the tala, but the explanation seems to have been interpreted differently.
For those interested, a detailed discussion of the tala may be found here:
https://sanjoybandopadhyay.com/saptarishi-peeyush/
This intimate musical soirée was organised by Smt. Dipali Sinha, the noted mountaineer. Significantly, Dipali Sinha led and organised the first-ever all-women expedition from Eastern India to Ronti in the Garhwal Himalayas in 1967, a pioneering achievement in the history of Indian mountaineering.
Bengali translation. This is NOT an exact translation, but it retained the facts
অভিজিৎ ব্যানার্জীর সাথে আমার একটি অত্যন্ত অন্তরঙ্গ সঙ্গীত-স্মৃতিবাহী ছবি শেয়ার করার লোভ সংবরণ করতে পারলাম না। সময়টা ছিল ১৯৯৫ সালের কলকাতা।
আমার স্পষ্ট মনে আছে, দিল্লির ইন্ডিয়া ইন্টারন্যাশনাল সেন্টারে আমাদের অনুষ্ঠানের পর এটি ছিল দ্বিতীয়বার, যখন আমি অভিজিৎকে তবলায় সঙ্গে নিয়ে ৯⅓ মাত্রার সপ্তর্ষি তালে হই-চই বাঁধিয়েছিলাম। সেদিন আমরা খুব মজা করে গান-বাজনা করেছিলাম।

সে সময় কলকাতার খবরের কাগজে বেশ ঘন ঘন রাগ-সঙ্গীতের অনুষ্ঠানগুলোর বেশ খুঁতিয়ে সমালোচনা বেরোত| সংগীত সমালোচকরা খুব মন দিয়ে গান-বাজনা শোনা-বোঝার চেষ্টা করতেন|
আরও মজা হয়েছিল এই অনষ্ঠানের কিছুদিন পরে| সে সময় কলকাতার খবরের কাগজে বেশ ঘন ঘন রাগ-সঙ্গীতের অনুষ্ঠানগুলোর বেশ খুঁতিয়ে সমালোচনা বেরোত| সংগীত সমালোচকরা খুব মন দিয়ে গান-বাজনা শোনা-বোঝার চেষ্টা করতেন| অতএব, এই বাজনাকে ঘিরে একটি বেশ একটা বিতর্কের সৃষ্টি হয়েছিল। অনুষ্ঠানে উপস্থিত এক সঙ্গীতসমালোচক, শ্রোতাদের কাছে আমি বিভ্রান্তিকর তথ্য উপস্থাপন করেছি বলে তীব্র অভিযোগ তোলেন।
ব্যাপারটা বুঝিয়ে বলার চেষ্টা করছি। বোঝাই যাচ্ছে এই বিশিষ্ট মানুষটি প্রচণ্ড সিরিয়াস মানুষ ছিলেন এবং এই ১/৩ মাত্রা হঠাৎ করে লাফ দিয়ে তাল হিসেবে সামনে আসায় ওঁর মনে হল ব্যাপারটা যাচাই করে দেখা দরকার। উনি সোজা খুলে ফেলেন সঙ্গীতরত্নাকর আর অন্যান্য শাস্ত্র-গ্রন্থ; আর সেখানে না দেখতে পেয়ে আমার ওপর রেগে আগুন তেলে বেগুন হয়ে গেলেন! উনি ভাবলেন যে আমি শ্রোতাদের কাছে আমি বিভ্রান্তিকর তথ্য উপস্থাপন করেছি। এতে একটা ভালো হল যে আমার বাজনার আলোচনা খবরের কাগজে বেশ কিছুটা বেশি জায়গা পেয়ে গেল| সংবাদপত্রটির নাম আজ আর মনে নেই—সম্ভবত আজকাল ।
আসলে বিভ্রান্তির সূত্রপাত হয়েছিল আমার সংক্ষিপ্ত পরিচয়পর্ব থেকে। আমি শ্রোতাদের বলেছিলাম যে, সাতটি তিস্র-লঘু আর সাতটি গুরু দিয়ে তালটি তৈরী| তার আগে হয়তো বলেছিলাম যে প্রাচীন-কালে তাল গুলো লঘু, গুরু, প্লুত ইত্যাদি দিয়েই বোঝানো হোত| সপ্তর্ষি তালটিকে ওই ভাবে দেখলে নামের সাথে তালটা সুন্দর জুড়ে যাবে| বুঝতেই পারছেন যে তালটিতে এই সাতের উপস্থিতির কারণে এই তালের নাম সপ্তর্ষি। এইসব লঘু, গুরু, প্রাচীন ইত্যাদি শব্দের ব্যবহারে উনি বোধ করি সোজা প্রচীনের সাথে জুড়ে নেন| এখন মনে হয় সংগীত-সমালোচকদের এই সাগ্রহ শোনা-বোঝার চেষ্টা আর মিডিয়াতে তার স্থান পাওয়া বহু দিক থেকেই সদর্থক|
এই অন্তরঙ্গ সঙ্গীত-সন্ধ্যার আয়োজন করেছিলেন বিশিষ্ট পর্বতারোহী শ্রীমতী দীপালি সিনহা। প্রসঙ্গত উল্লেখ্য, ১৯৬৭ সালে তিনিই পূর্বভারত থেকে গড়ওয়াল হিমালয়ের রন্টি শৃঙ্গে ভারতের প্রথম সর্ব-মহিলা অভিযানের সংগঠন ও নেতৃত্ব দেন। ভারতীয় পর্বতারোহণের ইতিহাসে এটি এক অগ্রণী ও স্মরণীয় ঘটনা।
যাঁরা সপ্তর্ষি তালের বিষয়ে। জানতে আগ্রহী, তাঁদের জন্য এখানে একটি বিস্তারিত আলোচনা রয়েছে:
https://sanjoybandopadhyay.com/saptarishi-peeyush/
Hindi Translation

अभिजीत बनर्जी के साथ मेरी एक बेहद आत्मीय, संगीत-स्मृतियों से भरी तस्वीर साझा करने का लोभ मैं रोक नहीं पाया। समय था 1995 का कोलकाता।
मुझे आज भी साफ़ याद है कि दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हमारे कार्यक्रम के बाद यह दूसरी बार था जब मैंने अभिजीत को तबले पर साथ लेकर 9⅓ मात्रा के सप्तर्षि ताल में थोड़ी-सी हलचल मचा दी थी। उस दिन हमने बड़े आनंद और मस्ती के साथ संगीत प्रस्तुत किया था।
लेकिन असली मज़ा तो कुछ दिनों बाद आया।
उस समय कोलकाता के समाचारपत्रों में राग-संगीत के कार्यक्रमों की काफ़ी गंभीर और बारीक समीक्षा प्रकाशित हुआ करती थी। संगीत-समालोचक बड़े ध्यान से सुनते, समझते और फिर अपनी राय लिखते थे। परिणामस्वरूप, इस प्रस्तुति को लेकर एक दिलचस्प विवाद खड़ा हो गया। कार्यक्रम में उपस्थित एक संगीत-समालोचक ने मुझ पर यह गंभीर आरोप लगाया कि मैंने श्रोताओं के सामने भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की है!
ज़रा मामला समझाता हूँ।
स्पष्ट है कि वे अत्यंत गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। अब भला यह एक-तिहाई मात्रा अचानक उछलकर ताल के रूप में सामने आ जाए, तो किसी भी सजग विद्वान को शंका होना स्वाभाविक है। उन्होंने तुरंत संगीतरत्नाकर और अन्य शास्त्रीय ग्रंथ खोल डाले। वहाँ जब उन्हें यह ताल दिखाई नहीं दी, तो वे मुझ पर ऐसे नाराज़ हुए जैसे आग में घी नहीं, पूरा सरसों का तेल पड़ गया हो! उन्हें लगा कि मैंने श्रोताओं को गुमराह किया है।
हाँ, एक लाभ अवश्य हुआ—मेरे वादन की चर्चा अख़बार में अपेक्षाकृत अधिक जगह पा गई। आज उस समाचारपत्र का नाम याद नहीं है; शायद आजकाल रहा होगा।
वास्तव में भ्रम की शुरुआत मेरे संक्षिप्त परिचय से हुई थी। मैंने श्रोताओं से कहा था कि यह ताल सात तिस्र-लघु और सात गुरु से निर्मित है। उससे पहले शायद मैंने यह भी उल्लेख किया था कि प्राचीन काल में तालों को लघु, गुरु, प्लुत आदि इकाइयों के माध्यम से समझाया जाता था। सप्तर्षि ताल को यदि उस दृष्टि से देखा जाए, तो उसका नाम और संरचना एक सुंदर संबंध स्थापित करते हैं। जैसा कि आप समझ ही रहे हैं, ताल में उपस्थित सात की विशेष भूमिका के कारण इसका नाम सप्तर्षि रखा गया है।
संभवतः लघु, गुरु और प्राचीन जैसे शब्दों को सुनकर आदरणीय समालोचक महोदय ने सीधे इस ताल को किसी प्राचीन शास्त्रीय ताल से जोड़ लिया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि संगीत-समालोचकों का यह उत्साहपूर्वक सुनना, समझना और उस पर गंभीर चर्चा करना—तथा मीडिया में उसे स्थान मिलना—कई दृष्टियों से अत्यंत सकारात्मक था।
इस आत्मीय संगीत-संध्या का आयोजन प्रसिद्ध पर्वतारोही श्रीमती दीपाली सिन्हा ने किया था। उल्लेखनीय है कि 1967 में उन्होंने पूर्वी भारत से गढ़वाल हिमालय की रोंटी चोटी पर भारत के प्रथम सर्व-महिला अभियान का संगठन और नेतृत्व किया था। भारतीय पर्वतारोहण के इतिहास में यह एक अग्रणी और स्मरणीय उपलब्धि मानी जाती है।
जो मित्र सप्तर्षि ताल के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, उनके लिए यहाँ एक विस्तृत चर्चा उपलब्ध है: